Facts on Gyanvapi, Varanasi – ज्ञानवापी मंदिर या मस्जिद?

कुछ दिनों से देखा जा रहा है की देश में धर्म के आधार पर बड़ी चर्चा चल रही है l चाहे कश्मीर के मुद्दे पर हो या फिर बाबरी मस्जिद से राम मंदिर तक के सफर की चाहे मथुरा की शाही ईदगाह का मुद्दा हो या काशी विश्वनाथ और कथित ज्ञानवापी मस्जिद सभी मुद्दे धर्म की एक अलग ही दिशा तय करने और देश को एक अलग दिशा में ले जा रहे है।

अब सवाल ये उठता है की आखिर सही किसे कहा जाये ? तो देश के सभी नेता, सभी मौलाना, सभी साधु संत और सभी नागरिक अपनी अपनी बात रख रहे है। दफ्तर हो या चाय की दुकान, गली मोहल्ला हो या नेताओं की राजनितिक सभाएं सभी जगह लोग अपनी अपनी जानकारी के अनुसार बात कर रहे है। लेकिन आम जनता आखिर किसे सही माने किसे गलत, ये सवाल बड़ा है। आज हम इन्ही कुछ मुद्दों में से एक पर रौशनी डालने की कोशिश करेंगे।



कथित ज्ञानवापी मस्जिद मुद्दा

हाल ही में एक मुद्दा जो चर्चा में जोरों पर है, वह है ज्ञानवापी मस्जिद जो की काशी विश्वनाथ मंदिर से सटा हुआ या ये कहा जो सकता है की मंदिर की सीमा में ही स्थित है। सैंकड़ो सालों से मुस्लिम समाज वह इबादत करता आ रहा है। इस मस्जिद पर हिन्दू समाज ने ये दावा किया है की ये मंदिर को तोड़कर मस्जिद का रूप दिया गया है तथा इस जगह को मंदिर मानकर हिन्दू समझ को सौंपा जाना चाहिए। इसके लिए हिन्दू समाज ने सालों से अदालत में याचिकाएं लगाई पर कभी इस मुद्दे पर कोई खास प्रगति नहीं हुई क्योकि देश में सदा मुस्लिम समाज के पक्ष में कड़ी कांग्रेस सरकार का राज रहा। यही कारन है देश में कभी भी जनता को ऐसे मामलों की सही जानकारी नहीं मिल पाई। कांग्रेस ने सदैव देश को गलत इतिहास को पढ़ने समझने पर मजबूर किया।

आज मोदी – योगी की सरकार आने से ये मुमकिन हो पाया की देश की जनता को इतिहास के उन काले पन्नो को पढ़ने और समझने का अवसर मिला है और अपने ऊपर हुए अत्याचारों के खिलाफ उठ खड़े होने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का मौका मिला है।

आज देश की अदालतों ने भी हिन्दू समाज के दर्द को समझने की कोशिश की तथा पहले बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने का फैसला हो या अब ज्ञानवापी मामले में सर्वे का फैसला हो। जबसे ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे का फैसला अदालत ने लिया देश में मुस्लिम समाज के ठेकेदारों या ये कहलें मुगलिया खून में एक अलग ही उबाल देखने को मिला। सवाल ये है की अगर मस्जिद है तो सर्वे करने में क्या परेशानी हो सकती है? आखिर मस्जिद में सर्वे किया जायेगा तो इस्लाम से जुड़े निशान और व्यवस्था मिलेगी, इस्लामी धर्म से जुडी भवन शैली मिलेगी। जब यही सब मिलना है तो फिर सर्वे के खिलाफ मुस्लिम समाज की ये खलबली समझ से परे है।

पर असल में ये खलबली इसलिए है क्योकि सर्वे हो गया है और जो चीजें मस्जिद परिसर से निकल कर आई है , जो फोटोज में और वीडियो में आया है वह शायद मुस्लिम समाज के लिए चोर की दाढ़ी में तिनके वाली स्थिति पैदा कर रहा है। चाहे मस्जिद के वजूखाने में निकले शिवलिंग की सच्चाई हो ये मस्जिद के गुम्बज के निचे आज भी स्थित मंदिर के गुम्बज की आकृति का होना हो, या फिर जगह जगह स्वस्तिक, कमल, त्रिशूल या संस्कृत में लिखे श्लोंको का मस्जिद की दीवारों पर आज भी होना हो। मुस्लिम समाज इन सभी बातों को देशवासियों के सामने आ जाने के डर से घबराया हुआ है। मुस्लिम समाज ये नहीं चाहता की सर्वे की रिपोर्ट को बहार आने दिया जाये। इसी बात को लेकर राजनितिक रोटी सेक रहे पाकिस्तान परस्त औवेसी हो या पाकिस्तान की जिहादी मानसिकता फैला रहे मौलाना हो व्याकुल हो कर देश में अनर्गल बयानबाजी कर मुस्लिम समाज को भड़का कर देश में आग लगाने का काम कर रहे है। उन्हें डर है जिन मुग़लों के किये अपराधों को ये लोग आज तक छिपा रहे थे वह देश की जनता के सामने आ जाने से न सिर्फ हिन्दू समाज जाग जायेगा अपितु जिन मुस्लिमों को ये लोग आज तक ये बेवकूफ बनाते आये है वह भी इनसे विमुक्त हो जायेंगे।



ज्ञानवापी का क्या अर्थ है? ज्ञानवापी की व्याख्या कहां मिलती है ?

इन सवालों के जवाब जानने के लिए अगर इसके ऐतिहासिक पक्ष को हम देखें तो स्कंद पुराण के काशी खंड में पूर्वार्ध में कथानक राजा मालकेतू और उनकी रानी कलावती का आता है। इस कथानक के माध्यम से यह बताया गया है कि ज्ञानवापी शिव का प्रत्यक्ष रूप होता है, यह ज्ञान को प्रदान करने वाला स्थान है। पुराणों में शिव के जिन 8 रूपों की चर्चा की गई है, ज्ञानवापी भी उनके स्वरूप के रूप में आता है।ज्ञानवापी का स्वरूप जल का रूप होता है, जिसे ज्ञान वर्धन करने वाला स्थान कहा गया है।

ज्ञानवापी भगवान शिव का जल स्वरूप:

जब राजा माल केतू और कलावती यहां आते थे, तो भगवान शिव स्वयं उन्हें उपदेश देते थे। ज्ञानवापी की प्राचीनता अर्ली मीडियम पीरियड तक जाती है। क्योंकि स्कंद पुराण की रचना लगभग आठवीं शताब्दी मानी जाती है। ज्ञानवापी के इतिहास के बारे में बताया गया है कि ज्ञानवापी शिव का जल स्वरूप है। वह ज्ञान को वर्धन करने वाली जगह है। जहां पर शिव ने स्वयं राजा माल केतु और उनकी रानी कलावती को उपदेश दिया था। स्कंद पुराण की बात की जाए तो अविमुक्तेश्वर के आधार पर यह कहा जा सकता है कि काशी में वह गुप्तकाल से शैव संप्रदाय की पूजा होती है। तभी मंदिर का भी निर्माण किया गया था।

ज्ञानवापी का मतलब ज्ञान का कुंड:

ज्ञानवापी मतलब ज्ञान का कुंड होता है। इस कुंड को बनाने का श्रेय सीधे भगवान शिव को जाता है। उन्होंने ही अपने त्रिशूल के माध्यम से उसे जमीन से स्पर्श कराकर वहां पर पानी निर्धारित किया था। उन्होंने यहां पर अविमुक्तेश्वर को स्नान करवाया था, क्योंकि उन्होंने कहा था कि अविमुक्तेश्वर उनका अंश है,वह उनके साथ लंबे समय तक रहेगा। ज्ञानवापी का उल्लेख जल पुराणों में ज्ञानोदय तीर्थ के रूप में है. पुराणों में ऐसा कहा गया है कि जो मरणासन्न प्राणी है वापी के पास बैठकर समीप बैठकर अपनी गोद में उसके सिर को रखकर तारक मंत्र का जाप कराता है, जिससे उसका पुनर्जन्म न हो. कहा जाता है कि है काशी जन्म लेने वाला मुक्त हो जाता है.

ज्ञानवापी काशी के 9 वापी में से एक:

स्कंद पुराण के काशी खंड में अट्ठासी हृद्य 62 कुंडो का स्पष्ट उल्लेख है। शिव पुराण के अध्याय 21 पृष्ठ संख्या 1093 में साफ लिखा है कि भगवान शिव अपने शिवलिंग से यह कह रहे हैं कि मेरे अंश वाले ज्योतिर्लिंग अविमुक्तेश्वर तुम किसी भी मूल्य पर काशी को मत छोड़ना। डॉ प्रवीण भारद्वाज ने बताया कि काशी में 9 वापी थे। लेकिन लिंग पुराण के मुताबिक सिर्फ 6 वापी का उल्लेख मिलता है। जिसमें से एक काशीपुरा में मौजूद था.जेष्ठा वापी अब लुप्त हो गया है। इसके अलावा दूसरा वापी ककोर्ट वापी जो कि महाभाष्य की संरचना करने वाले पातंजलि जी के निवास स्थान पर है, जिसे नाग कुंआ कहा जाता है।

आखिर ज्ञानवापी मंदिर से मस्जिद कैसे बनी?

बनारस अर्थात काशी मुग़ल आक्रांताओं के हमलों के लिए एक टारगेट की भांति रहा है। प्रथम मुग़ल आक्रमण मुस्लिम आक्रांता अहमद नियल्तगीन ने १०३३ में किया था जिसे महमूद गजनी के बेटे मसूद ने भारत का गवर्नर नियुक्त किया था। अहमद नियल्तगीन की सेना ने आधे दिन में ही पुरे बनारस को लूट लिया था। इसके बाद भी मुस्लिम आक्रांताओं की नजर बनारस पर रही। ११९४ में बनारस के राजा जयचंद को शिहाबुद्दीन गोरी उर्फ़ मोहम्मद गोरी जो की अफगान सेना का सेनापति था ने चंदवार के युद्ध में हरा दिया। इस के बाद भी मुस्लिम हमले जारी रहे। मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने ना सिर्फ बनारस पर हमला किया बल्कि हजारों हिन्दू मंदिरों को तोड़ दिया, जिसमे विश्वेश्वर मंदिर भी शामिल था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने विश्वेश्वर मंदिर को तोड़कर उसकी जगह रजिया सुल्ताना नामक मस्जिद बनाई। बनारस को लूट कर १४०० ऊंटों पर लूट का माल ले जाया गया।

१५९१ से १५९६ का समय बनारस के लिए कुछ रहत लाया जिसमे अकबर से शासन में बनारस में कुछ मंदिरों का निर्माण किया गया। उसी समय आमेर के राजा मान सिंह ने विश्वेश्वर मंदिर को समर्पित एक मंदिर का निर्माण करवाया जिसे मान मंदिर का नाम दिया गया। यह मंदिर उसी रजिया सुल्ताना मस्जिद के पास बनाया गया। १५८० में राजा टोडरमल ने जगद्गुरु नारायण भट्ट के कहने पर विश्वेश्वर मंदिर का फिर से निर्माण फिर से करवाया।



फिर आया मुस्लिम आक्रांता व लुटेरे अल्लाउद्दीन खिलज़ी का राज, उस के समय में वाराणसी के मंदिरों में पूजा पाठ करने वाले हिन्दू पुजारियों पर मुस्लिम अधिकारीयों का अत्याचार शुरू हुआ उन्होंने पुजारियों और पंडितों को परेशान करना व मंदिरों से भागना शुरू किया। इस बात की जानकारी हिन्दू पुजारियों ने अल्लाउद्दीन खिलज़ी तक पहुंचाई जिस के बाद अल्लाउद्दीन खिलज़ी ने २८ फरवरी १६५९ को एक फरमान जारी किया कि हिन्दू पुरारियों को परेशान ना किया जाये। इसके साथ ही साथ उसने फरमान में ये भी आदेश दिया कि आगे से कोई नया हिन्दू मंदिर नहीं बनाया जाये।

अल्लाउद्दीन की यह महानता वाली नौटंकी ज्यादा ना चल पाई और साल १६५९ के अंत में उसने ६ से ७वी शताब्दी पुराने कीर्ति विश्वेश्वर मंदिर को तोड़ कर गिरा दिया और उसके मलबे से उसी स्थान पर आलमगीर मस्जिद का निर्माण करवाया। यह आलमगीर मस्जिद रत्नेश्वर मंदिर के बगल में बनवाई गई जहां आज भी निर्माण की तारीख की जगह अरबी भाषा में १६५९ अंकित है।

साल १९६९ की ९ अप्रैल की तारीख, उस दिन अल्लाउद्दीन खिलज़ी ने फिर से एक नया फरमान जारी कर बनारस के फौजदार को यह आदेश दिया की बनारस के सभी मंदिर व शिक्षण संस्थानों को गिरा दिया जाये। इस फरमान के आदेश का पालन करते हुए बनारस के फौजदार ने सैकड़ों मंदिर व शिक्षण संस्थानों को गिरा दिया जिनमे प्रसिद्द काशी विश्वनाथ मंदिर व बिंदुमाधव मंदिर भी शामिल थे। विश्वनाथ मंदिर के स्थान पर एक मस्जिद बनवाई गई जिसमे दो ऊँची मीनारें बनवाई गई। इसके उपरांत अल्लाउद्दीन खिलज़ी ने बनारस के नाम को बदल कर मुहम्मदाबाद कर दिया था। बाद में वह के सिक्कों पर भी यही नाम अंकित करवाया गया।

यही विश्वनाथ मंदिर के स्थान पर बनी मस्जिद ज्ञानवापी मस्जिद के नाम से जानी जाती है। इस पूरी जानकारी को बनारस के डिस्ट्रिक गजेटियर १९६५ में खुद कांग्रेस सरकार ने प्रकाशित करवाया था जो की सरकारी रूप से एक पुख्ता सबूत है इस पुरे मामले में हिन्दू पक्ष को सही साबित करने के लिए।

इस पुरे मुद्दे पर अदालत का क्या रुख रहता है और सर्वे रिपोर्ट आम आदमी को मिलने के बाद देश में क्या माहौल बनता है ये तो समय ही बताएगा।

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