मेवाड़ के महाराणा à¤à¥€à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ कृषà¥à¤£à¤•à¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ बहà¥à¤¤ रूपवती थी। महाराणा ने अपनी राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ की सगाई जोधपà¥à¤° के महाराजा à¤à¥€à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह के साथ की किनà¥à¤¤à¥ शादी के पूरà¥à¤µ ही उनकी मृतà¥à¤¯à¥ हो गयी अतः जयपà¥à¤° के राजा जगतसिंह के साथ उसका समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§ तय किया गया। पोकरण ठाकà¥à¤° सवाईसिंह के उकसाने पर जोधपà¥à¤° के महाराजा मानसिंह ने (जो महाराजा à¤à¥€à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह की मृतà¥à¤¯à¥ के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤à¥ उतà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤§à¤¿à¤•ारी बने) मेवाड़ को यह संदेश à¤à¥‡à¤œà¤¾ कि – “कृषà¥à¤£ कà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ का विवाह जोधपà¥à¤° के à¤à¥‚तपूरà¥à¤µ महाराजा के साथ होना तय हà¥à¤† था, अतः उसका विवाह मेरे साथ होना चाहिà¤, जयपà¥à¤° के महाराजा जगतसिंह के साथ विवाह करके शà¥à¤°à¤¾à¤ª हमारा अपमान करना चाहते हो, इसे हम कà¤à¥€ बरà¥à¤¦à¤¾à¤¶à¥à¤¤ नहीं करेंगे।”
महाराणा दà¥à¤µà¤¿à¤§à¤¾ में फंस गये। जोधपà¥à¤° या जयपà¥à¤° किसी à¤à¤• महाराजा से विवाह करने पर दूसरा नाराज हà¥à¤¯à¥‡ बिना रह नहीं सकता था। मेवाड़ की उस समय à¤à¤¸à¥€ सà¥à¤¦à¥ƒà¤¢à¤¼ सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ नहीं थी कि वह यà¥à¤¦à¥à¤§ में उनका मà¥à¤•ाबला कर सके। जोधपà¥à¤° औऱ जयपà¥à¤° दोनों के मधà¥à¤¯ संघरà¥à¤· छिड़ गया और दोनों ही कृषà¥à¤£à¤•à¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ के साथ विवाह के लिठअपने को दावेदार बता रहे थे। मेवाड़ पर संकट के बादल घिर आये। à¤à¤¸à¥€ सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ में मीरखां नामक पठान ने मेवाड़ के महाराणा को यह सà¥à¤à¤¾à¤µ दिया कि – “सारा उपदà¥à¤°à¤µ कृषà¥à¤£à¤•à¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ के कारण पैदा हà¥à¤† है अतः इस à¤à¤—ड़े की जड़ का ही सफाया करो।”
लाचार होकर महाराणा को उसका सà¥à¤à¤¾à¤µ सà¥à¤µà¥€à¤•ार करना पड़ा। महाराणा ने तलवार से कृषà¥à¤£à¤•à¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ की हतà¥à¤¯à¤¾ करने जवानदास पासवानिये को à¤à¥‡à¤œà¤¾ पर रूपवती राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ की हतà¥à¤¯à¤¾ करने का साहस नहीं कर सका। कृषà¥à¤£à¤•à¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ की मां अपनी पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ के दà¥à¤– से कातर व विहà¥à¤µà¤² हो रही थी, उसे राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ ने कहा – “मां! तà¥à¤® कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ इस तरह विलाप कर रही हो। मैं तेरी पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ हूं, मौत से कà¤à¥€ नहीं डरती। राजपूत बालाओं का जनà¥à¤® तो आतà¥à¤® बलिदान के लिठही होता है। तà¥à¤®à¥à¤¹à¥‡à¤‚ तो गरà¥à¤µ होना चाहिठकि तà¥à¤®à¥à¤¹à¤¾à¤°à¥€ पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ को देश की रकà¥à¤·à¤¾ के लिठआतà¥à¤®à¥‹à¤¤à¥à¤¸à¤°à¥à¤— का अवसर मिला। कृषà¥à¤£à¤¾ के पà¥à¤°à¤¾à¤£à¥‹à¤‚ से मेवाड़ का मान बड़ा है, मां।†इतना कहकर उस रूपवती षोडसी वीर राजपूत बाला ने विष पान कर मेवाड़ की रकà¥à¤·à¤¾ के लिठआतà¥à¤®à¤µà¤¿à¤¸à¤°à¥à¤œà¤¨ किया।
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