राठौड़ गोतà¥à¤° उतà¥à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤°à¤¤ में निवास करने वाले à¤à¤• राजपूत गोतà¥à¤° हैं और राठौड़ राजपूतों की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी राजा के राठ(रीढ़) से हà¥à¤ˆ है, और इसी कारण उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ “राठोड़” कहा जाता है। वे अपने को à¤à¤—वान राम के कनिषà¥à¤ पà¥à¤¤à¥à¤° कà¥à¤¶ के वंशज के रूप में पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ करते हैं, इस वजह से उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी कà¥à¤² से ही माना जाता है। इस वंश की करà¥à¤¨à¤¾à¤Ÿ और कनà¥à¤¨à¥Œà¤œ राजधानियाठमानी जाती है। संसà¥à¤•ृत लेखों और गà¥à¤°à¤‚थों के आधार पर, राठौड़ों को “राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¤•ूट” à¤à¥€ लिखा गया है। कहीं-कहीं इनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ “रटà¥à¤Ÿ” या “राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¥‹à¤¡” à¤à¥€ कहा गया है। राठौड़ शबà¥à¤¦ का पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक रूप “राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¤•ूट” था, जो किसी सरकारी पद का नाम था। इनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ काल से राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के उतà¥à¤¤à¤°-पशà¥à¤šà¤¿à¤®à¥€ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में मारवाड़ में शासन किया और उनका पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ निवास सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ कनà¥à¤¨à¥Œà¤œ में था। जब वे लगà¤à¤— 1243 ईसा पूरà¥à¤µ में मारवाड़ आà¤, तो उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने यहां अपने शासन की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ की।
राठौड़ों के मूल सेतराग जी के पà¥à¤¤à¥à¤° राव सीहा जी थे, और मारवाड़ के राठौड़ उनके वंशज हैं। राव सीहा जी ने लगà¤à¤— 700 वरà¥à¤· पूरà¥à¤µ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¿à¤•ा यातà¥à¤°à¤¾ के दौरान मारवाड़ में आकर राठौड़ वंश की नींव रखी। वे राठौड़ गोतà¥à¤° के पà¥à¤°à¤®à¥à¤– पà¥à¤°à¥à¤· थे और राजपूत इतिहास में उनका विशेष महतà¥à¤µ है। राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के सà¤à¥€ राठौड़ गोतà¥à¤° के मूल पà¥à¤°à¥à¤· के रूप में राव सीहा जी को माना जाता है, जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने पाली से राज की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ की और उनके बाद उनकी छतरी पाली जिले के बिटॠगांव में बनाई गई है।
राव सीहा के वंशज चूणà¥à¤¡à¤¾ ने पहले मणà¥à¤¡à¥‹à¤° पर शासन किया और उनके पौतà¥à¤° जोधा ने जोधपà¥à¤° की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ की, तथा जोधपà¥à¤° को अपनी राजधानी बनाया। मà¥à¤—़ल समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿà¥‹à¤‚ ने अपने यà¥à¤¦à¥à¤§à¥‹à¤‚ में आदि विजयों को “लाख तलवार राठोडान” कहा, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि उनकी तरफ से यà¥à¤¦à¥à¤§ के लिठपचास हजार की संखà¥à¤¯à¤¾ में तो सीहाजी के वंशज ही à¤à¤•तà¥à¤° हो जाते थे। यà¥à¤¦à¥à¤§ कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में राठौड़ वंश के शासकों के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ दà¥à¤¶à¥à¤®à¤¨à¥‹ का वीरता और पराकà¥à¤°à¤® के साथ सामना करने की वजह से ही उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ रणबंका राठौड़ à¤à¥€ कहा जाता है। à¤à¤¾à¤°à¤¤ में आजादी से पूरà¥à¤µ जब रियासतों का विलय नहीं हà¥à¤† था तब अकेले राठौड़ो की रियासतों की संखà¥à¤¯à¤¾ दस से जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ थी साथ ही कई सौ ताजमी ठिकाने à¤à¥€ थे जिनमे पà¥à¤°à¤®à¥à¤– जोधपà¥à¤°, मारवाड़, किशनगढ़, बीकानेर, ईडर, कà¥à¤¶à¤²à¤—ढ़, à¤à¤¾à¤¬à¥à¤†, सैलाना, सीतामउ, रतलाम, मांडा, अलीराजपà¥à¤° तथा पूरà¥à¤µ रियासतो में मेड़ता, मारोठऔर गोड़वाड़ घाणेराव आदि थे।
दारॠमीठी दाख री, सूरां मीठी शिकार।
सेजां मीठी कामिणी, तो रण मीठी तलवार।।
वà¥à¤°à¤œà¤¦à¥‡à¤¶à¤¾ चनà¥à¤¦à¤¨ वना, मेरà¥à¤ªà¤¹à¤¾à¤¡à¤¾ मोड़ !
गरà¥à¤¡à¤¼ खंगा लंका गढा, राजकà¥à¤² राठौड़ !!
दारॠपीवो रण चढो, राता राखो नैण।
बैरी थारा जल मरे, सà¥à¤– पावे ला सैण॥
वेद – यजà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦
शाखा – दानेसरा
गोतà¥à¤° – कशà¥à¤¯à¤ª
गà¥à¤°à¥ – शà¥à¤°à¥€ शà¥à¤•à¥à¤°à¤¾à¤šà¤¾à¤°à¥à¤¯
देवी – नागà¥à¤¨à¥‡à¤šà¤¿à¤¯à¤¾ माता
परà¥à¤µà¤¤ – मरà¥à¤ªà¤¾à¤¤
नगारा – विरद रंणबंका
हाथी – मà¥à¤•ना
घोड़ा – पिला (सावकरà¥à¤£/शà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤•रà¥à¤£)
घटा – तोप तमà¥à¤¬à¥‚
à¤à¤‚डा – गगनचà¥à¤®à¥à¤¬à¥€
साडी – नीम की
तलवार – रण कà¤à¤—ण
इषà¥à¤Ÿà¤¦à¥‡à¤µ – à¤à¤—वान शिव
तोप – दà¥à¤¨à¥à¤•ालà¥
धनà¥à¤· – वानà¥à¤¸à¤°à¥€
निकाश – शोणितपà¥à¤° (दानापà¥à¤°)
कà¥à¤²à¤¦à¥‡à¤µà¥€ के रूप में राठौड़ कà¥à¤² में माता नागणेचिया जी को पूजा जाता है। सà¤à¥€ कारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ में कà¥à¤²à¤¦à¥‡à¤µà¥€ माता नागणेचिया जी की आराधना आवशà¥à¤¯à¤• है। कà¥à¤²à¤¦à¥‡à¤µà¥€ माता नागणेचिया जी को चकà¥à¤°à¥‡à¤¶à¥à¤µà¤°à¥€, राठेशà¥à¤µà¤°à¥€ या नागणेची नाम से à¤à¥€ पूजा जाता है। राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के जोधपà¥à¤° जिले से करीब ९८ किलोमीटर दूर पचपदरा तहसील के नागाना गाà¤à¤µ में माता नागणेचिया जी का पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ मंदिर सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है। तथा दूसरा मंदिर जोधपà¥à¤° के मेहरानगॠकिले की जननी डà¥à¤¯à¥‹à¥à¥€ में है। à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• गà¥à¤°à¤‚थों व पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ खà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥‹à¤‚ में वरà¥à¤£à¤¿à¤¤ है कि मारवाड़ के राठौड़ राजà¥à¤¯ के संसà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤• राव सिनà¥à¤¹à¤¾ के पौतà¥à¤° राव धूहड़ ने शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ में नागाना गाà¤à¤µ में इस मंदिर में माता कि मूरà¥à¤¤à¤¿ कि सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ कि थी। राव धूहड़ का शासन काल विकà¥à¤°à¤® संवत १३४९ से १३६६ माना जाता है। राठौड़ कà¥à¤² के राजपूतों के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ नीम के वृकà¥à¤· को काटा या जलाया नहीं जाता है जिसकी वजह गांवों में नागणेचिया जी माता का सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ नीम के वृकà¥à¤· के निचे होना होता है।
अयोधà¥à¤¯à¤¾ में राजा सà¥à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤° को शà¥à¤°à¥€ राम के पà¥à¤¤à¥à¤° कà¥à¤¶ के कà¥à¤² का अंतिम राजा माना जाता है। उसके बाद अयोधà¥à¤¯à¤¾ राजà¥à¤¯ को मगध सामà¥à¤°à¤¾à¤œà¥à¤¯ में महापदà¥à¤®à¤¨à¤‚द ने मिला लिया जो कि नंदवंश के राजा थे। बडà¥à¤µà¥‹à¤‚ के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ हसà¥à¤¤à¤²à¤¿à¤–ित बहियों तथा à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• साहितà¥à¤¯à¤¿à¤• सà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤¤à¥‹à¤‚ से जो जानकारी मिलती है उसके अनà¥à¤¸à¤¾à¤° सà¥à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤° के उपरांत इस कà¥à¤² में यशोविगà¥à¤°à¤¹ तक के पà¥à¤°à¤®à¥à¤– शासकों के नाम कि ही लिखित जानकारी है। इन जानकारियों के आधार पर यहाठमाना जाता है कि सà¥à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤° के दो वशजों कूरà¥à¤® व विशà¥à¤µà¤°à¤¾à¤œ में कूरà¥à¤® के वंशज बिहार के रोहितास से निषिध, गà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¿à¤¯à¤° तथा नरवर होते हà¥à¤ राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के आमेर में आये व यहाठकछवाहा राजपूत वंश के रूप में राज किया। वहीठदूसरी ओर विशà¥à¤µà¤°à¤¾à¤œ के वंशज मà¥à¤²à¤°à¤¾à¤¯ व राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¤µà¤° के नाम से जाने गठव इनके कà¥à¤² के वंशज राठौड़ कहलाये।
इस पà¥à¤°à¤•ार राठौड़ वंश की बेल तरह खांपों के रूप में आगे बà¥à¥€, जिसकी जानकारी (सूरजवंश पà¥à¤°à¤•ाश-करणीदान पृ. 84 से 194) में मिलती है।
इस वंश में धरà¥à¤®à¤µà¤¿à¤®à¥à¤¬ नामक à¤à¤• दानी वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ हà¥à¤à¥¤ उनकी दानशीलता के कारन इनके वंशज दानेशà¥à¤µà¤°à¤¾ राठौड़ कहलाये। इनको कमधज नाम से à¤à¥€ जाना जाता था।
इस वंश में पà¥à¤‚ज के पà¥à¤¤à¥à¤° अमरविजय ने परमारों से यà¥à¤¦à¥à¤§ कर उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ हराकर कà¥à¤°à¤¹à¤—ढ़ को जीता। संà¤à¤µà¤¤à¤ƒ कà¥à¤°à¤¹ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के नाम से ही यहाठचली वंश वेल को कà¥à¤°à¤¹à¤¾ राठौड़ कहा गया।
इसी वंश में पà¥à¤‚ज के दूसरे पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤¾à¤¨à¥à¤¦à¥€à¤ª कांगड़ा (हिमाचल पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶) के शासक थे। देवी जà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¾à¤®à¤¾à¤¤à¤¾ के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ अकाल के à¤à¤¯ से मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ के वरदान के कारण उनकी वंशज अà¤à¥ˆà¤ªà¥à¤°à¤¾ राठौड़ कहलाये।
इसी वंश में पà¥à¤‚ज के तीसरे पà¥à¤¤à¥à¤° वीरचंद हà¥à¤à¥¤ वीरचंद ने à¤à¤—वान शिव को अपना कपाल चढ़ा दिया था। इसी वजह से इनके वंशजों को कपालिया राठौड़ कहा गया।
तंवरों को परासà¥à¤¤ कर जलंधर की सहायता से जल पà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¹ में बहा देने के कारण पà¥à¤‚ज के पà¥à¤¤à¥à¤° सजनविनोद के वंशज जलखेड़ा राठौड़ कहलाये।
बà¥à¤—लाणा सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर शासन करने के कारण पà¥à¤‚ज के पà¥à¤¤à¥à¤° पदम वंशज बà¥à¤—लाणा राठौड़ कहाये गà¤à¥¤
पà¥à¤‚ज के पà¥à¤¤à¥à¤° अहर के वंशज ‘बंगाल की तरफ चले गठजो कि अहर’ राठौड़ कहलाये।
पà¥à¤‚ज के पà¥à¤¤à¥à¤° वासà¥à¤¦à¥‡à¤µ ने कनà¥à¤¨à¥Œà¤œ के नजदीक पारकरा नामक नगर बसाया व शासन किया इसलिठवहाठसे उसके वंशज पारकरा राठौड़ कहलाये।
दकà¥à¤·à¤¿à¤£ à¤à¤¾à¤°à¤¤ में पà¥à¤‚ज के पà¥à¤¤à¥à¤° उगà¥à¤°à¤ªà¥à¤°à¤ ने चंदी व चंदावर नगर बसाये इसलिठचंदी सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के नाम से उगà¥à¤°à¤ªà¥à¤°à¤ के वंशज चंदेल कहलाये। (ये चंदेल-चंदà¥à¤°à¤µà¤‚शी नहीं हैं।)
इस वंश में सà¥à¤¬à¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ नामक à¤à¤• बलवान शासक हà¥à¤† जो मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¾à¤®à¤¾à¤¨ के नाम से à¤à¥€ जाना जाता है। वह बड़ा वीर था इसलिठइसे वीर की उपाधि दी गई। इसी वजह से इनके वंशज वीर राठौड़ कहलाये।
इस वंश के à¤à¤°à¤¤ नामक शासक ने बरियावर सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर राजà¥à¤¯ किया। उस सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के नाम से à¤à¤°à¤¤ के वंशज बरियावर राठौड़ कहलाये।
कृपासिंधॠ(अनलकà¥à¤²) खरोदा सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर जाकर बसे इस वंश के वंशजों को सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के नाम से खरोदिया राठौड़ कहा गया।
इस कà¥à¤› के शासक चंदà¥à¤° व इसके वंशज यà¥à¤¦à¥à¤§à¥‹à¤‚ में जय पाने के कारण जयवंशी कहलाये।
राठौड़ वंश कि तेरह खांपों में से दानेशà¥à¤µà¤°à¤¾ खांप के सीहाजी राठौड़ इस वंश को राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ लाये अतः यहाठके राठौड़ इसी खांप से जाने जाते है। इस वंश में आगे चलकर जो शाखाà¤à¤ वंश बेल को आगे लेकर चली वे इस पà¥à¤°à¤•ार हैं –
सीहाजी के पà¥à¤¤à¥à¤° सोगन ने ईडर पर अधिकार कर शासन किय। अतः सोगन के वंशज ईड़रिया राठौड़ ईडर के नाम से जाने गà¤à¥¤
सीहाजी के पà¥à¤¤à¥à¤° सोगन के वंशज हसà¥à¤¤à¤¿à¤•à¥à¤£à¥à¤¡à¥€ (हटूंडी) में रहे। वे हटà¥à¤£à¥à¤¡à¤¿à¤¯à¤¾ राठौड़ कहलाये। जोधपà¥à¤° इतिहास में ओà¤à¤¾ लिखते है कि सीहाजी से पहले हसà¥à¤¤à¤¿à¤•à¥à¤£à¥à¤¡à¥€ (हटकà¥à¤£à¥à¤¡à¥€) में राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¤•ूट बालापà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ राज करता था। उसके वंशज हटà¥à¤£à¥à¤¡à¤¿à¤¯à¤¾ राठौड़ है।
सीहाजी के छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° अजाजी के दो पà¥à¤¤à¥à¤° बेरावली और बिजाजी ने दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤•ा के चावड़ों को बाढ़ कर (काट कर) दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤•ा (ओखा मणà¥à¤¡à¤²) पर अपना राजà¥à¤¯ कायम किया।इस कारण बेरावलजी के वंशज बाढेल राठौड़ हà¥à¤à¥¤ आजकल ये बाढेर राठौड़ कहलाते है। गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ में पोसीतरा, आरमंडा, बेट दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤•ा बाढेर राठौड़ो के ठिकाने थे।
बेरावलजी के à¤à¤¾à¤ˆ बीजाजी के वंशज बाजी राठौड़ कहलाते है। गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ में महà¥à¤†, वडाना आदि इनके ठिकाने थे। बाजी राठौड़ आज à¤à¥€ गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ में ही बसते है।
सीहा के पà¥à¤¤à¥à¤° आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ ने गà¥à¤¹à¤¿à¤²à¥‹à¤‚ से खेड़ जीता। खेड़ नाम से आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के वंशज खेड़ेचा राठौड़ कहलाते है।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° धà¥à¤¹à¤¡à¤¼ के वंशज धà¥à¤¹à¤¡à¤¼à¤¿à¤¯à¤¾ राठौड़ कहलाते है।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° धांधल के वंशज धांधल राठौड़ कहलाये। पाबूजी राठौड़ इसी खांप के थे। इनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने चारणी को दिये गये वचनानà¥à¤¸à¤¾à¤° पाणिगà¥à¤°à¤¹à¤£ संसà¥à¤•ार को बीच में छोड़ चारणी की गायों को बचाने के पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ में शतà¥à¤°à¥ से लड़ते हà¥à¤ वीर गति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ की। यही पाबूजी लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° चाचक के वंशज चाचक राठौड़ कहलाये।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° हरखा के वंशज हरखावत राठौड़ कहलाये।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° जोपसा के पà¥à¤¤à¥à¤° जोलू के वंशज जोलू राठौड़ कहलाये।
जोपसा के पà¥à¤¤à¥à¤° सिंघल के वंशज सिंघल राठौड़ कहलाये। ये बड़े पराकà¥à¤°à¤®à¥€ हà¥à¤à¥¤ इनका जैतारण पर अधिकार था। जोधा के पà¥à¤¤à¥à¤° सूजा ने बड़ी मà¥à¤¶à¥à¤•िल से उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ वहां से हटाया।
जोपसा के पà¥à¤¤à¥à¤° ऊहड़ के वंशज ऊहड़ राठौड़ कहलाये।
जोपसा के पà¥à¤¤à¥à¤° मूलू के वंशज मूलू राठौड़ कहलाये।
जोपसा के पà¥à¤¤à¥à¤° बरजोर के वंशज बरजोर राठौड़ कहलाये।
जोपसा के वंशज जोरावत राठौड़ कहलाये।
जोपसा के पà¥à¤¤à¥à¤° राकाजी के वंशज है। ये मलà¥à¤²à¤¾à¤°à¤ªà¥à¤°, बाराबकी, रामनगर, बडनापà¥à¤°, बैहराइच (जि. रामपà¥à¤°) तथा सीतापà¥à¤° व अवध जिले (उ.पà¥à¤°.) में हैं। बोडी, रहका, मलà¥à¤²à¤¾à¤ªà¥à¤°, गोलिया कला, पलवारी, रामनगर, घसेड़ी, रायपà¥à¤° आदि गांव (उ.पà¥à¤°.) में थे।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° जोपसा के पà¥à¤¤à¥à¤° रैका से रैकवाल हà¥à¤à¥¤ नौगासा बांसवाड़ा के à¤à¤• सà¥à¤¤à¤®à¥à¤ लेख बैशाख वदि 1361 में मालूम होता है कि रामा पà¥à¤¤à¥à¤° वीरम सà¥à¤µà¤°à¥à¤— सिधारा। ओà¤à¤¾à¤œà¥€ ने इसी वीरम के वंशजों को बागड़िया राठौड़ माना जाता है कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि बांसवाड़ा का कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° बागड़ कहलाता था।
मेवाड़ से सटा हà¥à¤† मारवाड़ की सीमा पर छपà¥à¤ªà¤¨ गांवों का कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° छपà¥à¤ªà¤¨ का कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° है। यहाठके राठौड़ छपà¥à¤ªà¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ राठौड़ कहलाये। यह खांप बागड़िया राठौड़ों से ही निकली है। उदयपà¥à¤° रियासत के कणतोड़ गांव की जागीर थी।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° आसल के वंशज आसल राठौड़ कहलाये।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° जोपसा के पà¥à¤¤à¥à¤° खीमसी के वंशज खोपसा राठौड़ कहलाये।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° धà¥à¤¹à¤¡à¤¼ के पà¥à¤¤à¥à¤° शिवपाल के वंशज सिरवी राठौड़ कहलाये।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° धà¥à¤¹à¤¡à¤¼ के पà¥à¤¤à¥à¤° पीथड़ के वंशज पीथड़ राठौड़ कहलाये।
आसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° धà¥à¤¹à¤¡à¤¼ के पà¥à¤¤à¥à¤° रायपाल हà¥à¤à¥¤ रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° केलण के पà¥à¤¤à¥à¤° कोटा के वंशज कोटेचा हà¥à¤à¥¤ बीकानेर जिले में करणाचणà¥à¤¡à¥€à¤µà¤¾à¤², हरियाणा में नाथूसरी व à¤à¥‚चामणà¥à¤¡à¥€, पंजाब में रामसरा आदि इनके गांव है।
धà¥à¤¹à¤¡à¤¼ के पà¥à¤¤à¥à¤° बहड़ के वंशज बहड़ राठौड़ कहलाये।
धà¥à¤¹à¤¡à¤¼ के पà¥à¤¤à¥à¤° ऊनड़ के वंशज ऊनड़ राठौड़ कहलाये।
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° केलण के पà¥à¤¤à¥à¤° थांथी के पà¥à¤¤à¥à¤° फिटक के वंशज फिटक राठौड़ हà¥à¤à¥¤
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° सà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾ के वंशज सà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾ राठौड़ कहलाये।
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° महिपाल के वंशज महीपालोत राठौड़ कहलाये।
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° शिवराज के वंशज शिवराजोत राठौड़ कहलाये।
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° डांगी के वंशज डांगी कहलाये। ढोलिन से शादी की अतः इनके वंशज डांगी ढोली हà¥à¤à¥¤
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° मोहण ने à¤à¤• महाजन की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ से शादी की। इस कारण मोहण के वंशज मà¥à¤¹à¤£à¥‹à¤¤ वैशà¥à¤¯ कहलाये। मà¥à¤¹à¤£à¥‹à¤¤ नैणसी इसी खांप से थे।
रायपाल के वंशज मापा के वंशज मापावत राठौड़ कहलाये।
रायपाल के वंशज लूका के वंशज लूका राठौड़ कहलाये।
रायपाल के वंशज राजक के वंशज राजक राठौड़ कहलाये।
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° विकà¥à¤°à¤® के वंशज विकà¥à¤°à¤®à¤¾à¤¯à¤¤ राठौड़ कहलाये। (राजपूत वंशावली -ईशà¥à¤µà¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह मढाढ ने रादां, मूपा और बूला à¤à¥€ रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ से निकली हà¥à¤ˆ खांपें मानी जाती है। )
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤µà¤£ के वंशज à¤à¥‹à¤µà¥‹à¤¤ राठौड़ कहलाये।
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° कानपाल हà¥à¤à¥¤ कानपाल के जालण और जालण के पà¥à¤¤à¥à¤° छाड़ा के पà¥à¤¤à¥à¤° बांदर के वंशज बांदर राठौड़ कहलाये। घड़सीसर (बीकानेर राजà¥à¤¯) में बताये जाते है।
रायपाल के पà¥à¤¤à¥à¤° ऊना के वंशज ऊना राठौड़ कहलाये।
छाड़ा के पà¥à¤¤à¥à¤° खोखर के वंशज खोखर राठौड़ कहलाये। खोखर ने साकड़ा, सनावड़ा आदि गांवों पर अधिकार किया और खोखर गांव (बाड़मेर) बसाया। अलाउदà¥à¤¦à¥€à¤¨ खिलजी ने सांतल दे के समय सिवाना पर चढ़ाई की तब खोखर जी सांतल दे के पकà¥à¤· में वीरता के साथ लड़े और यà¥à¤¦à¥à¤§ में काम आये।
छाड़ा के पà¥à¤¤à¥à¤° सिंहल के वंशज सिंहमकलोत राठौड़ कहलाये।
रावल तीड़ा के पà¥à¤¤à¥à¤° कानड़दे के पà¥à¤¤à¥à¤° रावल के पà¥à¤¤à¥à¤° तà¥à¤°à¤¿à¤à¤µà¤¨ के पà¥à¤¤à¥à¤° उदा के ‘बीठवास’ जागीर था। अतः उदा के वंशज बीठवासिया उदावत कहलाये। उदाजी के पà¥à¤¤à¥à¤° बीरमजी बीकानेर रियासत के साहà¥à¤µà¥‡ गांव से आये। जोधाजी ने उनको बीठवासिया गांव की जागीर दी। इस गांव के अतिरिकà¥à¤¤ वेगडियो व धà¥à¤¨à¤¾à¤¡à¤¿à¤¯à¤¾ गांव à¤à¥€ इनकी जागीर में थे।
छांडा के पà¥à¤¤à¥à¤° तीड़ा के पà¥à¤¤à¥à¤° सलखा के वंशज सलखाखत राठौड़ कहलाये।
सलखा के पà¥à¤¤à¥à¤° जैतमाल के वंशज जैतमालोत राठौड़ कहलाये। ये बीकानेर रियासत में à¤à¥€ कहीं 2 निवास करते है।
जैतमाल सलखावत के पà¥à¤¤à¥à¤° खेतसी के वंशज है। गांव थापणा इनकी जागीर में था।
जैतमाल के पà¥à¤¤à¥à¤° खींवा ने राड़धडा पर अधिकार किया। अतः उनके वंशज राड़धडा सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के नाम से राड़धडा राठौड़ कहलाये।
सलखा राठौड़ के पà¥à¤¤à¥à¤° मलà¥à¤²à¥€à¤¨à¤¾à¤¥ बड़े पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤à¥¤ बाढ़मेर का महेवा कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° सलखा के पिता तीड़ा के अधिकार में था। वि. सं. १४१४ में मà¥à¤¸à¥à¤²à¤¿à¤® सेना का आकà¥à¤°à¤®à¤£ हà¥à¤†à¥¤ सलखा को कैद कर लिया गया। कैद से छà¥à¤Ÿà¤¨à¥‡ के बाद वि. सं. १४२२ में अपने शà¥à¤µà¤¸à¥à¤° राणा रूपसी पड़िहार की सहायता से महेवा को वापिस जीत लिया। वि. सं. १४३० में मà¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ का फिर आकà¥à¤°à¤®à¤£ हà¥à¤†à¥¤ सलखा ने वीर गति पाई। सलखा के सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर माला (मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ ) राजà¥à¤¯ हà¥à¤†à¥¤ इनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡à¤‚ मà¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ से सिवाना का किला जीता और अपने à¤à¤¾à¤ˆ जैतमाल को दे दिया व छोटे à¤à¤¾à¤ˆ वीरम को खेड़ की जागीर दी। नगर व à¤à¤¿à¤°à¤¡à¤¼à¤—ढ़ के किले à¤à¥€ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ ने अधिकार में किये। मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ शकà¥à¤¤à¤¿ संचय कर राठौड़ राजà¥à¤¯ का विसà¥à¤¤à¤¾à¤° करने और हिनà¥à¤¦à¥‚ संसà¥à¤•ृति की रकà¥à¤·à¤¾ करने पर तà¥à¤²à¥‡ रहे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने मà¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨ आकà¥à¤°à¤®à¤£à¥‹à¤‚ को विफल कर दिया। मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ और उसकी रानी रूपादे, नाथ समà¥à¤ªà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¯ में दीकà¥à¤·à¤¿à¤¤ हà¥à¤ और ये दोनों सिदà¥à¤§ माने गà¤à¥¤ मलà¥à¤²à¤¿à¤¨à¤¾à¤¥ के जीवनकाल में ही उनके पà¥à¤¤à¥à¤° जगमाल को गदà¥à¤¦à¥€ मिल गई। जगमाल à¤à¥€ बड़े वीर थे। गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ का सà¥à¤²à¤¤à¤¾à¤¨ तीज पर इकटà¥à¤ ी हà¥à¤ˆ लड़कियों को हर ले गया तब जगमाल अपने योदà¥à¤§à¤¾à¤“ं के साथ गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ गया और गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤ सà¥à¤²à¤¤à¤¾à¤¨ की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ गींदोली का हरण कर लिया। तब राठौड़ों और मà¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ में यà¥à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤†à¥¤ इस यà¥à¤¦à¥à¤§ में जगमाल ने बड़ी वीरता दिखाई। कहा जाता है कि सà¥à¤²à¤¤à¤¾à¤¨ की बीवी को तो यà¥à¤¦à¥à¤§ में जगह जगह जगमाल ही दिखाई देता था।
इस समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§ में à¤à¤• दोहा पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ है –
“पग पग नेजा पाडियां , पग पग पाड़ी ढाल।
बीबी पूछे खान नै , जंग किता जगमाल।।â€
इसी जगमाल का महेवा पर अधिकार था। इस कारण इनके वंशज महेचा कहलाते है। महेवा राठौड़ों की खांपें इस पà¥à¤°à¤•ार है:
पातावत महेचा:
जगमाल के पà¥à¤¤à¥à¤° रावल मणà¥à¤¡à¤²à¥€à¤• बाद कà¥à¤°à¤®à¤¶à¤ƒ à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ, बीदा, नीसल, हापा, मेघराज व पताजी हà¥à¤à¥¤ इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ पता के वंशज पातावत महेचा हैं।
कालावत महेचा:
मेघराज के पà¥à¤¤à¥à¤° कलà¥à¤²à¤¾ के वंशज कालावत महेचा हैं।
दूतावत महेचा:
मेघराज के पà¥à¤¤à¥à¤° दूदा के वंशज दूतावत महेचा हैं।
उगा महेचा:
वरसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° उगा के वंशज उगा महेचा हैं।
मलà¥à¤²à¥€à¤¨à¤¾à¤¥ के छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° अरड़कमल ने बाड़मेर इलाके नाम से इनके वंशज बाढ़मेरा राठौड़ कहलाये।
मलà¥à¤²à¥€à¤¨à¤¾à¤¥ के पà¥à¤¤à¥à¤° जगमाल के जिन वंशजों का पोकरण इलाके में निवास हà¥à¤†à¥¤ वे पोकरण राठौड़ कहलाये।
मलà¥à¤²à¥€à¤¨à¤¾à¤¥ के पà¥à¤¤à¥à¤° जगमाल के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤¾à¤°à¤®à¤² हà¥à¤à¥¤ à¤à¤¾à¤°à¤®à¤² के पà¥à¤¤à¥à¤° खीमूं के पà¥à¤¤à¥à¤° नोधक के वंशज जामनगर के दीवान रहे इनके वंशज कचà¥à¤› में है। à¤à¤¾à¤°à¤®à¤² के दूसरे पà¥à¤¤à¥à¤° मांढण के वंशज माडवी (कचà¥à¤›) में रहते है वंशज, खाबड़ (गà¥à¤œà¤°à¤¾à¤¤) इलाके के नाम से खाबड़िया राठौड़ कहलाये।
जगमाल के पà¥à¤¤à¥à¤° कà¥à¤‚पा ने कोटड़ा पर अधिकार किया अतः कà¥à¤‚पा के वंशज कोटड़िया राठौड़ कहलाये। जगमाल के पà¥à¤¤à¥à¤° खींवसी के वंशज à¤à¥€ कोटडिया राठौड़ कहलाये।
सलखा के पà¥à¤¤à¥à¤° विराम के पà¥à¤¤à¥à¤° गोगा के वंशज गोगादे राठौड़ कहलाते है। केतॠ(चार गांव) सेखला (15 गांव) खिराज आदि इनके ठिकाने थे।
बीरम के पà¥à¤¤à¥à¤° देवराज के वंशज देवराजोत राठौड़ कहलाये। सेतरावों इनका मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाना था। सà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¿à¤¯à¤¾ आदि à¤à¥€ इनके ठिकाने थे।
वीरम के पौतà¥à¤° व देवराज के पà¥à¤¤à¥à¤° चाड़दे के वंशज चाड़देवोत राठौड़ हà¥à¤à¥¤ जोधपà¥à¤° परगने का देछॠइनका मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाना था। गीलाकोर में à¤à¥€ इनकी जागीर थी।
वीरम के पà¥à¤¤à¥à¤° जैतसिंह के वंशज जैसिधंदे राठौड़ हà¥à¤à¥¤
चà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾ वीरमदेवोत के पà¥à¤¤à¥à¤° सतà¥à¤¤à¤¾ के वंशज सतावत राठौड़ हà¥à¤à¥¤
चà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾ के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥€à¤‚व के वंशज à¤à¥€à¤‚वोत राठौड़ कहलाये। खाराबेरा (जोधपà¥à¤°) इनका ठिकाना था।
चà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾ के पà¥à¤¤à¥à¤° अरड़कमल वीर थे। राठौड़ो और à¤à¤¾à¤Ÿà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के शतà¥à¤°à¥à¤¤à¤¾ के कारण शारà¥à¤¦à¥‚ल à¤à¤¾à¤Ÿà¥€ जब कोडमदे मोहिल से शादी कर लौट रहा था, तब अरड़कमल ने रासà¥à¤¤à¥‡ में यà¥à¤¦à¥à¤§ के लिठललकारा और यà¥à¤¦à¥à¤§ में दोनों ही वीरता से लड़े। शारà¥à¤¦à¥‚ल à¤à¤¾à¤Ÿà¥€ ने वीरगति पाई और कोडमदे सती हà¥à¤ˆà¥¤ अरड़कमल à¤à¥€ उन घावों से कà¥à¤› दिनों बाद मर गà¤à¥¤ इस अरड़कमल के वंशज अरड़कमलोत राठौड़ कहलाये।
चà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾ के पà¥à¤¤à¥à¤° रणधीर के वंशज रणधीरोत राठौड़ है। फेफाना इनकी जागीर थी।
राव चà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾ के पà¥à¤¤à¥à¤° अरà¥à¤œà¥à¤¨ वंशज अरà¥à¤œà¥à¤¨à¥‹à¤¤ राठौड़ कहलाये।
चà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾ के पà¥à¤¤à¥à¤° कानà¥à¤¹à¤¾ वंशज कानावत राठौड़ कहलाये।
चà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾ के पà¥à¤¤à¥à¤° पूनपाल के वंशज पूनावत राठौड़ है। गांव खà¥à¤¦à¥€à¤¯à¤¾à¤¸ इनकी जागीर में था।
राव रणमलजी के जयेषà¥à¤ पà¥à¤¤à¥à¤° अखैराज थे। इनके दो पà¥à¤¤à¥à¤° पंचायण व महाराज हà¥à¤à¥¤ पंचायण के पà¥à¤¤à¥à¤° जैतावत के नाम पर इनके वंशज जैतावत राठौड़ कहलाते है।
१.) पिरथीराजोत जैतावत:
जैताजी के पà¥à¤¤à¥à¤° पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ के वंशज पिरथीराजोत जैतावत कहलाते हैं। बगड़ी (मारवाड़) व सोजत खोखरों, बाली आदि इनके ठिकाने थे।
२.) आसकरनोत जैतावत:
जैताजी के पौतà¥à¤° आसकरण देइदानोत के वंशज आसकरनोत जैतावत है। मारवाड़ में थावला, आलासण, रायरो बड़ों, सदामणी, लाबोड़ी मà¥à¤°à¤¢à¤¾à¤µà¥‹à¤‚ आदि इनके ठिकाने थे।
३.) à¤à¥‹à¤ªà¤¤à¥‹à¤¤ जैतावत:
जैताजी के पà¥à¤¤à¥à¤° देइदानजी à¤à¥‹à¤ªà¤¤ के वंशज à¤à¥‹à¤ªà¤¤à¥‹à¤¤ जैतावत कहलाते हैं। मारवाड़ में खांडों देवल, रामसिंह को गà¥à¤¡à¥‹ आदि इनके ठिकाने थे।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° अखैराज, इनके पà¥à¤¤à¥à¤° पंचारण के पà¥à¤¤à¥à¤° कला के वंशज कलावत राठौड़ कहलाते हैं। कलावत राठौड़ों के मारवाड़ में हूण व जाढ़ण दो गांवों के ठिकाने थे।
राव रणमल के पà¥à¤¤à¥à¤° अखैराज के बाद कà¥à¤°à¤®à¤¶à¤ƒ पंचायत व à¤à¤¦à¤¾ हà¥à¤à¥¤ इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ à¤à¤¦à¤¾ के वंशज à¤à¤¦à¤¾à¤µà¤¤ राठौड़ कहलाये। देछॠ(जालौर) के पास तथा खाबल व गà¥à¤¡à¤¾ (सोजत के पास) इनके मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाने थे।
मणà¥à¤¡à¥Œà¤° के रणमलजी के पà¥à¤¤à¥à¤° अखैराज के दो पà¥à¤¤à¥à¤° पंचायत व महाराज हà¥à¤à¥¤ महाराज के पà¥à¤¤à¥à¤° कूंपा के वंशज कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤ राठौड़ कहलाये। मारवाड़ का राजà¥à¤¯ जमाने में कूंपा व पंचायण के पà¥à¤¤à¥à¤° जैता का महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ योगदान रहा था। चितà¥à¤¤à¥Œà¤¡à¤¼ से बनवीर को हटाने में à¤à¥€ कूंपा की महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ à¤à¥‚मिका थी। मालदेव ने वीरम को जब मेड़ता से हटाना चाहा, कूंपा ने मालदेव का पूरà¥à¤£ साथ देकर इनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपना पूरà¥à¤£ योगदान दिया। मालदेव ने वीरम से डीडवाना छीना तो कूंपा को डीडवाना मिला। मालदेव की १५९८ वि. में बीकानेर विजय करने में कूंपा की महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ à¤à¥‚मिका थी। शेरशाह ने जब मालदेव पर आकà¥à¤°à¤®à¤£ किया और मालदेव को अपने सरदारों पर अविशà¥à¤µà¤¾à¤¸ हà¥à¤† तो उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने साथियों सहित यà¥à¤¦à¥à¤§à¤à¥‚मि छोड़ दी परनà¥à¤¤à¥ जैता व कूंपा कहा धरती हमारे बाप दादाओं के शौरà¥à¤¯ से पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤ˆ हैं हम जीवित रहते उसे जाने न देंगे। दोनों वीरों ने शेरशाह की सेना से टकà¥à¤•र ली और अदà¥à¤à¥à¤¤ शौरà¥à¤¯ दिखाते हà¥à¤ मातृà¤à¥‚मि की रकà¥à¤·à¤¾à¤°à¥à¤¥ बलिदान हो गà¤à¥¤ उनकी बहादà¥à¤°à¥€ से पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ होकर शेरशाह के मà¥à¤– से ये शबà¥à¤¦ निकल पड़े “मैंने मà¥à¤Ÿà¥à¤ ी à¤à¤° बाजरे के लिठदिलà¥à¤²à¥€ सलà¥à¤¤à¤¨à¤¤ खो दी होती।†इस पà¥à¤°à¤•ार अनेक यà¥à¤¦à¥à¤§à¥‹à¤‚ में आसोप के कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤à¥‹à¤‚ ने वीरता दिखाई। कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤ राठौड़ों की खांपें इस पà¥à¤°à¤•ार है:
महेशदासोत कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤:
वि. सं. १६४१ में बादशाह अकबर ने सिरोही के राजा सà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤¨ को दणà¥à¤¡ देने मोटे राजा उदयसिंह को à¤à¥‡à¤œà¤¾à¥¤ इस यà¥à¤¦à¥à¤§ में महेशदास के पà¥à¤¤à¥à¤° शारà¥à¤¦à¥‚लसिंह ने अदà¥à¤à¥à¤¤ पराकà¥à¤°à¤® दिखाया और वही रणखेत रहे। अतः उनके वंशज à¤à¤¾à¤µà¤¸à¤¿à¤‚ह को १à¥à¥¦à¥¨ वि. में कटवालिया के अलावा सिरयारी बड़ी à¤à¥€ उनका ठिकाना था। à¤à¤• à¤à¤• गांव के à¤à¥€ इनके काफी ठिकाने थे।
ईशà¥à¤µà¤°à¤¦à¤¾à¤¸à¥‹à¤¤ कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤:
कूंपा के पà¥à¤¤à¥à¤° ईशà¥à¤µà¤°à¤¦à¤¾à¤¸ के वंशज ईशà¥à¤µà¤°à¤¦à¤¾à¤¸à¥‹à¤¤ कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤ कहलाये। इनका मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाना चणà¥à¤¡à¤¾à¤µà¤² था।
माणà¥à¤¡à¤£à¥‹à¤¤ कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤:
कूà¤à¤ªà¤¾à¤œà¥€ के बड़े पà¥à¤¤à¥à¤° मांडण के वंशज माणà¥à¤¡à¤£à¥‹à¤¤ कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤ कहे जाते है। इनका मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाना चनà¥à¤¦à¥‡à¤²à¤¾à¤µ था।
जोधसिंहोत कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤:
कूà¤à¤ªà¤¾à¤œà¥€ के बाद कà¥à¤°à¤®à¤¶à¤ƒ मांडण,खीवकण,किशनसिंह,मà¥à¤•नà¥à¤¦à¤¸à¤¿à¤‚ह,जैतसिंह,रामसिंह व सरदारसिंह हà¥à¤à¥¤ सरदारसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° जोधसिंह ने महाराजा अà¤à¤¯à¤¸à¤¿à¤‚ह जोधपà¥à¤° की तरफ से अहमदाबाद के यà¥à¤¦à¥à¤§ में अचà¥à¤›à¥€ वीरता दिखाई। महाराजा ने जोधसिंह को गारासांण खेड़ा,à¤à¤¬à¤°à¤•à¥à¤¯à¤¾ और कà¥à¤®à¥à¤à¤¾à¤°à¤¾ इनायत किया। इनके वंशज जोधासिंहोत कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤ कहलाते हैं।
उदयसिंहोत कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤:
कूà¤à¤ªà¤¾à¤œà¥€ के चौथे पà¥à¤¤à¥à¤° उदयसिंह के वंशज उदयसिंहोत कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤ कहलाते हैं। उदयसिंह के वंशज छतà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह को वि. १८३१ में बूसी का ठिकाना (परगना गोड़वाड़) मिला। वि. सं. १à¥à¥§à¥« के धरमत के यà¥à¤¦à¥à¤§ में उदयसिंह के वंशज कलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤¸à¤¿à¤‚ह घोड़ा आगे बढ़ाकर तलवारों की रीढ़ के ऊपर घà¥à¤¸à¥‡ और वीरता दिखाते हà¥à¤ काम आये। यह कà¥à¤°à¤¬ बापसाहब का ठिकाना था। चेलावास,मलसा,बावड़ी,हापत,सीहास,रढावाल,मोड़ी आदि छोटे ठिकाने थे।
तिलोकसिंहोत कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤:
कूंपा के सबसे छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° तिलोकसिंह के वंशज तिलोकसिंहोत कूà¤à¤ªà¤¾à¤µà¤¤ कहलाते हैं। तिलोकसिंह ने सूरसिंहजी जोधपà¥à¤° की तरफ से किशनगढ़ के यà¥à¤¦à¥à¤§ में वीरगति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ की। इस कारण तिलोकसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥€à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह को घलणा का ठिकाना सूरसिंह जोधपà¥à¤° ने वि. १६५४ में इनायत किया।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° जोधा के वंशज जोधा राठौड़ कहलाये। राव जोधा जी का जनà¥à¤® २८ मारà¥à¤š, १४१६, तदनà¥à¤¸à¤¾à¤° à¤à¤¾à¤¦à¤µà¤¾ बदी ८ सं. १४à¥à¥¨ में हà¥à¤† था। इनके पिता राव रणमल मारवाड़ के शासक थे। इनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ जोधपà¥à¤° शहर की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ के लिठजाना जाता है। इनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने ही जोधपà¥à¤° का मेहरानगढ़ दà¥à¤°à¥à¤— बनवाया था।
जोधपà¥à¤° नरेश सूजाजी के à¤à¤• पà¥à¤¤à¥à¤° उदाजी थे। इनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने १५३९ वि. में सींधल खीवा से जैतारण विजय किया। इनके वंशज उदावत राठौड़ कहलाते हैं। राव उदा जी ने १५३९ विकà¥à¤°à¤®à¥€ में सिंधल खीवा से जेतारण विजय किया। राव उदा के छः पà¥à¤¤à¥à¤° थे –
राव मालमसिंह जी : मालमसिंह के वंशजों के लोटती, गलगिया आदि ठिकाने थे ।
राव डूंगरसिंह जी : डूंगर सिंह हरमाड़े सà¥à¤¥à¤² पर राणा उदयसिंह व हाजीखां के बीच यà¥à¤¦à¥à¤§ में हाजी खां के पकà¥à¤· में लड़ते हà¥à¤ काम आये ।
राव नेतसी जी : तीसरे पà¥à¤¤à¥à¤° नेतसी के वंशजों के अधिकार में बाछीमाड़ा, रायपà¥à¤° आदि ठिकाने थे ।
राव जैतसी जी : चौथे पà¥à¤¤à¥à¤° जेतसी के वंशज छीपिया नाबेड़ा में है
राव खेतसी जी : पांचवे पà¥à¤¤à¥à¤° खेतसी के वंशज बोयल गाà¤à¤µ के अधिकारी थे ।
खींवकरण जी : छठे पà¥à¤¤à¥à¤° खींवकरण थे। इनके पà¥à¤¤à¥à¤° रतनसिंह, मालसिंह ( जेतारण ) गोद चले गठ। खिंवकरण बड़े वीर थे सà¥à¤®à¥‡à¤² के यà¥à¤¦à¥à¤§ में शेरशाह के विरà¥à¤¦à¥à¤§ लड़ते हà¥à¤ काम आये ।
उदावत राठौड़ो के पà¥à¤°à¤®à¥à¤– ठिकाने:
उदावत राठौड़ों के बड़े ठिकानों में 01 – ठिकाना रायपà¥à¤° (21 गाà¤à¤µ) 02 – नीमाज (9 गाà¤à¤µ) 03 – रास (14 गाà¤à¤µ) 04 – लाबिया (6 गाà¤à¤µ) 07 – गà¥à¤¦à¤µà¤š (6 गाà¤à¤µ) पà¥à¤°à¤®à¥à¤– थे।
बीका जोधपà¥à¤° के राव जोधा का पà¥à¤¤à¥à¤° था। जोधा का बड़ा पà¥à¤¤à¥à¤° नीबा जोधा की हाडी राणी जसमादे के पà¥à¤¤à¥à¤° थे। वे पिता को विदà¥à¤¯à¤®à¤¾à¤¨à¤¤à¤¾ में ही मर गठथे। जसमादे के दो पà¥à¤¤à¥à¤° सांतल व सà¥à¤œà¤¾ थे। बीका सांतल से बड़े थे। पितृ à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ के कारण उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने चाचा कांधल के साथ होकर जांगल पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ पर अधिकार कर नया राजà¥à¤¯ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ कर लिया था और सांतल को जोधपà¥à¤° की गदà¥à¤¦à¥€ मिलने पर कोई à¤à¤¤à¤°à¤¾à¤œ नहीं किया। इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ बीका के वंशज बीका राठौड़ कहलाते हैं।
बीदावत राठौड़ जोधपà¥à¤° के राठौड़ राव जोधा के पà¥à¤¤à¥à¤° बीदा के वंश हैं। राव बीदा ने à¤à¤¾à¤ˆ राव बीका और चाचा रावत कांधल की सहायता से मोहिलों को पराजित करके बीदावाटी पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ बसाया जहाठबीदा के वंशधर बीदावत राठौड़ कहलाये।
बीदा ने अपने जीवन काल में बड़े पà¥à¤¤à¥à¤° उदयकरण को दà¥à¤°à¥‹à¤£à¤ªà¥à¤° और संसारचनà¥à¤¦à¥à¤° को पड़िहार दिया । उदयकरण के पà¥à¤¤à¥à¤° कलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤¦à¤¾à¤¸ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ लूणकरण बीकानेर का विरोध करने के कारण दà¥à¤°à¥‹à¤£à¤ªà¥à¤° से कलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤¦à¤¾à¤¸ का अधिकार हट गया । बीदा की समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ à¤à¥‚मि पर संसारचनà¥à¤¦à¥à¤° के पà¥à¤¤à¥à¤° सांगा का अधिकार हो गया। सांगा के पà¥à¤¤à¥à¤° गोपालदास के पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ से बीदावतों की कई खांपों की उतà¥à¤ªà¤¤à¥à¤¤à¤¿ हà¥à¤ˆà¥¤
जोधपà¥à¤° के शासक जोधा के पà¥à¤¤à¥à¤° दूदाजी के वंशज मेड़ता नगर के नाम से मेड़तिया कहलाये। राव दूदा जी का जनà¥à¤® राव जोधा जी की सोनगरी राणी चामà¥à¤ªà¤¾ के गरà¥à¤ से १५ जूंन १४४० को हà¥à¤† । राव दूदा जी ने मेड़ता नगर बसाया । इसमें उनके à¤à¤¾à¤ˆ राव बरसिà¤à¤¹ जी का à¤à¥€ साथ था। राव बरसिà¤à¤¹ जी व राव दूदा जी ने सांखà¥à¤²à¥‹à¤‚ (परमार ) से चौकड़ी ,कोसाणा आदि जीते । राव बीकाजी जी दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ सारंगखां के विरà¥à¤¦à¥à¤§ किये गये यà¥à¤¦à¥à¤§ में राव दूदा जी ने अदà¥à¤à¥à¤¤ वीरता दिखाई । मलà¥à¤²à¥‚खां ( सांà¤à¤° का हाकिम ) ने जब मेड़ता पर अधिकार कर लिया था । राव दूदा जी, राव सांतल जी, राव सूजा जी, राव बरसिà¤à¤¹ जी, बीसलपà¥à¤° पहà¥à¤‚चे और मलà¥à¤²à¥‚खां को पराजित किया । मलà¥à¤²à¥‚खां ने राव बरसिà¤à¤¹ जी को अजमेर में जहर दे दिया जिससे राव बरसिà¤à¤¹ जी की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ हो गयी उनका पà¥à¤¤à¥à¤° सीहा गदà¥à¤§à¥€ पर बेठऔर इसके बाद मेड़ता राव दूदा जी और सीहा में बंटकर आधा – आधा रह गया ।
राव दूदा जी के पांच पà¥à¤¤à¥à¤° थे – (01) वीरमदेव – मेड़ता (02) रायमल – खानवा के यà¥à¤¦à¥à¤§ में वीरगति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤ । (03) रायसल (04) रतनसिंह – कूड़की ठिकाने के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€, खानवा के यà¥à¤¦à¥à¤§ में वीरगति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤ । (05) पंचायण मीराबाई रतन सिंह की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ थी । रतनसिंह कूड़की ठिकाने के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ थे ।
राव दूदा जी के पà¥à¤¤à¥à¤° वीरमदेव ईसवी १५१५ में मेड़ता की गदà¥à¤§à¥€ पर बैठे । इनका जनà¥à¤® १९ नवमà¥à¤¬à¤° १४à¥à¥ को हà¥à¤† । १ॠमारà¥à¤š खानवा में बाबर वॠसांगा के बीच हà¥à¤ यà¥à¤¦à¥à¤§ में वीरमदेव ने राणा सांगा का साथ दिया । राणा सांगा की मूरà¥à¤›à¤¿à¤¤ अवसà¥à¤¥à¤¾ के समय वे à¤à¥€ घायल थे । इस यà¥à¤¦à¥à¤§ में उनके à¤à¤¾à¤ˆ रायमल वॠरतनसिंह à¤à¥€ मà¥à¤—ल सेना से लड़ते हà¥à¤ वीरगति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤ । जोधपà¥à¤° के राजा मालदेव मेड़ता पर अधिकार करना चाहते थे । वीरमदेव ने 1536 ईसà¥à¤µà¥€ में अजमेर पर à¤à¥€ अधिकार कर लिया था । मालदेव ने अजमेर लेना चाहा पर वीरमदेव ने नहीं दिया तब मालदेव ने मेड़ता पर आकà¥à¤°à¤®à¤£ कर दिया । मालदेव का मेड़ता पर अधिकार हो गया । कà¥à¤› समय बाद मालदेव का अजमेर पर à¤à¥€ अधिकार हो गया । तब वीरमदेव रायमल अमरसर के पास चलेगठ। वीरमदेव आपने राजà¥à¤¯ मेड़ता पर पà¥à¤¨à¤ƒ अधिकार करना चाहते थे अतः वीरमदेव रणथमà¥à¤à¥‹à¤° की नवाब की मदद से शेरशाह के पास पहà¥à¤à¤š गठ। और मालदेव पर आकà¥à¤°à¤®à¤£ करने के लिठशेरशाह को तेयार किया । बीकानेर के राव कलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤®à¤² à¤à¥€ मालदेव दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ बीकानेर छीन लेने के कारन मालदेव के विरà¥à¤¦à¥à¤§ थे । उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¥€ शेरशाह का साथ दिया । शेरशाह को बड़ी सेना लेकर जोधपà¥à¤° की तरह बढ़ा और विकà¥à¤°à¤®à¥€ संवत १६०० ईसà¥à¤µà¥€ १५४४ में अजमेर के पास सà¥à¤®à¥‡à¤² सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर यà¥à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤† । मालदेव पहले ही मैदान छोड़ चà¥à¤•ा था । जैता और कà¥à¤®à¥à¤ªà¤¾ शेरशाह के सामने डटे रहे परनà¥à¤¤à¥ मालदेव की सेना को पराजीत होना पड़ा । इस यà¥à¤¦à¥à¤§ के बाद वीरमदेव ने मेड़ता पर पà¥à¤¨à¤ƒ अधिकार कर लिया ।
वीरमदेव के 10 पà¥à¤¤à¥à¤° थे । (01) जयमल – बदनोर (चितोड़) (02) ईशरदास (03) करण (04) जगमाल (05) चांदा (06) बीका – बीका के पà¥à¤¤à¥à¤° बलू को बापरी सोजत चार गाà¤à¤µ मिला (07) पृथà¥à¤µà¥€à¤°à¤¾à¤œ – इनके वंशज मेड़ता में रहे (08) पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¤¸à¤¿à¤‚ह (09) सारंगदे (10) मांडण ।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° चांपाजी थे। चांपाजी ने वि.सं. १५२२ में सà¥à¤²à¥à¤¤à¤¾à¤¨ महमूद खिलजी के साथ यà¥à¤¦à¥à¤§ किया था। वि.सं. १५३६ में मणियारी के पास सीधलों के साथ यà¥à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤† जिसमें चांपा वीरगति को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤à¥¤
इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ चांपा के वंशधर चांपावत राठौड़ कहलाये। इनके मारवाड़ में काफी ताजीमी ठिकाने थे। जयपà¥à¤° राजà¥à¤¯ में गीजगढ़, नायला, गौनेर और काणूता मेवाड़ ने कथरिया, मालोल व गोरडियो तथा कोटा में सारथल। गà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¿à¤¯à¤° राजà¥à¤¯ में वागली तथा ईडर राजà¥à¤¯ में टिटोई चांदनी व मोई चामà¥à¤ªà¤¾à¤µà¤¤à¥‹à¤‚ के ठिकाने थे।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° मणà¥à¤¡à¤²à¤¾à¤œà¥€ ने वि. सं. १५२२ में सारूंडा (बीकानेर राजà¥à¤¯) पर अधिकार कर लिया था। यह इनका मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाना था। इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ मणà¥à¤¡à¤²à¤¾ के वंशज मणà¥à¤¡à¤²à¤¾à¤µà¤¤ राठौड़ है।
बाला राठौड़ – राव रिड़मल (रणमल) के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤¾à¤–रसी के वंशज à¤à¤¾à¤–रोत राठौड़ कहलाये। इनके पà¥à¤¤à¥à¤° बाला बड़े बहादà¥à¤° थे। इनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡à¤‚ कई यà¥à¤¦à¥à¤§à¥‹à¤‚ में वीरता का परिचय दिया। चितà¥à¤¤à¥Œà¤¡à¤¼ के पास कपासण में राठौड़ों और शीशोदियों में यà¥à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤†à¥¤ इस यà¥à¤¦à¥à¤§ में बाला घायल हà¥à¤à¥¤ सिंघलों से वि. सं. १५३६ में जोधपà¥à¤° का यà¥à¤¦à¥à¤§ मणियारी नामक सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ हà¥à¤†à¥¤ इस यà¥à¤¦à¥à¤§ में चांपाजी मारे गà¤à¥¤ बाला ने सिंघलो को à¤à¤—ाकर अपने काकाजी का बदला लिया। इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ बाला के वंशज बाला राठौड़ कहलाये। मोकलसर (सिवाना) नीलवाणों (जालौर) माणà¥à¤¡à¤µà¤²à¤¾ (जालौर) इनके ताजमी ठिकाने थे। à¤à¤²à¤¾à¤£à¥‹à¤‚, ओडवाणों, सीवाज आदि इनके छोटे छोटे ठिकाने थे।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° पाता à¤à¥€ बड़े वीर थे। वि. सं. १४९५ में कपासण (चितà¥à¤¤à¥Œà¤¡à¤¼ के पास) सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर शीशोदियों व राठौड़ों में यà¥à¤¦à¥à¤§ हà¥à¤†à¥¤ इस यà¥à¤¦à¥à¤§ में पाताजी वीरगति को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤†à¥¤ इनके पातावत राठौड़ कहलाये। पातावतों के आऊ (फलौदी- ४ गांव) करण (जोधपà¥à¤°) पलोणा (फलौदी) ताजीम के ठिकाने थे। इनके अलावा अजाखर, आवलो, केरलो, केणसर, खारियों (मेड़ता) खारियों (फलौदी) घंटियाली, चिमाणी, चोटोलो, पलीणो, पीपासर à¤à¤—à¥à¤†à¤¨à¥‡ शà¥à¤°à¥€ बालाजी, मयाकोर, माडवालो, मिठà¥à¤ ियों à¤à¥‚ंडासर, बाड़ी, रणीसीसर, लाडियो, लूणो, लà¥à¤¬à¤¾à¤¸à¤°, सेवड़ी आदि छोटे छोटे ठिकाने जोधपà¥à¤° रियासत में थे।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° रूपा ने बीका का उस समय साथ दिया जब वे जांगल देश पर अधिकार रहे थे। इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ रूपा के वंशज रूपावत राठौड़ हà¥à¤à¥¤ मारवाड़ में इनका चाखू à¤à¤• ताजीमी ठिकाना था। दूसरा ताजीमी ठिकाना à¤à¤¾à¤¦à¤²à¤¾ (बीकानेर राजà¥à¤¯) था। इनके अतिरिकà¥à¤¤ ऊदट (फलौदी) कलवाणी (नागौर) à¤à¥‡à¤¡à¤¼ (फलौदी) मूंजासर (फलौदी) मारवाड़ में तथा सोà¤à¤¾à¤£à¥‹, उदासर आदि बीकानेर राजà¥à¤¯ के छोटे छोटे ठिकाने थे।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° करण के वंशज करणोत राठौड़ कहलाये। इसी वंश में दà¥à¤°à¥à¤—ादास (आसकरणोत) हà¥à¤à¥¤ जिन पर आज à¤à¥€ सारा राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ गरà¥à¤µ करता है। अनेकों कषà¥à¤Ÿ सहकर इनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡à¤‚ मातृà¤à¥‚मि की इजà¥à¤œà¤¤ रखी। अपनी सà¥à¤µà¤¾à¤®à¤¿à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ के लिठये इतिहास में पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ रहे है।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° मांडण के वंशज माणà¥à¤¡à¤£à¥‹à¤¤ राठौड़ कहलाते हैं। मारवाड़ में अलाय इनका ताजीमी ठिकाना था। इनके अतिरिकà¥à¤¤ गठीलासर, गडरियो, गोरनà¥à¤Ÿà¥‹, रोहिणी, हिंगवाणिया आदि इनके छोटे छोटे ठिकाने थे।
नाथा राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° थे। राव चूंडा नागौर के यà¥à¤¦à¥à¤§ में à¤à¤¾à¤Ÿà¥€ केलण के हाथों मारे गà¤à¥¤ नाथाजी ने अपने दादा का बेर केलण के पà¥à¤¤à¥à¤° अकà¥à¤•ा को मार कर लिया। इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ नाथा के वंशज नाथोत राठौड़ कहलाते हैं। पहले चानी इनका ठिकाना था।नाथूसर गांव इनकी जागीर में था।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° सांडा के वंशज सांडावत राठौड़ कहलाते हैं।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° बेरा के वंशज बेरावत राठौड़ कहलाते हैं। दूधवड़ इनका गांव था।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° अडवाल के वंशज अडवाल राठौड़ कहलाते हैं। ये मेड़ता के गांव आछोजाई में रहे। राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° :
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° जगमाल के पà¥à¤¤à¥à¤° खेतसी के वंशज खेतसिंहोत राठौड़ कहलाते हैं। इनको नेतड़ा गांव मिला था।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° लखा के वंशज लखावत राठौड़ कहलाते हैं।
राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° डूंगरसी के वंशज डूंगरोज राठौड़ कहलाते हैं। डूंगरसी को à¤à¤¾à¤¦à¥à¤°à¤œà¥‚ण मिला था।
राव रिड़मल के पौतà¥à¤° à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जैतमालोत के वंशज à¤à¥‹à¤œà¤¾à¤°à¤¾à¤œà¥‹à¤¤ राठौड़ कहलाते हैं। इनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ पलसणी गांव मिला था। (राव रिड़मल के पà¥à¤¤à¥à¤° हापा, सगता, गोयनà¥à¤¦, करà¥à¤®à¤šà¤‚द और उदा के वंशजों की जानकारी उपलबà¥à¤§ नहीं। उदा के वंशज बीकानेर के उदासर आदि गांव में सà¥à¤¨à¥‡ जाते हैं )
I am Gagan Singh Shekhawat, a renowned online marketer with extensive experience and expertise in internet marketing. Beyond my professional career, I have always carried a deep desire to unfold the majestic and mystical glory of India and share it with the world. From this vision, the foundation of ‘Our Society’ was born-an initiative that is truly my brainchild.
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