सारन्धा ओरछा (बुन्देल खण्ड) नरेश चम्पतराय की पत्नी थी। सारन्धा बड़ी स्वाभिमानी, उदार, शरणागतवत्सल व वीर हृदया थी। चम्पतराय के कई रानियां थीं पर सारन्धा जैसी विशिष्ट गुणसम्पन्न रानी का उसके रनिवास में विशेष मान था। चम्पतराय शाहजहां और दारा का विश्वासपात्र था। रानी सारन्धा की प्रेरणा से चम्पतराय अपने विलासी जीवन से मुक्ति पाता है और प्रजा धर्म का पालन कर बुन्देलखण्ड में स्वाधीन राजा की भांति राज्य करने लगा।
कुछ समय पश्चात् शाहजहां के शाहजादों में राज्यगद्दी के लिए उत्तराधिकार का युद्ध होता है। दाराशिकोह की विशाल सेना ने औरंगजेब को चम्बल के उस पार ही रोके रखा। विवश होकर उसको चम्पतराय की शरण लेनी पड़ी। चम्पतराय ने औरंगजेब को शरण देना राजनैतिक दृष्टि से उचित नहीं समझा किन्तु रानी सारन्धा के यह कहने पर कि “राजपूत अपने शरणागत की रक्षा प्राणों की बाजी लगा कर भी करते हैं” चम्पतराय ने औरंगजेब को शरण ही नहीं दी, धरमट के युद्ध में भी भाग लिया, जिसमें दारा को परास्त कर औरंगजेब विजयी होता है और दिल्ली की राज्यगद्दी पर अधिकार प्राप्त करता है।
औरंगजेब ने चम्पतराय को उसके द्वारा की गयी मदद के उपलक्ष्य में पुरस्कार स्वरूप एक घोड़ा प्रदान किया। इस घोड़े को चम्पतराय की अनुपस्थिति में वली बहादुर नामक एक मुगल सेनापति छीन लेता है। रानी ने इसे अपमान समझा और वली बहादुर से वह घोड़ा पुनः छीन कर अपने कब्जे में किया। औरंगजेब ने घोड़े को लेकर विवाद न करने की सलाह दी तब रानी सारन्धा ने कहलवाया— “यह घोड़े का प्रश्न नहीं, हमारे स्वाभिमान का प्रश्न है और मुझे मान प्रिय है।” अपने मान की रक्षा के लिए, एक घोड़े के खातिर अपनी जागीर मुगल बादशाह को वापिस लौटाकर सारन्धा अपने पति सहित बुन्देलखण्ड लौट आती है। औरंगजेब तो किसी प्रकार युद्ध का बहाना ढूंढ़ने की तलाश में ही था। रानी सारन्धा के उपकार को भूलकर कृतघ्न औरंगजेब ने ओरछा पर आक्रमण कर दिया। रानी सारन्धा ने पति सहित मुगलों का मुकाबला किया परन्तु पराजित हुई। अपनी मान रक्षा के लिए सारन्धा ने जागीर त्यागकर जंगल की खाक छानना स्वीकार किया पर अपने स्वाभिमान को आंच नहीं आने दी। छत्रसाल इसका पुत्र था।
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