The PM’s Chair is Still a Distant Dream for L K Advani


एक ओर जहाँ देश की जनता काँग्रेस की तानाशाही से त्रस्त है और आस लगा कर आने वाले चुनाव का बेसब्री से इंतज़ार कर रही है, काँगेस के द्वारा शोषित हो अब जिस राजनीतिक पार्टी को आने वाले पांच साल अपना रक्षक मान रही है, वही भारतीय जनता पार्टी स्वयं काँगेस को फिर से आने वाले चुनावों में सत्ता सुख भोगने का आमंत्रण देती नजर आ रही है। महंगाई, भ्रष्टाचार, बलात्कार, लूट, हत्याओं से परेशान होकर भाजपा पर भरोसा कर रही जनता इस बात से शायद अनजान है की जिन नेताओं के हाथों में आज पार्टी की बागडोर है वही नेता अपने मतलब के लिए पार्टी के मान-सम्मान को, देश की एक अरब से ज्यादा जनता के विश्वास को दांव पर लगाये बैठे है।

ऐसा नहीं कि सभी नेता एक सामान सोच लेकर चल रहे है, लेकिन पार्टी के कुछ बड़े कद वाले नेता अपनी मर्यादा और रुतबे को भूलकर देश के साथ एक ऐसा घिनोना मजाक करने में लगे है जिसे आम जनता समझ ही नहीं पा रही है, या फिर जो कुछ लोग समझ भी रहे है वे उन नेताओं के कद से डरे बैठे है या फिर कुछ अपना उल्लू भी सीधा करने में लगे है।

पिछले एक साल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से त्रस्त जनता ने अपने भावी प्रधानमंत्री के रूप में गुजरात के मुख्यमत्री को स्वयं ही प्रोजेक्ट किया है। और देश को यह खुलकर बताया जा रहा है की जनता किसे देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी का हर छोटे से लेकर बड़ा नेता हो या कार्यकर्ता इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानता है कि देश की जनता अगले चुनावों में नरेन्द्र मोदी को ही देश का प्रधानमंत्री देखना चाहती है। लेकिन पार्टी के कुछ आला नेता इस बात से चिन्तित ही नहीं है बल्कि खुलकर जनता की राय का विरोध करते नजर आ रहे है। इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वह है सालों से अन्दर दबी पड़ी लालसा ।

सभी जानते है कि भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष पदों पर बैठे नेता अपनी जिन्दगी के एक बड़े हिस्से को भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में खपा चुके है और अब वह समय है जहाँ वे कुछ पारतोषिक की इच्छा रखते है । खासकर वे नेता जो अपनी जिन्दगी के आखिरी पड़ाव पर है। ऐसे ही नेताओं में से एक है लाल कृष्ण अडवानी जिन्होंने ने अपनी जिन्दगी भाजपा के साथ लगा दी। पहले अटल बिहारी वाजपयी के होने से अडवानी जी को प्रधानमंत्री की कुर्सी से वंचित रहना पडा, लेकिन अब जब उनका प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ़ था अचानक देश की जनता ने पलटी खाई और नरेन्द्र मोदी का नाम देश के सामने रख दिया । देश की जनता ने ही नरेन्द्र मोदी को प्रचारित भी किया और पसंद भी ।

लालकृष्ण अडवानी जी के लिए यह बडी विकट स्थिती थी जहाँ उनके जिन्दगी के एक बहुत बड़े सपने का अंत होता दिखाई दे रहा था। ऐसे समय में यदि अपने करीबी साथ न दे ऐसा कैसे हो सकता है और वह भी तब जब अडवानी जी के साथ करीबी के भी सपने चूर होते दिखाई दे रहे हो। अडवानी  जी की करीबी मानी जाने वाली पार्टी की शीर्ष महिला नेता जो कि उनके सपने से बखुबी वाखिफ़ है यह कैसे सहन कर सकती थी। श्रीमती सुषमा स्वराज ने बार-बार प्रेस कान्फ्रेंस में यह कहा कि प्रधानमंत्री पद के लिए अभी पार्टी स्तर पर कोई फैसला नहीं किया गया है। साथ ही अडवानी जी ने भी खुलकर अपनी बात न रख पाने की स्थिति में एक खतरनाक रास्ता पकड़ लिया और लगातार नरेन्द्र मोदी के सामने शिवराज सिंह चौहान को खुले मंच पर लाने की कोशिश कर रहे है, वे लगातार शिवराज सिंह चौहान को मोदी से ज्यादा काबिल साबित करने में लगे है ।

क्या अडवानी की यह कारगुजारी पार्टी के नेताओं में फूट डालने की कोशिश नहीं है? अडवानी इस प्रकार क्या साबित करना चाहते है, क्या पार्टी और उनकी राय देश की जनता की राय से भी बड़ी हो गई है या इस तरह वे काँग्रेस को सत्ता का गिफ्ट देना चाहते है जिससे नरेन्द्र मोदी का प्रधानमत्री बनने का रास्ता अपने आप ही बंद हो जायेगा और देश की जनता का सपना भी टूट जायेगा। क्या अपने सपने टूटने का इतना बड़ा बदला पूरे देश के साथ सही है? आखिर जनता की मांग पर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में क्या परेशानी है, जबकि इस कदम से भाजपा के चुनावों में एक बड़ी जीत के रास्ते अपने आप खुल जायेंगे, यहाँ तक कि काँगेस भी जिस नरेन्द्र मोदी से डरी बैठी है और राहुल गांधी तक को बेकफुट पर लाने पर मजबूर हो चुकी है। फिर कुछ भाजपा नेताओं को क्या परेशानी हो सकती है? कहीं इसके पीछे भी क्रिकेट की तरह कोई फिक्सिंग तो नहीं?

ये सब अब जनता के हाथ में है किसे सत्ता में लाना है किसे नहीं। वैसे किसी इंसान को बार बार समझाना जरुरी नहीं देश की जनता किसी जानवर की तरह तो है नहीं की बार बार लाठी खाने के बाद भी उसी खेत में फिर से लाठी खाने घुस जायेंगे ।

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