विद्युल्लता – चित्तौड़ की वीरबाला की अमर कहानी

Vidyullata

विद्युल्लता चित्तौड़ के एक वीर राजपूत सैनिक की कन्या थी। चित्तौड़ के ही समरसिंह नामक एक युवक से उसका सम्बन्ध तय हुआ। अभी इनका विवाह संस्कार सम्पन्न नहीं हुआ था इस बीच अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। रण रंग में उन्मत्त वीर राजपूत सैनिक अपनी जन्मभूमि की रक्षा के लिए यवनों से संघर्ष कर रहे थे। ऐसी संकट की घड़ी में अपने कर्त्तव्य पथ से विमुख होकर अपनी मगेतर विद्युल्लता से आकर समरसिंह ने कहा—

“प्रिये! मैं युद्ध से पलायन कर तुम्हें यहां से दूर ले चलने के लिए आया हूं। तुम शीघ्र मेरे साथ चलो। शायद तुम्हें यह ज्ञात नहीं कि यहां तो सब कुछ समराग्नि में भस्म हो जायेगा। मैं तुम्हारी प्रीत-पगी अंखियों की पलकों की छांव में आनन्द से जीवन बिताना चाहता हूं।”

यह बात सुनते ही वीरबाला विद्युल्लता की क्रोधाग्नि भड़क उठी, उसने समरसिंह के कायरतापूर्ण प्रस्ताव को नामंजूर कर दृढ़ता से कहा— “प्रेम से भी कर्त्तव्य ऊंचा है। देश पर संकट है और तुम अपने जीवन के मधुर सपनों के जाल बुन रहे हो। इस समय देश की रक्षा का प्रश्न प्रमुख है, ऐसी स्थिति में सांसारिक सुख की कामना कायरता है। युद्ध भूमि में प्राण त्यागने वाले वीरों को राजपूत बालायें वरण करती हैं। समर! तुम्हारे जैसे वीर राजपूत को ये शब्द शोभा नहीं देते। युद्ध भूमि में जाकर शत्रु दल का संहार करो यही तुम्हारा कर्त्तव्य है। यदि देश रक्षा हित तुम वीरगति भी प्राप्त कर लोगे तो मुझे गर्व होगा, मुझे अपना धर्म भी ज्ञात है।”

समरसिंह जिसने अपने निजी सुख की प्राप्ति के लिए यवनों को भेद बता कर अपनी तथा अपनी प्रेयसी विद्युल्लता की जान बचाने का उपक्रम बनाया था। उस पर विद्युल्लता के शब्दों का असर कब होने वाला था। यवन सैनिकों की उपस्थिति में बंधन मुक्त खड़े समरसिंह को देख विद्युल्लता को यह ज्ञात होते देर नहीं लगी कि उसने विश्वासघात किया है। समरसिंह शीघ्र भाग निकलने के लिए उसका हाथ थामने आगे बढ़ता है। “खबरदार! विश्वासघाती!! देशद्रोही!!! तुमने जो मेरे शरीर को छूकर अपवित्र करने की कोशिश की तो। ऐसे कायर और कुलकलंक की अर्द्धांगिनी बनने से मुझे मृत्यु अधिक प्रिय है।” समरसिंह उसके पास पहुंचता उससे पूर्व अपने ही हाथों छाती में कटार भोंक विद्युल्लता ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी।