राजकुमारी लालां मेवाड़ी – Lala Mewari – Great Rajput Women

मेवाड़ के महाराणा मोकल की राजकुमारी लालां स्वाभिमानी और बहुत ही महत्वाकांक्षी नारी थी। उसका विवाह गागरोन गढ़ के स्वामी अचलदास खीची के साथ हुआ। लालां ने प्रेम और व्यवहार से अपने पति पर पूर्ण आधिपत्य जमा लिया। यही नहीं अचलदास खीची लालां जैसी रानी पाकर निश्चिन्त हो गया। राजकाज की सारी व्यवस्था रानी के हाथ में थी और प्रभावशाली ढंग से उसने इस गुरुतर भार को उठाया और वर्षों तक सफलता के साथ संचालन किया।

अचलदास खीची बड़ी रानी लालां से बिना पूछे जांगलू की उमा सांखली से मारवाड़ में अपना गुप्तरूप से सम्बन्ध तय कर लिया, पर लालां का प्रभाव उस पर इतना था कि बिना उसकी स्वीकृति के विवाह संभव नहीं था। पति द्वारा स्वीकृति चाही गयी तब चतुर और नीतिज्ञ लालां ने पति को सशर्त विवाह की अनुमति दी। इस शर्त के मुताबिक अचलदास खीची बिना उसकी आज्ञा के उमा सांखली के रनिवास में नहीं जा सकता था। इस प्रकार उसने अपने पति की बात भी रख ली और अपनी सौत से प्रत्येक नारी को जो आशंका बनी रहती है, उससे भी मुक्ति पाली।

पत्नी अपने पति पर पूर्ण आधिपत्य रखना चाहती है, यह नारी-सुलभ स्वभाव है। लालां ने अपने प्रेम पर एकाधिकार रखने का प्रयास किया। वह युग ही ऐसा था कि उस समय राजा एक से अधिक विवाह करते थे। उस स्थिति में प्रेम के एकाधिकार की बात बडी कठिन थी पर राजपूत नारियों का पति के प्रति अद्भुत समर्पित भाव रहा। उससे उनके जीवन में कटुता या बिखराव पैदा नहीं हुआ। अपने स्वाभिमान को ठेस लगती देख राजपूत नारी बड़े से बड़ा त्याग करने से कभी नहीं हिचकिचायी।

सात वर्ष तक अपने पति को प्रेमपाश में बांधे रखने वाली लालां मेवाड़ी ने अपनी सौत उमा को पति की शक्ल तक नहीं देखने दी और जब उसका पति उसके नियंत्रण से बाहर होकर उमा सांखली के प्रति आकृष्ट हुआ तो उस स्वाभिमानी नारी ने स्वेच्छा से पति का परित्याग कर शेष सारा जीवन एकाकी बिताया। अपने प्रेमाधिकार पर किसी का दखल उसे स्वीकार नहीं था। उनके पुत्र पालन सिंह थे, जिन्होंने अचलदास खींची के बाद गागरोन पर शासन किया।

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