चौहान वंश का परिचय
à¤à¤• à¤à¤¸à¤¾ पà¥à¤°à¤®à¥à¤– राजपूत राजवंश जिसने चार शताबà¥à¤¦à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ तक à¤à¤¾à¤°à¤¤ के कà¥à¤› हिसà¥à¤¸à¥‹à¤‚ पर शासन किया वह था चौहान राजवंश। à¤à¤• à¤à¤¸à¤¾ शकà¥à¤¤à¤¿à¤¶à¤¾à¤²à¥€ राजवंश जिसने à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति तथा à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ इतिहास पर अमिट पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ छोड़ा। चौहान राजवंश का राजपूतों के 36 राजवंशों में à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ इतिहास में विशेष महतà¥à¤¤à¥à¤µ रहा है। चौहान राजवंश ने राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ सहित दिलà¥à¤²à¥€ के समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ के रूप में à¤à¥€ 7वीं शताबà¥à¤¦à¥€ से लेकर à¤à¤¾à¤°à¤¤ की सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ तक शासन किया।
चमà¥à¤®à¤¨ राजपूतों के राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में कà¥à¤› हिसà¥à¤¸à¥‹à¤‚ पर अधिकार व शासन सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ करने के साथ ही 8वीं शताबà¥à¤¦à¥€ में चौहान वंश की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ हà¥à¤ˆà¥¤ चमà¥à¤®à¤¨ राजपूतों को अपनी बहादà¥à¤°à¥€ तथा रण कौशल के लिठजाना जाता है। चौहान वंश ने अपने शासन काल में अपने कौशल से अपने कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° व पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ का विसà¥à¤¤à¤¾à¤° कर अपना अधिकार सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया, जो कि वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ में हरियाणा, मधà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ तथा उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ में आते है।
चौहान वंश के पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ शासक हà¥à¤ पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ चौहान जिनका 12वीं शताबà¥à¤¦à¥€ तक अजमेर के साथ ही दिलà¥à¤²à¥€ पर à¤à¥€ शासन रहा। चौहान वंश की विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ शाखाà¤à¤‚ थी जिनमे चालà¥à¤•à¥à¤¯ चौहान, शाकमà¥à¤à¤°à¥€ चौहान व अजमेर चौहान à¤à¥€ है।
पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ चौहान को à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ इतिहास के अतà¥à¤¯à¤‚त महान योदà¥à¤§à¤¾à¤“ं में से à¤à¤• माना जाता है। उनकी वीरता, संयम, आदर और तà¥à¤°à¥à¤•ी शासक मà¥à¤¹à¤®à¥à¤®à¤¦ गोरी के खिलाफ उनकी पौराणिक लड़ाइयों को याद किया जाता है, जिसमे उसने उतà¥à¤¤à¤°à¥€ à¤à¤¾à¤°à¤¤ पर अपने शासन की चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¥€ दी थी। पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ चौहान की मà¥à¤¹à¤®à¥à¤®à¤¦ गोरी के खिलाफ लड़ाई अतà¥à¤¯à¤‚त संघरà¥à¤·à¤ªà¥‚रà¥à¤£ थी, जिससे दोनों पकà¥à¤·à¥‹à¤‚ को à¤à¤¾à¤°à¥€ नà¥à¤•सान हà¥à¤†à¥¤
अपने शासन काल में विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ धरà¥à¤®à¤¸à¥à¤¥à¤²à¥‹à¤‚, मंदिरों के साथ ही कही गà¥à¥‹à¤‚-किलों के निरà¥à¤®à¤¾à¤£ करने तथा उनमे उनà¥à¤¨à¤¤ कलातà¥à¤®à¤•ता का उपयोग करने की वजह से यह जाहिर है कि चौहान वंश वासà¥à¤¤à¥à¤•ला, संसà¥à¤•ृति व धरà¥à¤® के महान संरकà¥à¤·à¤• थे तथा उनका महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ योगदान रहा। उनके शासन काल में कई महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ निरà¥à¤®à¤¾à¤£ हà¥à¤ जिनमे पà¥à¤°à¤®à¥à¤– रूप से अजमेर का तारागॠकिला तथा उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ में कालिंजर किला है।
माना जाता है कि कई बार चौहानो से हार का सामना करने के बाद छल दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ चौहान को मà¥à¤¸à¥à¤²à¤¿à¤® आकà¥à¤°à¤®à¤£à¤•ारियों ने ११९२ इसà¥à¤µà¥€ में तराइन की दूसरे यà¥à¤¦à¥à¤§ में पराजित किया तथा बंदी बनाकर अपने साथ ले गà¤à¥¤ वहां उनके साथ कà¥à¤°à¥‚रता पूरà¥à¤µà¤• वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤° किया गया। उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अà¤à¤§à¤¾ करने के बावजूद उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने चंद वरदाई की कविता की सहायता से मोहमà¥à¤®à¤¦ गौरी को मारकर दोनों ने à¤à¤• दूसरे को ख़तà¥à¤® कर लिया। 13वीं शताबà¥à¤¦à¥€ में मà¥à¤¸à¥à¤²à¤¿à¤® आकà¥à¤°à¤¾à¤‚ताओं के साथ यà¥à¤¦à¥à¤§à¥‹à¤‚ में कई बार हार के बाद चौहान वंश का पतन हो गया। इसी की साथ उतà¥à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤°à¤¤ के कई राजपूत वंश अपने पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ व शकà¥à¤¤à¤¿ को खोते रहे। इतना होते हà¥à¤ à¤à¥€ आज चौहान वंश अपनी समृदà¥à¤§ सांसà¥à¤•ृतिक परंपराओं को बनाठहà¥à¤ राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨, उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ और मधà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ में महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ उपसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ के साथ à¤à¤¾à¤°à¤¤ के विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में फैला हà¥à¤† है तथा समाज की सà¤à¥€ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में अपना योगदान दे रहा है।
उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ :-
चौहान वंश की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ के समà¥à¤¬à¤‚ध में विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ उलà¥à¤²à¥‡à¤– पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ होते हैं। à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¾à¤£ में यह वरà¥à¤£à¤¿à¤¤ है कि समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ अशोक के पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के काल में राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के आबू परà¥à¤µà¤¤ पर कानà¥à¤¯à¤•à¥à¤¬à¥à¤œ (कनà¥à¤¨à¥Œà¤œ) के संतों व बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¤£à¥‹à¤‚ ने à¤à¤• बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¹à¥‹à¤® (यजà¥à¤ž) किया, जिससे चार कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ हà¥à¤, जिसमें à¤à¤• चाहूमन -चौहान à¤à¥€ था। चनà¥à¤¦ वरदाई à¤à¥€ चौहानों की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ को आबू के यजà¥à¤ž से संबंधित मानते हैं, जिसका वरà¥à¤£à¤¨ पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œà¤°à¤¾à¤¸à¥‹ में मिलता है। विदेशी दारà¥à¤¶à¤¨à¤¿à¤• कà¥à¤• के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° इस यजà¥à¤ž में विदेशियों को धरà¥à¤® परिवरà¥à¤¤à¤¨ कर हिनà¥à¤¦à¥‚ धरà¥à¤® गà¥à¤°à¤¹à¤£ करवाया गया, इसलिठवे इनà¥à¤¹à¥‡ विदेशी मानते थे। पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨à¤•ाल में यजà¥à¤ž कारà¥à¤¯ को निरà¥à¤µà¤¿à¤˜à¥à¤¨ समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ करने के लिठकà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को नियत किया जाता था, अतः आबू परà¥à¤µà¤¤ पर चार कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को यजà¥à¤ž के रकà¥à¤·à¤¾ के लिठतैनात किया गया, ताकि यजà¥à¤ž निरà¥à¤µà¤¿à¤˜à¥à¤¨ समà¥à¤ªà¤¨ हो या वैदिक धरà¥à¤® के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ तथा बौदà¥à¤§ धरà¥à¤® के मानने वाले चार कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को वैदिकधरà¥à¤® का संकलà¥à¤ª कराया गया हो। इन कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के वंशजों को आगे जाकर उनà¥à¤¹à¥€ कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के नाम से चौहान, परमार, पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤°, चालà¥à¤•à¥à¤¯ कहा गया हैं। अतः कà¥à¤• के समान अनà¥à¤¯ दारà¥à¤¶à¤¨à¤¿à¤•ों की यह राय की विदेशियों को शà¥à¤¦à¥à¤§ कर धरà¥à¤® परिवरà¥à¤¤à¤¨ कर कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ बनाया गया, यह विचार सà¥à¤µà¥€à¤•ार नहीं किया जा सकता।
सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚श के उपवंश चौहानवंश में राजा विजयसिंह हà¥à¤à¥¤ डॉ. परमेशà¥à¤µà¤° सोलंकी का हरपालीया कीरà¥à¤¤à¤¿à¤¸à¥à¤¤à¤®à¥à¤ का मूल शिलालेख संबंधित लेख में (मरू à¤à¤°à¥à¤¤à¥€ पिलानी) अचलेशà¥à¤µà¤° शिलालेख (वि. 1377) चौहान आसराज के पà¥à¤°à¤¸à¤‚ग में लिखा गया है।
राघरà¥à¤¯à¤¥à¤¾ वंश करोहिवंशे सूरà¥à¤¯à¤¸à¥à¤¯à¤¶à¥‚रोà¤à¥‚तिमंडले——गà¥à¤°à¥‡ |
तथा बà¤à¥‚वतà¥à¤° पराकà¥à¤°à¤®à¥‡à¤£à¤¾ सà¥à¤µà¤¾à¤¨à¤¾à¤®à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§: पà¥à¤°à¤à¥à¤°à¤¾à¤®à¤¸à¤°à¤¾à¤œà¤ƒ || 16 ||
अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤ पृथà¥à¤µà¥€à¤¤à¤² पर जिस पà¥à¤°à¤•ार पहले सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚श में पराकà¥à¤°à¤®à¥€ (राजा) रघॠहà¥à¤†, उसी पà¥à¤°à¤•ार यहाठपर (इस वंश) में अपने पराकà¥à¤°à¤® से पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ कीरà¥à¤¤à¤¿à¤µà¤¾à¤²à¤¾ आसराज (नामक) राजा हà¥à¤† |
इन शिलालेखों व साहितà¥à¤¯ से मालूम होता है कि चौहान सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी रघॠके कà¥à¤² में थे | हमीर महाकावà¥à¤¯, हमीर महाकावà¥à¤¯ सरà¥à¤— | अजमेर के शिलालेख आदि à¤à¥€ चौहानों को सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी ही सिदà¥à¤§ करते है | (अ) राजपूताने चौहानों का इतिहास पà¥à¤°à¤¥à¤® à¤à¤¾à¤—- ओà¤à¤¾ पृ. 64 (ब) हिनà¥à¤¦à¥‚ à¤à¤¾à¤°à¤¤ का उतà¥à¤•रà¥à¤· सी. वी. वैदà¥à¤¯ पृ. 147) इन आधारों पर खà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¤¿ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ विदà¥à¤µà¤¾à¤¨ पं. गौरीशंकर ओà¤à¤¾, सी. वी. वैदà¥à¤¯ आदि ने चौहानों को सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ सिदà¥à¤§ किया है | (हिनà¥à¤¦à¥‚ à¤à¤¾à¤°à¤¤ का उतà¥à¤•रà¥à¤· पृ. 140) अतः कहा जा सकता है कि चौहान सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी थे |
चौहानो का पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ इतिहास
कà¥à¤› दारà¥à¤¶à¤¨à¤¿à¤•ों के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° या मन जाता है कि धरती पर पापों के अधिक बढ़जाने से तथा राकà¥à¤·à¤¸à¥‹à¤‚ के बलवान हो जाने से देवता à¤à¤¯à¤à¥€à¤¤ हो गठतथा à¤à¤—वान की पà¥à¤°à¤¾à¤°à¥à¤¥à¤¨à¤¾ करने हेतॠआबू परà¥à¤µà¤¤ शिखर पर à¤à¤•तà¥à¤° हà¥à¤à¥¤ यहाठपर à¤à¥ƒà¤—à¥-ऋषि, बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾ तथा समसà¥à¤¤ ऋषियों ने मिलकर वैदिक विधि-विधान से अगà¥à¤¨à¤¿à¤•à¥à¤£à¥à¤¡ में आहà¥à¤¤à¤¿ दी। जिससे चार कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ राजा पà¥à¤°à¤•ट हà¥à¤¯à¥‡à¥¤ चौथे राजा की चारों à¤à¥à¤œà¤¾à¤“ं में शसà¥à¤¤à¥à¤° थे। यह माना जाता है कि परशà¥à¤°à¤¾à¤® दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ पृथà¥à¤µà¥€ को 21 बार कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¥€à¤¯ विहीन करने के बाद ऋषि-मà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ की विनती से à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ विषà¥à¤£à¥ ने ही सà¥à¤µ-अंश कलाओं से देवताओं के कारà¥à¤¯ करने, राकà¥à¤·à¤¸à¥‹à¤‚ को नषà¥à¤Ÿ करने, धरà¥à¤® का विसà¥à¤¤à¤¾à¤° करने तथा पाप का विनाश करने के लिठअगà¥à¤¨à¤¿ के समान तेज को धारण कर चतà¥à¤°à¥à¤à¥à¤œ-आयà¥à¤§à¥‹à¤‚ सहित चौहान रूप में पà¥à¤°à¤•ट हà¥à¤à¥¤
उसी समय, सूà¤à¥€à¤¨à¤° नामक à¤à¤• सोमवंशी (चनà¥à¤¦à¥à¤°à¤µà¤‚शी) राजा थे। उनकी à¤à¤• पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ थी, जिनका नाम संगूया (संजà¥à¤žà¤¾) था। संगूया (संजà¥à¤žà¤¾) का विवाह उन चतà¥à¤°à¥à¤à¥à¤œ (सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी) के साथ हà¥à¤†à¥¤ चतà¥à¤°à¥à¤à¥à¤œ और संगूया (संजà¥à¤žà¤¾) के चाह ऋषि का जनà¥à¤® हà¥à¤†, जिसका नाम चाह ऋषि था। चाह ऋषि ने वतà¥à¤¸ ऋषि से दीकà¥à¤·à¤¾ ली, इसलिठचौहानों का गोतà¥à¤° वतà¥à¤¸ हà¥à¤†à¥¤
पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œà¤°à¤¾à¤¸à¥‹ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤°: à¤à¤• दिन, अगसà¥à¤¤à¥à¤¯, गौतम, वशिषà¥à¤ , विशà¥à¤µà¤¾à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤° और अनà¥à¤¯ महान ऋषियों ने अरà¥à¤¡à¤¾ (माउंट आबू) पर à¤à¤• बड़ा यजà¥à¤ž समारोह शà¥à¤°à¥‚ किया। दानवों ने मांस, रकà¥à¤¤, हडà¥à¤¡à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ और मूतà¥à¤° को पà¥à¤°à¤¦à¥‚षित करके हवन समारोह को बाधित किया। इन राकà¥à¤·à¤¸à¥‹à¤‚ से छà¥à¤Ÿà¤•ारा पाने के लिà¤, वशिषà¥à¤ ने à¤à¤• होम अनà¥à¤·à¥à¤ ान किया। इसके कारण पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤° (“दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤ªà¤¾à¤²”) नामक à¤à¤• नायक की उपसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ हà¥à¤ˆ, जिसे वशिषà¥à¤ ने महल की ओर जाने वाले मारà¥à¤— पर रखा। इसके बाद, चालà¥à¤•à¥à¤¯ नामक à¤à¤• अनà¥à¤¯ नायक बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾ की खोखली हथेली से पà¥à¤°à¤•ट हà¥à¤†à¥¤ अंत में, à¤à¤• तीसरा नायक दिखाई दिया, जिसने पावरा, परमार (या परा-मार, “दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨ का कातिल”) नाम के ऋषि को बà¥à¤²à¤¾à¤¯à¤¾à¥¤ हालांकि, ये तीनों नायक राकà¥à¤·à¤¸à¥‹à¤‚ को रोकने में सकà¥à¤·à¤® नहीं थे। वशिषà¥à¤ ने फिर à¤à¤• नठनायक का आवà¥à¤¹à¤¾à¤¨ करने के लिठà¤à¤• नया अगà¥à¤¨à¤¿ कà¥à¤‚ड बनाया, और अगà¥à¤¨à¤¿ को आहà¥à¤¤à¤¿ अरà¥à¤ªà¤£ किया। इस अगà¥à¤¨à¤¿ से à¤à¤• और कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ पà¥à¤°à¤•ट हà¥à¤†à¥¤ इस चौथे सशसà¥à¤¤à¥à¤° नायक के पास à¤à¤• तलवार, à¤à¤• ढाल, à¤à¤• धनà¥à¤· और à¤à¤• तीर था। वशिषà¥à¤ ने उनका नाम चवणा-चौहान रखा, वैदिक मंतà¥à¤°à¥‹à¤šà¤¾à¤° के साथ उनका राजà¥à¤¯à¤¾à¤à¤¿à¤·à¥‡à¤• किया गया और फिर उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ राकà¥à¤·à¤¸à¥‹à¤‚ से लड़ने का आदेश दिया। ऋषि ने à¤à¥€ देवी आशापà¥à¤°à¤¾ से उस कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ की मदद करने के लिठआगà¥à¤°à¤¹ किया। चौहान ने राकà¥à¤·à¤¸ यनà¥à¤¤à¥à¤°à¤•ेतॠका वध किया, जबकि देवी ने राकà¥à¤·à¤¸ धमरकेतॠका वध किया। यह देखते ही बाकी राकà¥à¤·à¤¸ à¤à¤¾à¤— गà¤à¥¤ चौहान की वीरता से पà¥à¤°à¤¸à¤¨à¥à¤¨ होकर, देवी उनकी कà¥à¤²à¤¦à¥‡à¤µà¥€ बनने के लिठसहमत हà¥à¤ˆà¤‚। पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ चौहान, ‘पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ रासो’ के मà¥à¤–à¥à¤¯ नायक, इस वंश में पैदा हà¥à¤ थे।
इस पà¥à¤°à¤•ार चौहानों की पहचान यजà¥à¤ž की अगà¥à¤¨à¤¿ से पà¥à¤°à¤•ट होने से अगà¥à¤¨à¤¿à¤µà¤‚शी, सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ अशोक के पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के समय हà¥à¤ यजà¥à¤ž-हवन से पà¥à¤°à¤•ट होने से सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी और à¤à¤• सोमवंशी (चनà¥à¤¦à¥à¤°à¤µà¤‚शी) राजा की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ संगूया (संजà¥à¤žà¤¾) से इनà¥à¤¹à¥‡ चंदà¥à¤°à¤µà¤‚शी माना गया।
शाखा – कातà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¤¨à¥€
पà¥à¤° – तà¥à¤°à¤¿à¤ªà¥à¤°à¤¾
सूतà¥à¤° – गोà¤à¤¿à¤²
वरà¥à¤£ – कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¥€à¤¯
धरà¥à¤® – सातà¥à¤µà¤¿à¤•
कà¥à¤²à¤¦à¥‡à¤µà¥€ – माता आशापà¥à¤°à¤¾
परà¥à¤µà¤¤ – आबू
पà¥à¤°à¤¿à¤¯ – शिव
पतà¥à¤° – विलà¥à¤µ
इस चौहान के वंशज अपने खà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¤¿ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ पूरà¥à¤µà¤œ चौहान के नाम पर चौहान ही कहलाये |
चौहानों के राजà¥à¤¯ :-
1. अजमेर राजà¥à¤¯ :-
पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ पà¥à¤°à¤¥à¤® के पà¥à¤¤à¥à¤° अजयराज हà¥à¤ | उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने उजà¥à¤œà¥ˆà¤¨ पर आकà¥à¤°à¤®à¤£ कर मालवा के परमार शासक नरवरà¥à¤®à¤¨ को पराजित किया | अपनी सà¥à¤°à¤•à¥à¤·à¤¾ के लिठउनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡à¤‚ 1113 ई.वि. 1170 के लगà¤à¤— अजमेरà¥-अजमेर के सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ की
सांà¤à¤°–अजमेर राजवंश :-
2. रणथमà¥à¤à¥Œà¤° राजà¥à¤¯ :-
पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ के पà¥à¤¤à¥à¤° गोविनà¥à¤¦à¤°à¤¾à¤œ ने रणथमà¥à¤à¥Œà¤° दà¥à¤°à¥à¤— को हसà¥à¤¤à¤—त किया |
रणथंà¤à¥Œà¤° राजवंश :-
3. नाडौल राजà¥à¤¯ :-
सामà¥à¤à¤° के चौहान वाकà¥à¤ªà¤¤à¤¿à¤°à¤¾à¤œ (पà¥à¤°à¤¥à¤®) के बड़े पà¥à¤¤à¥à¤° सिंहराज पिता के उतà¥à¤¤à¤°à¤¾à¤§à¤¿à¤•ारी हà¥à¤ और छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° लाखन (लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£) ने नाडौल (जिला पाली) पर अधिकार कर अलग राजà¥à¤¯ की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ की | जिसके समय के दो शिलालेख 1014 वि. व 1036 वि. के नाडौल में मिले है | (चौहान कà¥à¤² कलà¥à¤· दà¥à¤°à¥à¤® पृ. ४८ (मंगलसिंह देवड़ा के सौजनà¥à¤¯ से) लाखन के यों तो 24 पà¥à¤¤à¥à¤° माने गठहै | कहा जाता है उनमे 24 शाखायें उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ हà¥à¤ˆ पर इनका कोई à¤à¥€ वृतà¥à¤¤à¤¾à¤‚त उपलबà¥à¤§ नहीं है | लाखन के पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में शिलालेखों तथा खà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥‹à¤‚ में चार नाम मिलते हैं :-शोà¤à¤¿à¤¤, विगà¥à¤°à¤¹à¤ªà¤¾à¤², अशà¥à¤µà¤°à¤¾à¤œ (आसराज, अधिराज, आसल) तथा जैता |
नाडौल राजवंश :-
4. जालौर राजà¥à¤¯ :-
जालौर à¤à¥€ चौहानों का मà¥à¤–à¥à¤¯ राजà¥à¤¯ था | वि. सं. 1238 ई. 1281 नाडौल के अशà¥à¤µà¤°à¤¾à¤œ के पौतà¥à¤° और आलà¥à¤¹à¤£ के पà¥à¤¤à¥à¤° कीरà¥à¤¤à¤¿à¤ªà¤¾à¤² परमारों से जालौर छीन कर सà¥à¤µà¤¯à¤‚ राजा बन बैठे | जालौर का पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ नाम जाबालीपà¥à¤° व किले का नाम सà¥à¤µà¤°à¥à¤£à¤—िरि मिलता है | यहाठसे निकलने वाले चौहान ‘सोनगिरा’ नाम से विखà¥à¤¯à¤¾à¤¤ हà¥à¤ |
जालौर राजवंश
5. चनà¥à¤¦à¤µà¤¾à¤¡à¤¼–राजà¥à¤¯ :-
उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ में आगरा के पास चनà¥à¤¦à¤µà¤¾à¤¡à¤¼ हैं | वि. सं. 1251 ई. 1194 जयचनà¥à¤¦à¥à¤° गहड़वाल मोहमà¥à¤®à¤¦ गोरी से इसी सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर पराजित हà¥à¤ थे | चनà¥à¤¦à¤µà¤¾à¤¡à¤¼ से समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§à¤¿à¤¤ कवि शà¥à¤°à¥€à¤§à¤° का वि. 1230 का लिखा हà¥à¤† गà¥à¤°à¤‚थ ‘à¤à¤¾à¤—विसयत कहा’ है | परनà¥à¤¤à¥ इसमें चनà¥à¤¦à¤µà¤¾à¤¡à¤¼ पर शासन करने वाले किसी राजà¥à¤¯ का नाम नहीं है | कवि लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ ने वि. सं. 1313 में अण बयरयणपईव (अणवà¥à¤°à¤¤-रतà¥à¤¨-पà¥à¤°à¤¦à¥€à¤ª) की रचना यहीं की थी | (चनà¥à¤¦à¤µà¤¾à¤¡ का चौहान राजà¥à¤¯ डॉ. दशरथ शरà¥à¤®à¤¾ का अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤·à¤£-बरदा जनवरी 1964 पृ. 84) लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ ने चौहान राजा à¤à¤¾à¤°à¤¤à¤ªà¤¾à¤² के लिठलिखा कि à¤à¤°à¤¤à¤ªà¤¾à¤² लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ के समय के शासक आहवमलà¥à¤² चौहान से तीन पीढ़ी पूरà¥à¤µ था | (à¤à¤°à¤¤à¤ªà¤¾à¤²-जाहड़-बलà¥à¤²à¤¾à¤¸-आहवमलà¥à¤²) इससे जाना जा सकता है कि पà¥à¤°à¤¤à¤¿ पीढ़ी 20 शासन काल के हिसाब से 60 वरà¥à¤· पीछे ले जाने पर 1313-60=1253 वि. होता हैं | इस समय (1253 वि. ) में à¤à¤°à¤¤à¤ªà¤¾à¤² यहाठशासन कर रहा था | संà¤à¤µ है इससे पूरà¥à¤µ à¤à¥€ यहाठचौहानों का राजà¥à¤¯ रहा होगा |
6. à¤à¤¡à¤¼à¥Œà¤‚च (गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤) राजà¥à¤¯ :-
à¤à¤¡à¤¼à¥Œà¤‚च (गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤) कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° के हांसोट गांव से चौहान शासक à¤à¤°à¥à¤¤à¤µà¤¢à¤¼à¤¢ (à¤à¤°à¥à¤¤à¤µà¤¦à¥à¤§) दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ का दानपातà¥à¤° मिला है जो वि. सं. 813 का हैं | इस दानपातà¥à¤° से पाया जाता है कि à¤à¤°à¥à¤¤à¤µà¤¢à¤¼à¤¢ दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ नागावलोक का सामंत था | इससे जाना जा सकता है कि 813 वि. में चौहानों का à¤à¤¡à¤¼à¥Œà¤š के आस पास राजà¥à¤¯ था |
7. धोलपà¥à¤° (धवलपà¥à¤°à¥€) राजà¥à¤¯ :-
राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में विकà¥à¤°à¤® की 9 वीं शताबà¥à¤¦à¥€ में धोलपà¥à¤° के पास चौहान शासन करते थे |
8. पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¤—ढ़ (चितà¥à¤¤à¥Œà¤¡à¤¼) राजà¥à¤¯ :-
वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¤—ढ़ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° पर à¤à¥€ वि. की 11 वीं शताबà¥à¤¦à¥€ की पà¥à¤°à¤¥à¤® चरण में चौहानों का राजà¥à¤¯ था | यह चौहान पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤° à¤à¥‹à¤œà¤¦à¥‡à¤µ के सामंत थे |
9. डबोक (उदयपà¥à¤°) राजà¥à¤¯ :-
वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ डबोक (उदयपà¥à¤°-राज.) कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में 1300 वि. के लगà¤à¤— का चौहान का à¤à¤• शिलालेख | जिससे चौहानों के कई नामों की जानकारी मिलती है | सबसे पहले महेनà¥à¤¦à¥à¤°à¤ªà¤¾à¤², सà¥à¤°à¥à¤µà¤—पाल, मंथनसिंह, कà¥à¤·à¤¾à¤¤à¥à¤°à¤µà¤°à¥à¤®, दà¥à¤°à¥à¤²à¤à¤°à¤¾à¤œ, à¤à¥‚तà¥à¤¤à¤¾à¤²à¤°à¤•à¥à¤·à¥€, समरसिंह, देवारà¥à¤£à¥‹à¤°à¤¾à¤œ व सà¥à¤²à¤•à¥à¤·à¤£à¤ªà¤¾à¤² और छाहड़ का समय 1300 वि. है अतः महेनà¥à¤¦à¥à¤°à¤ªà¤¾à¤² का समय 9 पà¥à¤¶à¥à¤¤ पहले 1200 वि. के लगà¤à¤— पड़ता है अतः यह वंश नाडौल के लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ के पà¥à¤¤à¥à¤° विगà¥à¤°à¤¹à¤ªà¤¾à¤² के पà¥à¤¤à¥à¤° महेनà¥à¤¦à¥à¤°à¤ªà¤¾à¤² या लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ के पà¥à¤¤à¥à¤° आसराज (अधिरज) के पà¥à¤¤à¥à¤° महेंदà¥à¤° का वंश होना चाहिठ|
10. बूंदी राजà¥à¤¯ :-
हाड़ा चौहानों की पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ खांप रही है लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ नाडौल के पà¥à¤¤à¥à¤° (अशà¥à¤µà¤ªà¤¾à¤², अधिराज) के पà¥à¤¤à¥à¤° माणकराव हà¥à¤ | माणक के बाद कà¥à¤°à¤®à¤¶à¤ƒ समà¥à¤à¤¾à¤°à¤¨ (à¤à¤£à¥à¤µà¤°à¥à¤§à¤¨) जैतराव, अनंगराव, कà¥à¤‚तसी, विजैयपाल व हरराज (हाड़ा) के वंशज हाड़ा कहलाते हैं |
बूंदी राजवंश :-
11. कोटा राजà¥à¤¯ :-
बूंदी राव समरसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° जैतà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह ने à¤à¥€à¤²à¥‹à¤‚ से कोटा का कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° छीना | करà¥à¤¨à¤² टॉड ने लिखा है कि कोटिया नामक à¤à¥€à¤²à¥‹à¤‚ की à¤à¤• जाति के नाम से कोटा नामकरण हà¥à¤† | (टॉड राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ अनà¥. केशवकà¥à¤®à¤¾à¤° ठाकà¥à¤° पृ. 737) जैतà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह के समय से कोटा का राजà¥à¤¯ बूंदी राव रतनसà¥à¤¨à¤¹ के पà¥à¤¤à¥à¤° माधोसिंह ने शौरà¥à¤¯à¤ªà¥‚रà¥à¤£ कारà¥à¤¯ किये | अतः शाहजहां ने माधोसिंह को वि. सं. 1688 में कोटा का सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤° राजà¥à¤¯ दिया | तब से कोटा राजà¥à¤¯ बूंदी राजà¥à¤¯ से अलग हà¥à¤† | शाहजहां ने इसी समय माधोसिंह को ढाई हजार सात व डेढ़ हजार सवार का मनसब à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¨ किया |
कोटा राजवंश :-
12. गागरोण राजà¥à¤¯ :-
गागरोण (कोटा) खींची चौहानों का राजà¥à¤¯ था | खींचियों का सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ जायल जिला (नागौर) रहा है | लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ नाडौल के पà¥à¤¤à¥à¤° आसराज (अशà¥à¤µà¤ªà¤¾à¤², अधिराज) के पà¥à¤¤à¥à¤° माणिकराव हà¥à¤ | माणिकराव के वंशज खींची चौहान कहलाये |
चौहान शबà¥à¤¦ के लिठपà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ अà¤à¤¿à¤²à¥‡à¤–ों में चाहमान शबà¥à¤¦ मिलता है | पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ विजय में चौहान शबà¥à¤¦ के लिठ‘चापमान’ या ‘चापहरि’ शबà¥à¤¦ का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— हà¥à¤† है | इसका अरà¥à¤¥ धनà¥à¤°à¥à¤§à¤° लिया जाता है | चारण अनà¥à¤¶à¥à¤°à¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° अगà¥à¤¨à¤¿à¤•à¥à¤£à¥à¤¡ से उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ चार कà¥à¤²à¥‹à¤‚ में से à¤à¤• है और इस कारण अगà¥à¤¨à¤¿à¤µà¤‚शी हैं | ‘हमà¥à¤®à¥€à¤° महाकावà¥à¤¯â€™ और ‘पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ विजय’ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° चौहान, चाहमान नामक पà¥à¤°à¥à¤· के वंशज हैं और सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ हैं | आठवीं शताबà¥à¤¦à¥€ के पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤®à¥à¤ में चाहमान वंश का राजà¥à¤¯ शाकमà¥à¤à¤°à¥€ (साà¤à¤à¤°) था | इनके अनà¥à¤¯ राजà¥à¤¯ नाडोल, जालोर, धोलपà¥à¤°, पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¤—ढ़, रणथमà¥à¤à¥Œà¤° आदि थे | चौहान अजयराज ने अजयमेरॠ(अजमेर) बसाया था | इस वंश का सबसे पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥€ राजा पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ तृतीय था जो उतà¥à¤¤à¤°à¥€ à¤à¤¾à¤°à¤¤ के अनà¥à¤¤à¤¿à¤® हिनà¥à¤¦à¥‚ समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ के नाम से पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ है | चौहानों की 24 शाखाà¤à¤ हाडा, देवड़ा, निरà¥à¤µà¤¾à¤£, बालिया, à¤à¤¦à¥Œà¤°à¤¿à¤¯à¤¾, निकà¥à¤®à¥à¤à¤¾, बंकट, खीची, मोहिल, सांचोरा, जोजा, पावेचा, à¤à¤¾à¤¦à¤°à¥‡à¤šà¤¾, बोडा, मालाणी, बालेचा, सोनगरा आदि हैं | हाडा चौहानों का राजà¥à¤¯ बूनà¥à¤¦à¥€ व कोटा में तथा देवड़ा चौहानों का राजà¥à¤¯ सिरोही में था |
चौहानों की खाà¤à¤ªà¥‡à¤‚ और उनके ठिकाने
1. चौहान :
सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी चौहान नामक वीर पà¥à¤°à¥à¤· के वंशज चौहान कहलाते हैं | अजमेर, नाडौल, रणथमà¥à¤à¥Œà¤° आदि चौहानों के पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ राजà¥à¤¯ थे | बीकानेर रियासत में घांघू, ददरेवा पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ ठिकाने थे |
2. चाहिल :
चौहान वंश में अरिमà¥à¤¨à¤¿, मà¥à¤¨à¤¿, मानिक व जैपाल चार à¤à¤¾à¤ˆ हà¥à¤ | अरिमà¥à¤¨à¤¿ के वंशज राठके चौहान हà¥à¤ | मानक (माणिकà¥à¤¯) के वंशज शाकमà¥à¤à¤°à¥€ (सांà¤à¤°) रहे | मà¥à¤¨à¤¿ के वंशजों में कानà¥à¤¹ हà¥à¤† | कानà¥à¤¹ के पà¥à¤¤à¥à¤° अजरा के वंशज चाहिल से चाहिलों की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ हà¥à¤ˆ | (कà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤–ां रासा छनà¥à¤¦ सं. 108) रिणी (वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ तारानगर) के आस पास के कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में 12 वीं, 13वीं शताबà¥à¤¦à¥€ में चाहिल शासन करते थे और यह कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° चाहिलवाड़ा कहलाता था | आजकल पà¥à¤°à¤¾à¤¯à¤ƒ चाहिल मà¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨ हैं | गूगामेड़ी (गंगानगर) के पूजारे चाहिल मà¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨ है |
3. मोहिल :
कनà¥à¤¯ चौहान के पà¥à¤¤à¥à¤° बचà¥à¤›à¤°à¤¾à¤œ के किसी वंशज मोहिल के वंशज मोहिल चौहान कहलाये | (कà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤–ां रासा छनà¥à¤¦ सं. 108) मोहिल ने बगडियों से छापर-दोणपà¥à¤° जीता | इनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡à¤‚ 13वीं शदी से लेकर 16वीं शदी विकà¥à¤°à¤®à¥€ के पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤®à¥à¤ तक शासन किया | बीका व बीदा ने मोहिलों का राजà¥à¤¯ समापà¥à¤¤ किया | बाद पà¥à¤°à¤¾à¤¯à¤ƒ मोहिल चौहान मà¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨ बन गठ| पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ कोडमदे माणिकà¥à¤¯à¤°à¤¾à¤µ मोहिल की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ थी |
4. जोड़ चौहान :
का के पà¥à¤¤à¥à¤° सिध के किसी वंशज के जोड़ले पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ से जोड़ चौहानों की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ हà¥à¤ˆ | (कà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤–ां रासा छनà¥à¤¦ सं. 108) वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ं व नरहड़ इलाके पर विकà¥à¤°à¤® की 11वीं शदी से 16वीं शदी के पà¥à¤°à¤¥à¤® दशक तक जोड़ चौहान का अधिकार रहा | 16वीं शदी के पà¥à¤°à¤¾à¤°à¤®à¥à¤ में कायमखानियों ने जोड़ चौहानों से à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ं का इलाका छीन लिया तथा नरहड़ से पठानों का इलाका छीन लिया | चौहानों की यह खांप अब लोप हो चà¥à¤•ी हैं |
5. पूरà¥à¤¬à¤¿à¤¯à¤¾ चौहान :
मैनपà¥à¤°à¥€ (उ.पà¥à¤°.) के पास जो चौहान राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में आये वे यहाठपूरà¥à¤¬à¤¿à¤¯à¤¾ चौहान कहलाये कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि मैनपà¥à¤°à¥€ राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पूरà¥à¤µ में है | मैनपà¥à¤°à¥€ के पास से चनà¥à¤¦à¤µà¤¾à¤¡à¤¼ से चनà¥à¤¦à¤à¤¾à¤¨ चौहान अपने चार हजार वीरों के साथ खानवा यà¥à¤¦à¥à¤§ वि. 1584 में राणा सांगा के पकà¥à¤· में आये तथा मैनपà¥à¤°à¥€ के पास सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ राजौर सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के माणिकचनà¥à¤¦ चौहान à¤à¥€ खानवा यà¥à¤¦à¥à¤§ में राणा सांगा के पकà¥à¤· में लड़े | इन दोनों के वंशज पूरà¥à¤¬à¤¿à¤¯à¤¾ चौहान कहलाते हैं |
6. सांà¤à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ चौहान :
सांà¤à¤° कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° से निकलने के कारण सांà¤à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ चौहान कहलाये |
7. à¤à¤¦à¥Œà¤°à¤¿à¤¯à¤¾ चौहान :
वीर विनाद में शà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤²à¤¦à¤¾à¤¸à¤œà¥€ ने लिखा है कि किसी पूरà¥à¤£à¤°à¤¾à¤œ चौहान ने à¤à¤¦à¥‹à¤° कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° पर अधिकार किया | अतः पूरà¥à¤£à¤°à¤¾à¤œ चौहान के वंशज à¤à¤¦à¥Œà¤°à¤¿à¤¯à¤¾ कहलाये | इटावा (जिला आगरा) कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° व कà¥à¤› à¤à¤¾à¤— जिला à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ं के कà¥à¤› à¤à¤¾à¤— पर à¤à¤¦à¥Œà¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का राजà¥à¤¯ रहा था |
8. रायजादे चौहान :
राजपूत वंशावली में ईशà¥à¤µà¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह मढाढ़ ने चौहानों की खांपों में रायजादे चौहान à¤à¥€ लिखे हैं | उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने लिखा है कि विगà¥à¤°à¤¹à¤°à¤¾à¤œ चतà¥à¤°à¥à¤¥ के पà¥à¤¤à¥à¤° गागेय के बाद अजमेर की गदà¥à¤¦à¥€ पर बैठने वाले राजा के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ विदà¥à¤°à¥‹à¤¹ हà¥à¤† | नागारà¥à¤œà¥à¤¨ चौहान बचकर फतहपà¥à¤°à¤¾ (यà¥.पी.) की तरफ चला गया | वहीं उसने अपना नाम रायमन सहदेव रखा | उसके वंश रायजादे चौहान कहलाये | अब यह बांदा, फतहपà¥à¤°, इलाहबाद आदि जिलों में रहते हैं | (राजपूत वंशावली पृ. 157)
9. चाहड़दे चौहान :
नीमराणा के चौहानों से निकास बताया जाता है परनà¥à¤¤à¥ चाहड़दे सोमेशà¥à¤µà¤° का पà¥à¤¤à¥à¤° और पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ चौहान का à¤à¤¾à¤ˆ था | (टॉडकृत राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ अनà¥. केशवकà¥à¤®à¤¾à¤° ठाकà¥à¤° पृ.429) अतः चाहड़देव की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ उपरà¥à¤¯à¥à¤•à¥à¤¤ चाहड़देव से होनी चाहिठ| ये राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के अलवर कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° व हरियाना में फैले हà¥à¤ हैं |
10. नाडौललिया :
नाडौल के निकास के कारण नाडौलिया चौहान कहलाये | लाखन नाडौल के 24 पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ से चौहानों की 24 खांपों के निकास की बात कही जाती है पर यह मत इतिहास की कसौटी पर सही नहीं उतरता | पर हाठयह सतà¥à¤¯ है कि लाखन के वंशधरों से ही चौहानों की अधिकतर खांपों का निकास हà¥à¤† है |
11. सोनगरा चौहान :
नाडौल राजà¥à¤¯ के संथापक लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ के बाद कà¥à¤°à¤®à¤¶à¤ƒ बलिराज, विगà¥à¤°à¤¹à¤°à¤¾à¤œ, महेनà¥à¤¦à¥à¤°à¤°à¤¾à¤œ, अहिल, अणहिल, जेनà¥à¤¦à¥à¤°à¤°à¤¾à¤œ, आसराज व अलà¥à¤¹à¤£ हà¥à¤ | अलà¥à¤¹à¤£ के पà¥à¤¤à¥à¤° कीरà¥à¤¤à¤¿à¤ªà¤¾à¤² (कीतू) ने जाबालीपà¥à¤° (जालौर) विजय किया | जाबालीपà¥à¤° को सà¥à¤µà¤°à¥à¤£à¤—िरि à¤à¥€ कहा जाता था | इस सà¥à¤µà¤°à¥à¤£à¤—िरि (जालौर) के चौहान कीतू के वंशज सà¥à¤µà¤°à¥à¤£à¤—िरि (सोनगरा) चौहान कहलाये | जालौर इनका मà¥à¤–à¥à¤¯ राजà¥à¤¯ था | सोनगरे चौहान बड़े वीर हà¥à¤ हैं | इनमें कानà¥à¤¹à¤¡à¤¼à¤¦à¥‡à¤µ व उनके पà¥à¤¤à¥à¤° वीरमदे इतिहास में पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ हैं | अखेराज सोनगरा ने सà¥à¤®à¥‡à¤² के यà¥à¤¦à¥à¤§ में à¤à¤• सेनापति के रूप में अदà¥à¤à¥à¤¤ वीरता दिखाते हà¥à¤ वीरगति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ की |
12. अखैराज सोनगरा :
जालौर के पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ शासक कानà¥à¤¹à¤¡à¤¼à¤¦à¥‡à¤µ सांवतसिंह, सोनगरा के पà¥à¤¤à¥à¤° थे | इनके छोटे à¤à¤¾à¤ˆ मालदेव थे | मालदेव के बाद कà¥à¤°à¤®à¤¶à¤ƒ बलवीर, राणा, लोला, सतà¥à¤¤à¤¾, खींवा, रणधीर व अखैराज हà¥à¤ | (नैणसी à¤à¤¾à¤— 1 पृ. 205-206) इसी अखैराज के वंशज अखैराज सोनगरा कहलाते है | अखैराज अपने समय के बड़े वीर हà¥à¤ | ये पाली ठिकाने के अधिपति थे | उनकी पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ जयनà¥à¤¤à¥€ देवी राणा उदयसिंह की बà¥à¤¯à¤¾à¤¹à¥€ थी | जिनके गरà¥à¤ से महाराणा पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ª जैसे रणà¤à¤Ÿà¥à¤Ÿ उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ हà¥à¤ |
सोनगरों की निमà¥à¤¨ खांपें हैं :
1. बोडा :
कीरà¥à¤¤à¤¿à¤ªà¤¾à¤² (जालौर) के बाद कà¥à¤°à¤®à¤¶à¤ƒ समरसिंह, à¤à¤¾à¤–रसी व बोडा हà¥à¤ | (नैणसी री खà¥à¤¯à¤¾à¤¤ à¤à¤¾à¤— 1 पृ. 245) इसी बोडा के वंशज बोड़ा सोनगरा हैं | जालौर जिले में सेणा परगना इनके अधिकार में था | (नैणसी री खà¥à¤¯à¤¾à¤¤ à¤à¤¾à¤— 1 पृ. 245)
2. रूपसिंहोत :
रूपसिंह सोनगरा के वंशज | राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पाली जिले में हैं |
3. मानसिंहोत :
अखैराज सोनगरा के पà¥à¤¤à¥à¤° मानसिंह के वंशज पाली जिले में हैं |
4. à¤à¤¾à¤¨à¤¸à¤¿à¤‚होत :
अखैराज सोनगरा के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤¾à¤¨à¤¸à¤¿à¤‚ह के वंशज | पाली जिले में हैं | बीकानेर, जोधपà¥à¤°à¤¾ आदि इलाकों सोनगरा चौहान निवास करते हैं |
5. चांदण :
सोनगरा चौहानों की शाखा है | शीशेदा का राणा हमà¥à¤®à¥€à¤° अरिसिंह à¤à¥€ चंदाना चौहान राणी का पà¥à¤¤à¥à¤° था |
6. हापड़ :
कीरà¥à¤¤à¤¿à¤ªà¤¾à¤² (कीतू) जालौर के बाद कà¥à¤°à¤®à¤¶à¤ƒ समरसिंह उदयसिंह, चाचकदेव व सामनà¥à¤¤à¤¸à¤¿à¤‚ह हà¥à¤ | सामनà¥à¤¤à¤¸à¤¿à¤‚ह के बड़े पà¥à¤¤à¥à¤° कानà¥à¤¹à¤¡à¤¼à¤¦à¥‡à¤µ जालौर के शासक हà¥à¤ | छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° हापड़ सोनगरा कहलाये |
7. बाघोड़ा :
कानà¥à¤¹à¤¡à¤¼à¤¦à¥‡ (जालौर) के पà¥à¤¤à¥à¤° वीरमदे के à¤à¤¤à¥€à¤œà¥‡ बाघ के वंशज बाघोड़ा सोनगरा कहलाये | (कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ जाति सूची पृ. 84) बीकानेर के पास नाल गांव में बघोड सोनगरा हैं | (जीवराजसिंह à¤à¤¾à¤¤à¤¿ के सौजनà¥à¤¯ से )
1.) à¤à¥€à¤²à¤¾ बघोड़ :
वीरमदे के à¤à¤¤à¥€à¤œà¥‡ बाघ के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥€à¤²à¤¾ के वंशज | (बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह बीदासर ने à¤à¥€à¤²à¤¾ को वीरमदे का à¤à¤¤à¥€à¤œà¤¾ लिखा है परनà¥à¤¤à¥ à¤à¥€à¤²à¤¾ बघोड़ है | अतः वह बाघा का पà¥à¤¤à¥à¤° होना चाहिठ| वीरम का à¤à¤¤à¥€à¤œà¤¾ नहीं |)
2.) रोहेचा बाघोड़ा :
रोह गांव में रहने के कारण बाघ के वंशज रोहेचा बाघोड़ा कहलाये |
8. बालेचा :
सोनगिरों की शाखा है | किसी बाला नामक के वंशज बालेचा हो सकते है | टोडा (मालपà¥à¤°à¤¾) में पहले इनका शासन था | (राजपूत वंशावली पृ. 155 )
9. अबसी :
कीरà¥à¤¤à¤¿à¤ªà¤¾à¤² जालौर के पà¥à¤¤à¥à¤° अबसी की सनà¥à¤¤à¤¾à¤¨ अबसी कहलाये | (नैणसी री खà¥à¤¯à¤¾à¤¤ à¤à¤¾à¤— पृ. 169)
13. मादेचा :
वीर विनोद में किसी लालसिंह नामक चौहान के मदà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ में जाने के कारण वंशजों को मादà¥à¤°à¤šà¤¾ लिखा है | (वीर विनोद à¤à¤¾à¤— 2 पृ. 103) कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ जाति सूचि में माणकराज के वंशज लालसिंह के वंशधरों को मदà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ के कारण मादà¥à¤°à¥‡à¤šà¤¾ लिखा है | (कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ जाति सूची पृ. 1) इनका देसूरी में राजà¥à¤¯ था | राणा रायमल का चितौड़ के समय देसूरी में राजà¥à¤¯ था | राणा रायमल चितौड़ के समय सोलंकियों ने इनका राजà¥à¤¯ छीन लिया | जिला उदयपà¥à¤° में मादड़ी गांव है | उदयपà¥à¤° राजà¥à¤¯ में ही देसूरी में इनका राजà¥à¤¯ था | नालसिंह कौन थे ? कब मदà¥à¤° गठ? कोई साकà¥à¤·à¥à¤¯ नहीं है | मालूम होता है कि मादड़ी गांव में रहने के कारण मादडेचा (मादà¥à¤°à¥‡à¤šà¤¾) चौहान कहलाये | जैसे महेवा सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के नाम से महेचा राठौड़ों की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ हà¥à¤ˆ | बहà¥à¤¤ समà¥à¤à¤µ है ये मादà¥à¤°à¥‡à¤šà¤¾ लाखन नाडौल के वंशज हो |
14. नार चौहान :
बहीà¤à¤¾à¤Ÿà¥‹à¤‚ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° लाखण के वंशज हैं | मारवाड़ में है | (कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ जाति सूची पृ. 94)
15. घूंघेट (धंधेर) :
माणकराज सांथर के वंशज किसी धूधेट चौहान के वंशज बताये जाते है | (कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ जाति सूची पृ. 82) कोटा जिले में शाहबाद दà¥à¤°à¥à¤— पर कà¤à¥€ इनका अधिकार था | (टॉड कृत राज. अनà¥. केशवकà¥à¤®à¤¾à¤° पृ. 724) वि. सं. 1715 के धरà¥à¤®à¤¾à¤¤ के यà¥à¤¦à¥à¤§ में राजा इनà¥à¤¦à¥à¤°à¤®à¤£à¤¿ धंधेर औरंगजेब के पकà¥à¤· में लड़ा था |
16. सूरा और गोयलवाल :
टॉड के चौहानों की 24 खांपों में सूरा और गोयलवाल à¤à¥€ अंकित की है | परनà¥à¤¤à¥ इनकी उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ का पता नहीं लगता | कà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤–ां रासा में लिखा है :-
मनिराई के जानियो, à¤à¤¯à¥‹ राइ à¤à¥‚पाल |
कहकलंग ताके à¤à¤¯à¥‡ सूरा गोत गà¥à¤µà¤¾à¤² ||
इससे अनà¥à¤®à¤¾à¤¨ होता है कि कहकलंग चौहान (राज) के वंशजों से इन दोनों खांपों का निकास हà¥à¤† है |
17. मालानी :
संà¤à¤µà¤¤à¤ƒ मालानी कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° पर शासन करने के कारण ये मालानी चौहान कहलाये | लाखन नाडौल के वंशज होना समीचीन है |
18. पावेचा :
संà¤à¤µà¤¤à¤ƒ लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ नाडौल के वंशज है जैसलमेर कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में है |
19. देवड़ा:
अनà¥à¤¯ खांपें :
विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤•ों में अनà¥à¤¯ खापों के नाम मिलते है पर न तो उनकी उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ का पता चलता है और न ही वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ में उनके निवास सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ का | फिर à¤à¥€ जानकारी क लिठउन खांपों को यहाठअंकित किया जाता है |
टॉड के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° :
पाविया, सकà¥à¤°à¥‡à¤šà¤¾, à¤à¥‚रेचा, चाचेरा, रोयि, चादू, निकà¥à¤®à¥à¤ª, à¤à¤¾à¤‚वर व बंकट |
नैणसी के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° :
रावसिया, गोला, डडरिया, बकसरिया, सेलात, बेहाल, बोलत, गोलासन, नहखन, वैस, सेपटा, डीमणिया, हà¥à¤°à¤¡à¤¾, महालण, बंकट |
बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह जी बीदासर के संगà¥à¤°à¤¹ अनà¥à¤¸à¤¾à¤° :
पंजाबी, टंक पंडिया, गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤à¥€, बंगड़िया, गोलवाल, पूठवाल, मलयचा, चाहोड़ा, हरिण, मालà¥à¤¹à¤£, मà¥à¤•लारा, चकà¥à¤°à¤¡à¤¾à¤£à¤¾, सूवट, चितà¥à¤°à¤•ारा, à¤à¥ˆà¤°à¤µ, कà¥à¤·à¤¯à¤°à¤µ, अà¤à¥à¤°à¤µà¤¾, वà¥à¤¯à¤¾à¤˜à¥‹à¤°à¤¾, सरखेल, मोरचा, पबया, बहोला, गजयला, तिलवाड़ा, सरपटा, चितà¥à¤°à¤¾à¤µà¤¾, चंडालिका, बडेरा, मोरी, रेवड़ा, चंदणा, बंकटा, वतà¥à¤¸à¥à¤²à¤¾, पावचा, à¤à¥à¤®à¤°à¤¿à¤¯à¤¾, तà¥à¤²à¤¸à¥€à¤°à¤šà¥à¤›à¤£, सलावत, डीडà¥à¤°à¤¿à¤•, बचà¥à¤›à¤—ोती, राजकà¥à¤µà¤¾à¤°, राजवार, चारगे, मोतिया, मानक, अबरा, गोठवाल, जाम, बडà¥à¤¡, मालण पचवाणा (लालसोट में हैं ), छाबड़ा (बनिया हैं), आदरेचा, बागडेचा, मानà¤à¤µà¤¾, बालिया, जोजां, जनवार, (अवध में बलरामपà¥à¤° ठिकाना था) (कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ जाति सूची पृ. 92 से 89 व 62)
बकाया राजपà¥à¤¤à¤¾à¤¨à¤¾ अनà¥à¤¸à¤¾à¤° :
संगरायचा, à¤à¥‚रायचा, बिलायचा, तसीरा, चचेरा, रोसवा, चà¥à¤‚दू, निकà¥à¤®à¥à¤ª, à¤à¤µà¤°, बाकेता, मलानी (नेपाल), गिरामणà¥à¤¡à¤²à¤¾ (कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ जाति सूची पृ. 13) कपà¥à¤¤à¤¾à¤¨ पिंगले ने यà¥à¤•à¥à¤¤ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶à¥‹à¤‚ में चौहानो की निमà¥à¤¨ खांपे बताई है- विजय-सयहिया, खेरा, पूया, à¤à¤¾à¤¹à¥‚, कमोदरी, कनाजी, देवरिया, कोपला, नाहिरया, कसमीड, आवेल, बाली, बनाफर, गलख, बरहा, चलेय, सराल, रामचनà¥à¤¦à¥à¤° व चितरंग चौहान (पंजाब में है) (कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ जाति सूची पृ. 64)
20. हाड़ा चौहान :
हाड़ा चौहानों की पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ खांप है | नैणसी ने अनपर खà¥à¤¯à¤¾à¤¤ में लिखा है कि आसराज नाडौल (1167-1172 वि.) के पà¥à¤¤à¥à¤° माणकराव के बाद समà¥à¤à¤°à¤¾à¤£à¤¸, जैतराव, अनगराव, कà¥à¤‚तसी विजयपाल व हाड़ा हà¥à¤ | (नैणसी री खà¥à¤¯à¤¾à¤¤ à¤à¤¾à¤— 1 पृ. 101) हाड़ा के वंशज आगे चलकर हाड़ा चौहान हà¥à¤ |
हाड़ा चौहानों की खांपें :
1. धà¥à¤—à¥à¤§à¤²à¥‹à¤¤ :
बंगदेव हाड़ा के पà¥à¤¤à¥à¤° धà¥à¤—à¥à¤§à¤² के वंशज धà¥à¤—à¥à¤§à¤²à¥‹à¤¤ हाड़ा हà¥à¤ |
2. मोहणोत :
बंगदेव के पà¥à¤¤à¥à¤° मोहन हाड़ा के वंशज |
3. हतà¥à¤¥à¤µà¤¤ :
बंगदेव के पà¥à¤¤à¥à¤° देवा हाड़ा के पà¥à¤¤à¥à¤° हतà¥à¤¥ के वंशज |
4. हलूपोता :
देवा हाड़ा के पà¥à¤¤à¥à¤° हरिराज के पà¥à¤¤à¥à¤° हलॠके वंशज हलूपोता हाड़ा कहलाये | हलूपोतों में आगे चलकर पांच शाखायें हà¥à¤ˆ- चचावत, कà¥à¤‚à¤à¤¾à¤µà¤¤, बासवत, à¤à¥‹à¤œà¤µà¤¤ और नयनवत |
5. लोहराज :
हरिराज के पà¥à¤¤à¥à¤° लोहराज के वंशज है | लोहराज हाड़ा गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ में है |
6. हरपालपोता :
रावदेवा के पà¥à¤¤à¥à¤° समरसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° हरपाल के वंशज |
7. जतावत :
राव समरसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° जैतसी के वंशज |
8. खिजूरी का :
समरसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° डूंगरसी को खिजूरी गांव जागीर में मिला | इसी गांव के नाम से डूंगरसी के वंशज खिजूरी का हाड़ा कहलाते थे |
9. नवरंगपोता :
समरसिंह ददी के पà¥à¤¤à¥à¤° नवरंग के वंशज नवरंगपोता कहलाये |
10. थारूड़ :
नवरंग के à¤à¤¾à¤ˆ थिरराज या थारà¥à¤¡à¤¼ के वंशज थिरराज पोता या थारà¥à¤¡à¤¼ हाड़ा कहलाये |
11. लालावत :
बूंदी के शासक नापा समरसिंहोत के पà¥à¤¤à¥à¤° हामा के पà¥à¤¤à¥à¤° लालसी के वंशज | लोलावतों की आगे चलकर दो शाखायें निकली, जैतावत न नवबà¥à¤°à¤¹à¥à¤® लालसी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे |
12. जाबदू :
हामा के पà¥à¤¤à¥à¤° वीरसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° जाबदू के वंशज |
1.) सांवत का :
जाबदू के पà¥à¤¤à¥à¤° सारण के पà¥à¤¤à¥à¤° सांवत के वंशज |
2.) मेवावत :
जाबदू के पà¥à¤¤à¥à¤° सेव के पà¥à¤¤à¥à¤° मेव के वंशज |
13. अखावत :
बदी नरेश वीरसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° बैरीशाल के पà¥à¤¤à¥à¤° अखैराज के वंशज |
14. चूंडावत :
अखैराज के à¤à¤¾à¤ˆ चूंडा के वंशज |
15. अदावत :
अखैराज के à¤à¤¾à¤ˆ उदा के वंशज |
16. बूंदी नरबदपोता :
बूंदी शासक बैरीशाल के पà¥à¤¤à¥à¤° राव सà¥à¤à¤¾à¤‚ड के पà¥à¤¤à¥à¤° नरबद के वंशज |
17. à¤à¥€à¤®à¥‹à¤¤ :
नरबद के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥€à¤® के वंशज |
18. हमीरका :
नरबद के पà¥à¤¤à¥à¤° पूरà¥à¤£ के पà¥à¤¤à¥à¤° हमà¥à¤®à¥€à¤° के वंशज |
19. मोकलोत :
नरबद के पà¥à¤¤à¥à¤° मोकल के वंशज |
20. अरà¥à¤œà¥à¤¨à¥‹à¤¤ :
नरबद के पà¥à¤¤à¥à¤° अरà¥à¤œà¥à¤¨ के वंशज |
अरà¥à¤œà¥à¤¨à¥‹à¤¤à¥‹à¤‚ की शाखायें
1.) अखैपोता :
अरà¥à¤œà¥à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° अखै के वंशज |
2.) रामका :
अरà¥à¤œà¥à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° राम के वंशज |
3.) जसा :
अरà¥à¤œà¥à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° कानà¥à¤§à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° जसा के वंशज |
4.) दूदा :
अरà¥à¤œà¥à¤¨ के बेटे सà¥à¤°à¤œà¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° के दूदा दूदा के वंशज |
5.) राममनोत :
सà¥à¤°à¤œà¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° रायमल के वंशज |
21. सà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤¨à¥‹à¤¤ :
नरबद के बड़े à¤à¤¾à¤ˆ बूंदी के राव नारायण के पà¥à¤¤à¥à¤° सूरà¥à¤¯à¤®à¤² के पà¥à¤¤à¥à¤° सà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤¨ के वंशज |
22. हरदाउत :
सà¥à¤°à¤œà¤¨ के बड़े पà¥à¤¤à¥à¤° रावà¤à¥‡à¤œ के पà¥à¤¤à¥à¤° हदयनारायण के वंशज | कोटा राजà¥à¤¯ में करवाड़, गैंता, पूसोद, पीपला, हरदाउतों के ठिकाने थे | इनको हरदाउत कोटडिया कहा जाता है |
23. à¤à¥‡à¤œà¤¾à¤µà¤¤ :
राव à¤à¥‡à¤œ के पà¥à¤¤à¥à¤° केशवदेव को ढीपरी सहित 27 गांव मिले | केशवदेव के वंशज पिता à¤à¥‹à¤œ के नाम पर à¤à¥‹à¤œà¤ªà¥‹à¤¤à¤¾ कहलाये | इनके पà¥à¤¤à¥à¤° हरीजी के वंशज हरीजी का हाड़ा व जगनà¥à¤¨à¤¾à¤¥ के वंशज जगनà¥à¤¨à¤¾à¤¥ पोता हाड़ा हà¥à¤ |
24. इनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¶à¤¾à¤²à¥‡à¤¤ :
राव रतनसिंह के पौतà¥à¤° और गोपीनाथ के पà¥à¤¤à¥à¤° अनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¶à¤¾à¤² के वंशज अनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¶à¤¾à¤²à¤¨à¥‹à¤¤ हाड़ा कहलाते थे | इनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡ इनà¥à¤¦à¥à¤°à¤—ढ़ नाम का शहर बसाया | यहाठबूंदी राजà¥à¤¯ का मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाना था | इसके अतिरिकà¥à¤¤ दूगारी, जूनिया, चातोली आदि इनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¶à¤¾à¤²à¥‹à¤¤ के ठिकाने थे |
25. बैरिशालोत :
कà¥à¤‚वर गोपीनाथ के पà¥à¤¤à¥à¤° बैरीशाल के वंशज बैरिशालोत हाड़ा कहलाये | करवड़ बलवन, पीपलोदा, फलोदी आदि इनके ठिकाने थे |
26. मोहमसिंहोत :
कà¥à¤‚वर गोपीनाथ के पà¥à¤¤à¥à¤° मोहकमसिंह के वंशज मोहकमसिंह हाड़ा कहलाये | मोहकमसिंह ने सामूगढ़ (वि. 1715) के यà¥à¤¦à¥à¤§ में वीरगति पाई |
27. माहेसिंहोत :
कà¥à¤‚वर गोपीनाथ के पà¥à¤¤à¥à¤° माहेसिंह के वंशज माहेसिंहोत हाड़ा कहलाये | जजावर जैतगढ़ आदि इनके ठिकाने थे |
28. दीपसिंहोत :
गोपीनाथ के बाद कà¥à¤°à¤®à¤¶à¤ƒ छतà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤², à¤à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह व अनिरà¥à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤ | अनिरà¥à¤¦à¥à¤§ के बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¸à¤¿à¤‚ह व जोथसिंह के उमेदसिंह व दीपसिंह हà¥à¤ | इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ दीपसिंह के वंशज दीपसिंहोत है वरूधा इनका ठिकाना था |
29. बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚होत :
उमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¸à¤¿à¤‚ह के पà¥à¤¤à¥à¤° बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह के वंशज बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚होत हाड़ा हैं |
30. सरदारसिंहोत :
उमà¥à¤®à¥‡à¤¦à¤¸à¤¿à¤‚ह के पà¥à¤¤à¥à¤° सरदारसिंह के वंशज है |
31. माधाणी :
बूंदी के राव रतनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° माधोसिंह कोटा राजà¥à¤¯ के शासक थे | इनके वंशज माधाणी हाड़ा कहलाये | माधाणी हाड़ों की निमà¥à¤¨ खांपें हैं :-
1.) मोहनसिंहोत माधाणी :
माधोसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° मोहनसिंह ने धरमत यà¥à¤¦à¥à¤§ (वि. 1715) में शाहजहां के पकà¥à¤· में वीरगति पाई | इनके वंशज मोहनसिंहोत माधाणी कहलाये | पलायथा इनका मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाना था |
2.) जूà¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚होत माधाणी :
माधोसिंह (कोटा) के पà¥à¤¤à¥à¤° जूà¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह ने à¤à¥€ धरमत यà¥à¤¦à¥à¤§ में वीरगति पाई | इनके वंशज जूà¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚होत माधाणी कहलाये | इनको पहले कोटा राजà¥à¤¯ का कोटड़ा ठिकाना मिला फिर रामगढ़ रेलात दिया गया |
3.) पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤¸à¤¿à¤‚होत माधाणी :
माधोसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° कनà¥à¤¹à¥€à¤°à¤¾à¤® ने अपने à¤à¤¾à¤‡à¤¯à¥‹à¤‚ के साथ ही धरमत यà¥à¤¦à¥à¤§ में शाहजहां के पकà¥à¤· में लड़कर वीरगति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ की | इनके पà¥à¤¤à¥à¤° पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह के नाम से पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤¸à¤¿à¤‚होत माधाणी कहलाये | कोयला इनका मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाना था |
4.) किशोरसिंहोत माधाणी :
माधोसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° किशोरसिंह ने à¤à¥€ धरमत यà¥à¤¦à¥à¤§ में राजपूती शौरà¥à¤¯ का परिचय दिया | वे यà¥à¤¦à¥à¤§ में लड़ते हà¥à¤ घायल होकर बेहोश हो गठपर बच गये इनको बाद में सांगादे का ठिकाना मिला | बाद में कोटा की गदà¥à¤¦à¥€ पर बैठे | औरंगजेब के शासनकाल में कई योदà¥à¤§à¥‹à¤‚ ने à¤à¤¾à¤— लिया | वि. सं. 1753 में औरंगजेब के पकà¥à¤· में मराठों के विरà¥à¤¦à¥à¤§ लड़ते हà¥à¤ काम आया | इनके वंशज किशोरसिंहोत माधाणी कहलाये |
21. खींची चौहान :
खींची चौहानों की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ विवाद से परे नहीं है | नैणसी के समय तक यही माना जाता था कि इनके आदि पà¥à¤°à¥à¤· माणकराव ने गà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ की खिचड़ी खाई थी और इसी कारण खींची कहलाये | बाद में माधोसिंह खींची ने कलà¥à¤ªà¤¨à¤¾ की कि सांà¤à¤° के चौहान अपनी बात को खींचते थे, यानि निà¤à¤¾à¤¤à¥‡ थे | अतः खींची कहलाये | यदि सांà¤à¤° के चौहानों के लिठयह उकà¥à¤¤à¤¿ पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ होती तो समसà¥à¤¤ चौहान ही खींची कहलाते, पर à¤à¤¸à¤¾ नहीं है, चौहानों की अनेक खांपे हैं | पहले के किसी à¤à¥€ खà¥à¤¯à¤¾à¤¤ में या गà¥à¤°à¤¨à¥à¤¥ में à¤à¤¸à¤¾ उलà¥à¤²à¥‡à¤– नहीं है | अतः इसे कलà¥à¤ªà¤¨à¤¾ ही माना जावेगा | लगता है खींचियों के आदि पà¥à¤°à¥à¤· के सनà¥à¤¦à¤°à¥à¤ में खिचड़ी समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§à¥€ कोई घटना घट गई है और इसी आधार पर खिचड़ी का विकृत रूप खींची हो गया लगता है या फिर लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ (नाडौल) के पà¥à¤¤à¥à¤° आसराज के पौतà¥à¤° अजबराव का खींची नाम पड़ने के सनà¥à¤¦à¤°à¥à¤ में कà¥à¤› नहीं कहा जा सकता |
बूंदी राजà¥à¤¯ में घाटी, घाटोली, गगरूण, गूगोर, चाचरणी, चचरड़ी खींचियों के ठिकाने थे (नैणसी री खà¥à¤¯à¤¾à¤¤ à¤à¤¾à¤— 1 115) तथा राघवगढ़, धरमावदा, गढ़ा, नया किला, मकसूदगढ़, पावागढ़, असोधर (फतेहपà¥à¤° के पास) व खिलंचीपà¥à¤° (मालवा) खींचियों के राजà¥à¤¯ थे | ( राजपूत वंशावली पृ. 153)
चौहानों के अनà¥à¤¯ ठिकाने :
राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में चितलवाना, कारोली, डडोसन, सायला (जालौर), कलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤ªà¥à¤° (बाड़मेर), संखवास (नागौर), जोजावर (पाली), नामली उजेला, à¤à¤°, संदला, उमरण, पीपलखूटा मालकोइ आदि रतलाम रियासत (म. पà¥à¤°.) चौहानों का à¤à¤• ठिकाना था (बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह सोनगरा के सौजनà¥à¤¯ से), मà¥à¤£à¥à¤¡à¥‡à¤Ÿà¥€ (गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤) आदि सोनगरा चौहानों के मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाने थे |
चौहान वंश की कà¥à¤²à¤¦à¥‡à¤µà¥€
चौहानों की कà¥à¤²à¤¦à¥‡à¤µà¥€ शाकमà¥à¤à¤°à¥€ माता है। शाकमà¥à¤à¤°à¥€ देवी (Shakambhari Mata) का पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ सिदà¥à¤§à¤ªà¥€à¤ जयपà¥à¤° जिले के साà¤à¤à¤° (Sambhar) क़सà¥à¤¬à¥‡ में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है। शाकमà¥à¤à¤°à¥€ माता साà¤à¤à¤° की अधिषà¥à¤ ातà¥à¤°à¥€ देवी हैं।शाकमà¥à¤à¤°à¥€ दà¥à¤°à¥à¤—ा का à¤à¤• नाम है, जिसका शाबà¥à¤¦à¤¿à¤• अरà¥à¤¥ है- शाक से जनता का à¤à¤°à¤£-पोषण करने वाली। शाकमà¥à¤à¤°à¥€ माता का मंदिर साà¤à¤à¤° से लगà¤à¤— 18 कि.मी. दूर अवसà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है। शाकमà¥à¤à¤°à¥€ देवी का सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ à¤à¤• सिदà¥à¤§à¤ªà¥€à¤ सà¥à¤¥à¤² है जहाठविà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ वरà¥à¤—ों और धरà¥à¤®à¥‹à¤‚ के लोग आकर अपनी शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾-à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ निवेदित करते हैं
नाडौल के चौहान आशापूरा माता को कà¥à¤²à¤¦à¥‡à¤µà¥€ के रूप में पूजते हैं। आशापूरा माता à¤à¥€ मूलतः शाकमà¥à¤à¤°à¥€ माता का ही रूप है।
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I am Gagan Singh Shekhawat, a renowned online marketer with extensive experience and expertise in internet marketing. Beyond my professional career, I have always carried a deep desire to unfold the majestic and mystical glory of India and share it with the world. From this vision, the foundation of ‘Our Society’ was born-an initiative that is truly my brainchild.
Through Our Society, I strive to cover every aspect of India’s identity-be it social, cultural, political, or historical-leaving no stone unturned. I firmly believe in the power of blogging to inspire and create impact, and with this belief, I introduced the unique concept of Our Society to help people discover and experience the magnificent heritage and essence of India.
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