आज़ादी के बाद भारत पर लंबे समय तक एक तथाकथित “सेक्युलर” विचारधारा हावी रही। सत्ता में बैठे नेताओं ने राष्ट्रहित और सत्य इतिहास को नज़रअंदाज़ कर, अपनी राजनीतिक सुविधा के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया।
भारतीय बच्चों और युवाओं को किताबों के माध्यम से यह सिखाया गया कि विदेशी आक्रांता और लुटेरे “महान शासक” थे, जबकि अपने धर्म, संस्कृति और स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति देने वाले असली नायकों को हाशिये पर डाल दिया गया।
इतिहास की पुस्तकों में अकबर को “महान” बताया गया, लेकिन अनेक तथ्य इसके उलट हैं।
अकबर ने चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी के बाद विजय प्राप्त की तो लगभग 30,000 से अधिक निर्दोष राजपूतों का कत्लेआम करवाया। इस भीषण नरसंहार को अबुल फ़ज़ल ने अपनी किताब आइन-ए-अकबरी में भी दर्ज किया है। चित्तौड़ की महिलाओं को जौहर करना पड़ा। क्या ऐसा नरसंहार कराने वाला “महान” कहलाया जा सकता है?
अकबर के बारे में कहा जाता है कि उसने “सुलह-ए-कुल” का सिद्धांत अपनाया। लेकिन वास्तविकता यह है कि वह केवल राजनीतिक चाल थी। उसने कई जगह मंदिरों को तुड़वाया और हिंदुओं को मजबूर किया कि वे उसकी सत्ता के आगे झुकें।
अकबर ने शादियों और संधियों का इस्तेमाल अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के लिए किया। कई राजपूत राजकुमारियों को राजनीतिक साधन बनाकर विवाह संबंध स्थापित किए गए।
अकबर ने एक के बाद एक राजपूताने के राज्यों पर हमला किया। मेवाड़, चित्तौड़, रणथंभौर, गुजरात, बंगाल आदि उसके रक्तरंजित युद्धों के उदाहरण हैं।
इतिहासकार जगन्नाथ सरस्वती और विश्वनाथ शर्मा जैसे लेखकों ने भी अकबर को क्रूर और विस्तारवादी शासक कहा है, न कि “महान”।
महाराणा प्रताप ने कभी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। उनके जीवन का हर पल संघर्ष और आत्मसम्मान का प्रतीक था।
यह युद्ध निर्णायक न होकर भी अमर गाथा बन गया। केवल 20,000 सैनिकों के साथ महाराणा प्रताप ने अकबर की विशाल सेना का डटकर सामना किया। चेतक जैसे अश्व का बलिदान, राजपूत सैनिकों की वीरता और प्रताप का अदम्य साहस आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
महाराणा प्रताप ने घोर आर्थिक संकट और कठिनाइयों में भी हार नहीं मानी। पहाड़ों और जंगलों में रहते हुए भी उन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखा।
महाराणा प्रताप का जीवन केवल युद्ध तक सीमित नहीं था। उन्होंने अपनी प्रजा के कल्याण को सर्वोपरि माना और कभी अपने राज्य को अकबर की दासता में नहीं सौंपा।
प्रताप ने दिखा दिया कि भले ही परिस्थिति कितनी भी कठिन हो, स्वतंत्रता से बढ़कर कुछ नहीं।
इतिहास का सच यह है कि अकबर एक क्रूर आक्रांता था, जबकि महाराणा प्रताप स्वराज, संस्कृति और आत्मसम्मान के असली महानायक थे। दुर्भाग्यवश, आज़ादी के बाद की सरकारों और इतिहास लेखकों ने अकबर जैसे आक्रांताओं को “महान” बताकर हमारी नई पीढ़ी को भ्रमित किया।
अब समय आ गया है कि हम अपने बच्चों और युवाओं को असली नायकों की गाथाएं सुनाएँ। ताकि वे यह समझ सकें कि महानता युद्धों से साम्राज्य बनाने में नहीं, बल्कि अपने धर्म, संस्कृति और स्वराज की रक्षा के लिए त्याग और संघर्ष करने में है।
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