शेखावत या शेखावत सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी कछवाह
राजपूत – सूरà¥à¤¯ वंश – कछवाह – शाखा – शेखावत कछवाह
शेखावत – शेखा जी के वंशज शेखावत कहलाते हैà¤à¥¤ शेखा जी को महाराव की उपाधि थी इसलिठमहाराव शेखा जी के नाम से जानें जाते थे, महाराव शेखा जी राव मोकल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° व बाला जी के पौतà¥à¤° थे। महाराव शेखा जी के दादाजी आमेर के राजा उदयकरण जी के तिसरे पà¥à¤¤à¥à¤° थे।
[दो शबà¥à¤¦ – कछवाहों और शेखावतों का पूरा इतिहास जानने से पहले यह à¤à¥€ जान ले कि कछवाहों की मूल रूप से केवल 35 ही शाखाये ही हैं, बाकि शेखावतों में हैं कà¥à¤› लोग अधूरे जà¥à¤žà¤¾à¤¨ के कारण इनको मिलकर खिचड़ी बनाकर लिख देते है जिस के कारन जिजà¥à¤žà¤¾à¤¸à¥ à¤à¤°à¥à¤®à¥€à¤¤ हो जाता है और वो कछवाह और शेखावतों के बीच में जो थोड़ा बहà¥à¤¤ जो फासला (अंतर) है उसको वो नहीं समठपाता है। कछवाह बहà¥à¤¤ ही विसà¥à¤¤à¤¾à¤°à¤¿à¤¤ à¤à¤• समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ वंस है जबकि शेखावत कछवाहों कि à¤à¤• शाखा है जो राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में ही पà¥à¤°à¤«à¥à¤²à¤¿à¤¤ हà¥à¤¯à¥€à¥¤ 36 वीं शाखा से शेखावतों कि शाखा शà¥à¤°à¥‚ होकर आगे चलकर अनेक उपशाखाओं व खाà¤à¤ªà¥‹à¤‚ में विà¤à¤¾à¤œà¤¿à¤¤ होकर à¤à¤• विशाल वट वृकà¥à¤· जाता है।]
महाराव शेखा जी के दादाजी आमेर के राजा उदयकरण जी के तिसरे पà¥à¤¤à¥à¤° थे।राव शेखा जी के पà¥à¤¤à¥à¤° राव सूजा जी और जगमल जी ने सनॠ1503 के लगà¤à¤— बानà¥à¤¸à¥‚र पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ पर अपना पà¥à¤°à¤à¥à¤¤à¥à¤µ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया। सूजा जी ने बसई को अपनी राजधानी बनाया और जगमाल जी हाजीपà¥à¤° चले गà¤à¥¤ सनॠ1537 में सूजा जी का देहावसान हो गया और राव सूजा जी के पà¥à¤¤à¥à¤° लूणकरà¥à¤£ जी, रायसल जी, चाà¤à¤¦à¤¾ जी और à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ बड़े पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥€ और वीर हà¥à¤ थे। शेखावटी के खेतडी, खणà¥à¤¡à¥‡à¤²à¤¾, सीकर, शाहपà¥à¤°à¤¾ आदि नगरोठमें लूणकरà¥à¤£ और रायसल बसई में अब तक खणà¥à¤¡à¤¹à¤° पड़ा हà¥à¤† है। शेखावत कछवाहोठका पीढी कà¥à¤°à¤® इस पà¥à¤°à¤•ार है -:
शेखा जी – राव मोकल जी – बाला जी – उदयकरण जी – जà¥à¤£à¤¸à¥€ जी (जà¥à¤£à¤¸à¥€, जानसी, जà¥à¤£à¤¸à¥€à¤¦à¥‡à¤µ जी, जसीदेव) – जी – कà¥à¤¨à¥à¤¤à¤²à¤¦à¥‡à¤µ जी – किलहन देवजी (कीलà¥à¤¹à¤£à¤¦à¥‡à¤µ,खिलनà¥à¤¦à¥‡à¤µ) – राज देवजी – राव बयालजी (बालोजी) – मलैसी देव – पà¥à¤œà¤¨à¤¾ देव (पाजून, पजà¥à¤œà¥‚णा) – जानà¥à¤¦à¤¦à¥‡à¤µ – हà¥à¤¨ देव – कांकल देव – दà¥à¤²à¤¹à¤°à¤¾à¤¯ जी (ढोलाराय) – सोढ देव (सोरा सिंह) – इशà¥à¤µà¤°à¤¦à¤¾à¤¸ (ईशदेव जी) खà¥à¤¯à¤¾à¤¤ अनà¥à¤¸à¤¾à¤° शेखावत कछवाहोठका पीढी कà¥à¤°à¤® ईस पà¥à¤°à¤•ार है –:
01 – à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ राम – à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ राम के बाद कछवाहा (कछवाह) कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ राजपूत राजवंश का इतिहास इस पà¥à¤°à¤•ार à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ राम का जनà¥à¤® बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾à¤œà¥€ की 67वीठपिढी मेठऔर बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾à¤œà¥€ की 68वीठपिढी मेठलव व कà¥à¤¶ का जनà¥à¤® हà¥à¤†à¥¤ à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ राम के दो पà¥à¤¤à¥à¤° थे –
01 – लव
02 – कà¥à¤¶
रामायण कालीन महरà¥à¤·à¤¿ वालà¥à¤®à¤¿à¤•ी की महान धरा à¤à¤µà¤‚ माता सीता के पà¥à¤¤à¥à¤° लव-कà¥à¤¶ का जनà¥à¤® सà¥à¤¥à¤² कहे जाने वाला धारà¥à¤®à¤¿à¤• सà¥à¤¥à¤² तà¥à¤°à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ है। – लव और कà¥à¤¶ राम तथा सीता के जà¥à¤¡à¤¼à¤µà¤¾à¤‚ बेटे थे। जब राम ने वानपà¥à¤°à¤¸à¥à¤¥ लेने का निशà¥à¤šà¤¯ कर à¤à¤°à¤¤ का राजà¥à¤¯à¤¾à¤à¤¿à¤·à¥‡à¤• करना चाहा तो à¤à¤°à¤¤ नहीं माने। अत: दकà¥à¤·à¤¿à¤£ कोसल पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ (छतà¥à¤¤à¥€à¤¸à¤—ढ़) में कà¥à¤¶ और उतà¥à¤¤à¤° कोसल में लव का अà¤à¤¿à¤·à¥‡à¤• किया गया।
– राम के काल में à¤à¥€ कोशल राजà¥à¤¯ उतà¥à¤¤à¤° कोशल और दकà¥à¤·à¤¿à¤£ कोशल में विà¤à¤¾à¤œà¤¿à¤¤ था। कालिदास के रघà¥à¤µà¤‚श अनà¥à¤¸à¤¾à¤° राम ने अपने पà¥à¤¤à¥à¤° लव को शरावती का और कà¥à¤¶ को कà¥à¤¶à¤¾à¤µà¤¤à¥€ का राजà¥à¤¯ दिया था। शरावती को शà¥à¤°à¤¾à¤µà¤¸à¥à¤¤à¥€ मानें तो निशà¥à¤šà¤¯ ही लव का राजà¥à¤¯ उतà¥à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤°à¤¤ में था और कà¥à¤¶ का राजà¥à¤¯ दकà¥à¤·à¤¿à¤£ कोसल में। कà¥à¤¶ की राजधानी कà¥à¤¶à¤¾à¤µà¤¤à¥€ आज के बिलासपà¥à¤° जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशलà¥à¤¯à¤¾ की जनà¥à¤® à¤à¥‚मि माना जाता है।– रघà¥à¤µà¤‚श के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° कà¥à¤¶ को अयोधà¥à¤¯à¤¾ जाने के लिठविंधà¥à¤¯à¤¾à¤šà¤² को पार करना पड़ता था इससे à¤à¥€ सिदà¥à¤§ होता है कि उनका राजà¥à¤¯ दकà¥à¤·à¤¿à¤£ कोसल में ही था। राजा लव से राघव राजपूतों का जनà¥à¤® हà¥à¤† जिनमें बरà¥à¤—à¥à¤œà¤°, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गà¥à¤¹à¤¿à¤²) वंश के राजा हà¥à¤à¥¤ कà¥à¤¶ से कà¥à¤¶à¤µà¤¾à¤¹ (कछवाह) राजपूतों का वंश चला। à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• तथà¥à¤¯à¥‹à¤‚ के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° लव ने लाहौर की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ की थी, जो वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ में पाकिसà¥à¤¤à¤¾à¤¨ सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ शहर लाहौर है। यहां के à¤à¤• किले में लव का à¤à¤• मंदिर à¤à¥€ बना हà¥à¤† है। लवपà¥à¤°à¥€ को बाद में लौहपà¥à¤°à¥€ कहा जाने लगा। दकà¥à¤·à¤¿à¤£-पूरà¥à¤µ à¤à¤¶à¤¿à¤¯à¤¾à¤ˆ देश लाओस, थाई नगर लोबपà¥à¤°à¥€, दोनों ही उनके नाम पर रखे गठसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ हैं। राम के दोनों पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में कà¥à¤¶ का वंश आगे बढ़ा ।
02 – कà¥à¤¶ – à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€ राम के पà¥à¤¤à¥à¤° लव, कà¥à¤¶ हà¥à¤¯à¥‡à¥¤
03 – अतिथि – कà¥à¤¶ के पà¥à¤¤à¥à¤° अतिथि हà¥à¤¯à¥‡à¥¤
04 – वीरसेन (निषध) – वीरसेन जो कि निषध देश के à¤à¤• राजा थे। à¤à¤¾à¤°à¤¶à¤¿à¤µ राजाओं में वीरसेन सबसे पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ राजा था। कà¥à¤·à¤¾à¤£à¥‹à¤‚ को परासà¥à¤¤ करके अशà¥à¤µà¤®à¥‡à¤§ यजà¥à¤žà¥‹à¤‚ का समà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¨ उसी ने किया था। धà¥à¤°à¥à¤µà¤¸à¤‚धि की 2 रानियाठथीं। पहली पतà¥à¤¨à¥€ महारानी मनोरमा कलिंग के राजा वीरसेन की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ थी । वीरसेन (निषध) के à¤à¤• पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ व दो पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤ थे:-
01- मदनसेन (मदनादितà¥à¤¯) – (निषध देश के राजा वीरसेन का पà¥à¤¤à¥à¤°) सà¥à¤•ेत के 22 वेठशासक राजा मदनसेन ने बलà¥à¤¹ के लोहारा नामक सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ मे सà¥à¤•ेत की राजधानी सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ की। राजा मदनसेन के पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤ कमसेन जिनके नाम पर कामाखà¥à¤¯à¤¾ नगरी का नाम कामावती पà¥à¤°à¥€ रखा गया।
02 – राजा नल – (निषध देश के राजा वीरसेन का पà¥à¤¤à¥à¤°) निषध देश पà¥à¤°à¤¾à¤£à¤¾à¤¨à¥à¤¸à¤¾à¤° à¤à¤• देश का पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ नाम जो विनà¥à¤§à¥à¤¯à¤¾à¤šà¤² परà¥à¤µà¤¤ पर सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ था।
03 – मनोरमा (पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€) – अयोधà¥à¤¯à¤¾ में à¤à¤—वान राम से कà¥à¤› पीढ़ियों बाद धà¥à¤°à¥à¤µà¤¸à¤‚धि नामक राजा हà¥à¤ । उनकी दो सà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ थीं । पटà¥à¤Ÿà¤®à¤¹à¤¿à¤·à¥€ थी कलिंगराज वीरसेन की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ मनोरमा और छोटी रानी थी उजà¥à¤œà¤¯à¤¿à¤¨à¥€ नरेश यà¥à¤§à¤¾à¤œà¤¿à¤¤ की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ लीलावती । मनोरमा के पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤ सà¥à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¨ और लीलावती के शतà¥à¤°à¥à¤œà¤¿à¤¤ ।माठर वंश के बाद कलिंग में नल वंश का शासन आरमà¥à¤ हो गया था। माठर वंश के बाद500 ई० में नल वंश का शासन आरमà¥à¤ हो गया। वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ उड़ीसा राजà¥à¤¯ को पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ काल से मधà¥à¤¯à¤•ाल तक ओडिशा राजà¥à¤¯ , कलिंग, उतà¥à¤•ल, उतà¥à¤•रात, ओडà¥à¤°, ओदà¥à¤°, ओडà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶, ओड, ओडà¥à¤°à¤°à¤¾à¤·à¥à¤Ÿà¥à¤°, तà¥à¤°à¤¿à¤•लिंग, दकà¥à¤·à¤¿à¤£ कोशल, कंगोद, तोषाली, छेदि तथा मतà¥à¤¸ आदि à¤à¥€ नामों से जाना जाता था। नल वंश के दौरान à¤à¤—वान विषà¥à¤£à¥ को अधिक पूजा जाता था इसलिठनल वंश के राजा व विषà¥à¤£à¥à¤ªà¥‚जक सà¥à¤•नà¥à¤¦à¤µà¤°à¥à¤®à¤¨ ने ओडिशा में पोडागोड़ा सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर विषà¥à¤£à¥à¤µà¤¿à¤¹à¤¾à¤° का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ करवाया। नल वंश के बाद विगà¥à¤°à¤¹ वंश, मà¥à¤¦à¤—ल वंश, शैलोदà¥à¤à¤µ वंश और à¤à¥Œà¤®à¤•र वंश ने कलिंग पर राजà¥à¤¯ किया।
05 – राजा नल – (राजा वीरसेन का पà¥à¤¤à¥à¤° राजा नल) निषध देश के राजा वीरसेन के पà¥à¤¤à¥à¤°, राजा नल का विवाह विदरà¥à¤ देश के राजा à¤à¥€à¤®à¤¸à¥‡à¤¨ की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ दमयंती के साथ हà¥à¤† था। नल-दमयंती – विदरà¥à¤ देश के राजा à¤à¥€à¤® की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ दमयंती और निषध के राजा वीरसेन के पà¥à¤¤à¥à¤° नल राजा नल सà¥à¤µà¤¯à¤‚ इकà¥à¤·à¥à¤µà¤¾à¤•ॠवंशीय थे। महाकांतार (पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ बसà¥à¤¤à¤°) जिसे मौरà¥à¤¯ काल में सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤° आटविक जनपद कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° कहा गया इसे समकालीन कतिपय गà¥à¤°à¤‚थों में महावन à¤à¥€ उलà¥à¤²à¥‡à¤–ित किया गया है। महाकांतार (पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ बसà¥à¤¤à¤°) कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° में अनेक नाम नल से जà¥à¤¡à¥‡ हà¥à¤ हैं जैसे – नलमपलà¥à¤²à¥€, नलगोंडा, नलवाड़, नलपावणà¥à¤¡, नड़पलà¥à¤²à¥€, नीलवाया, नेलाकांकेर, नेलचेर, नेलसागर आदि।महाकांतार (पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ बसà¥à¤¤à¤°) कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° पर नलवंश के राजा वà¥à¤¯à¤¾à¤˜à¥à¤°à¤°à¤¾à¤œ (350-400 ई.) की सतà¥à¤¤à¤¾ का उलà¥à¤²à¥‡à¤– समà¥à¤¦à¥à¤°à¤—à¥à¤ªà¥à¤¤ की पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤— पà¥à¤°à¤¶à¤¾à¤¸à¥à¤¤à¤¿ से मिलता है। वà¥à¤¯à¤¾à¤˜à¥à¤°à¤°à¤¾à¤œ के बाद, वà¥à¤¯à¤¾à¤˜à¥à¤°à¤°à¤¾à¤œ के पà¥à¤¤à¥à¤° वाराहराज (400-440 ई.) महाकांतार कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° के राजा हà¥à¤à¥¤ वाराहराज का शासनकाल वाकाटकों से जूà¤à¤¤à¤¾ हà¥à¤† ही गà¥à¤œà¤°à¤¾à¥¤ राजा नरेनà¥à¤¦à¥à¤° सेन ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपनी तलवार को मà¥à¤¯à¤¾à¤¨ में रखने के कम ही मौके दिये। वाकाटकों ने इसी दौरान नलों पर à¤à¤• बड़ी विजय हासिल करते हà¥à¤ महाकांतार का कà¥à¤› कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° अपने अधिकार में ले लिया था। वाराहराज के बाद, वाराहराज के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤µà¤¦à¤¤à¥à¤¤ वरà¥à¤®à¤¨ (400-440 ई.) महाकांतार कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° के राजा हà¥à¤à¥¤ à¤à¤µà¤¦à¤¤à¥à¤¤ वरà¥à¤®à¤¨ के देहावसान के बाद के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ उसका पà¥à¤¤à¥à¤° अरà¥à¤¥à¤ªà¤¤à¤¿ à¤à¤Ÿà¥à¤Ÿà¤¾à¤°à¤• (460-475 ई.) राजसिंहासन पर बैठे। अरà¥à¤¥à¤ªà¤¤à¤¿ की मृतà¥à¤¯à¥ के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ नलों को कडे संघरà¥à¤· से गà¥à¤œà¤°à¤¨à¤¾ पडा जिसकी कमान संà¤à¤¾à¤²à¥€ उनके à¤à¤¾à¤ˆ सà¥à¤•ंदवरà¥à¤®à¤¨ (475-500 ई.) नें जिसे विरासत में सियासत पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤ˆ थी। इस समय तक नलों की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ कà¥à¤·à¥€à¤£ होने लगी थी जिसका लाठउठाते हà¥à¤ वाकाटक नरेश नरेनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨ नें पà¥à¤¨: महाकांतार कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° के बडे हिसà¥à¤¸à¥‹à¤‚ पर पाà¤à¤µ जमा लिये। नरेनà¥à¤¦à¥à¤° सेन के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ उसके पà¥à¤¤à¥à¤° पृथà¥à¤µà¥€à¤·à¥‡à¤£ दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ (460-480 ई.) नें à¤à¥€ नलों के साथ संघरà¥à¤· जारी रखा। अरà¥à¤¥à¤ªà¤¤à¤¿ à¤à¤Ÿà¤Ÿà¤¾à¤°à¤• को ननà¥à¤¦à¤¿à¤µà¤°à¥à¤§à¤¨ छोडना पडा तथा वह नलों की पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€ राजधानी पà¥à¤·à¥à¤•री लौट आया। सà¥à¤•ंदवरà¥à¤®à¤¨ ने शकà¥à¤¤à¤¿ संचय किया तथा ततà¥à¤•ालीन वाकाटक शासक पृथà¥à¤µà¥€à¤·à¥‡à¤£ दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ को परासà¥à¤¤ कर नल शासन में पà¥à¤¨: पà¥à¤°à¤¾à¤£ पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤ ा की। सà¥à¤•ंदवरà¥à¤®à¤¨ ने नषà¥à¤Ÿ पà¥à¤·à¥à¤•री नगर को पà¥à¤¨: बसाया अलà¥à¤ªà¤•ाल में ही जो शकà¥à¤¤à¤¿ व सामरà¥à¤¥ सà¥à¤•नà¥à¤¦à¤µà¤°à¥à¤®à¤¨ नें à¤à¤•तà¥à¤°à¤¿à¤¤ कर लिया था उसने वाकाटकों के असà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ को ही लगà¤à¤— मिटा कर रख दिया । के बाद नल शासन वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ के आधीन कई माणà¥à¤¡à¤²à¤¿à¤• राजा थे। उनके पà¥à¤¤à¥à¤° पृथà¥à¤µà¥€à¤µà¥à¤¯à¤¾à¤˜à¥à¤° (740-765 ई.) नें राजà¥à¤¯ विसà¥à¤¤à¤¾à¤° करते हà¥à¤ नेलà¥à¤²à¥‹à¤° कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤° के तटीय कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ पर अधिकार कर लिया था। यह उलà¥à¤²à¥‡à¤– मिलता है कि उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚नें अपने समय में अशà¥à¤µà¤®à¥‡à¤§ यजà¥à¤ž à¤à¥€ किया। पृथà¥à¤µà¥€à¤µà¥à¤¯à¤¾à¤˜à¥à¤° के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ के शासक कौन थे इस पर अà¤à¥€ इतिहास का मौन नहीं टूट सका है। नल-दमà¥à¤¯à¤‚ति के पà¥à¤¤à¥à¤°-पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ इनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨à¤¾ व इनà¥à¤¦à¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨ थे।
बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾à¤œà¥€ की 71वीठपिढी मेठजनà¥à¤®à¥‡à¤‚ राजा नल से इतिहास में पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी राजपूतों की à¤à¤• अलग शाखा चली जो कछवाह के नाम से विखà¥à¤¯à¤¾à¤¤ है । 06– ढोला – राजा नल-दमयंती का पà¥à¤¤à¥à¤° ढोला जिसे इतिहास में सालà¥à¤¹à¥à¤•à¥à¤®à¤¾à¤° के नाम से à¤à¥€ जाना जाता है का विवाह राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के जांगलू राजà¥à¤¯ के पूंगल नामक ठिकाने की राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ मारवणी से हà¥à¤† था। जो राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के साहितà¥à¤¯ में ढोला-मारू के नाम से पà¥à¤°à¤–à¥à¤¯à¤¾à¤¤ पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤—ाथाओं के नायक है ।
07 – लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ – ढोला के लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤†à¥¤-
08 – à¤à¤¾à¤¨à¥ – लकà¥à¤·à¥à¤®à¤£ के à¤à¤¾à¤¨à¥ नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤†à¥¤
09 – बजà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤®à¤¾ – à¤à¤¾à¤¨à¥ के बजà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤®à¤¾ नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤†, à¤à¤¾à¤¨à¥ के पà¥à¤¤à¥à¤° परम पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥€ महाराजा धिराज बजà¥à¤°à¥à¤¦à¤¾à¤®à¤¾ हà¥à¤µà¤¾ जिस ने खोई हà¥à¤ˆ कछवाह राजà¥à¤¯à¤²à¤•à¥à¤·à¥à¤®à¥€ का पà¥à¤¨à¤ƒ उदà¥à¤§à¤¾à¤°à¤•र गà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¿à¤¯à¤° दà¥à¤°à¥à¤— पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤°à¥‹à¤‚ से पà¥à¤¨à¤ƒ जित लिया।
10 – मंगल राज – बजà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤®à¤¾ के मंगल राज नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤†à¥¤ बजà¥à¤°à¥à¤¦à¤¾à¤®à¤¾ के पà¥à¤¤à¥à¤° मंगल राज हà¥à¤µà¤¾ जिसने पंजाब के मैदान में महमूद गजनवी के विरà¥à¤¦à¥à¤§ उतरी à¤à¤¾à¤°à¤¤ के राजाओं के संघ के साथ यà¥à¤¦à¥à¤§ कर अपनी वीरता पà¥à¤°à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¿à¤¤ की थी। मंगल राज के मंगल राज के 2 पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤:-
01 – किरà¥à¤¤à¤¿à¤°à¤¾à¤œ (बड़ा पà¥à¤¤à¥à¤°) – किरà¥à¤¤à¤¿à¤°à¤¾à¤œ को गà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¿à¤¯à¤° का राजà¥à¤¯ मिला था।
02 – सà¥à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤° (छोटा पà¥à¤¤à¥à¤°) – सà¥à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤° को नरवर का राजà¥à¤¯ मिला था। नरवार किला, शिवपà¥à¤°à¥€ के बाहरी इलाके में शहर से 42 किमी. की दूरी पर सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है जो काली नदी के पूरà¥à¤µ में सà¥à¤¥à¤¿à¤¤ है। नरवर शहर का à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• महतà¥à¤µ à¤à¥€ है और इसे 12 वीं सदी तक नालापà¥à¤°à¤¾ के नाम से जाना जाता था। इस महल का नाम राजा नल के नाम पर रखा गया है जिनके और दमयंती की पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤—ाथाà¤à¤‚ महाकावà¥à¤¯ महाà¤à¤¾à¤°à¤¤ में पढ़ने को मिलती हैं। इस नरवर राजà¥à¤¯ को ‘निषाद राजà¥à¤¯ à¤à¥€ कहते थे, जहां राजा वीरसेन का शासन था। उनके ही पà¥à¤¤à¥à¤° का नाम राजा नल था। राजा नल का विवाह दमयंती से हà¥à¤† था। बाद में चौपड़ के खेल में राजा नल ने अपनी सतà¥à¤¤à¤¾ को ही दांव पर लगा दिया था और सब कà¥à¤› हार गà¤à¥¤ इसके बाद उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपना राजà¥à¤¯ छोड़कर निषाद देश से जाना पड़ा था। 12वीं शताबà¥à¤¦à¥€ के बाद नरवर पर कà¥à¤°à¤®à¤¶: कछवाहा, परिहार और तोमर राजपूतों का अधिकार रहा, जिसके बाद 16वीं शताबà¥à¤¦à¥€ में मà¥à¤—़लों ने इस पर क़बà¥à¤œà¤¼à¤¾ कर लिया। मानसिंह तोमर (1486-1516 ई.) और मृगनयनी की पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ पà¥à¤°à¥‡à¤® कथा से नरवर का समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§ बताया जाता है।
11 – सà¥à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤° – मंगल राज का छोटा पà¥à¤¤à¥à¤° सà¥à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤° था।
12 – ईशदेव जी – सà¥à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤° के ईशदेव नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤†à¥¤ इशà¥à¤µà¤°à¤¦à¤¾à¤¸ (ईशदेव जी) 966 – 1006 गà¥à¤µà¤¾à¤²à¤¿à¤¯à¤° (मधà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶) के शासक थे।
13 – सोढदेव – इशà¥à¤µà¤°à¤¦à¤¾à¤¸ (ईशदेव जी) के सोढ देव (सोरा सिंह) नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤†
14 – दà¥à¤²à¤¹à¤°à¤¾à¤¯ जी (ढोलाराय) – सोढदेव जी के दà¥à¤²à¤¹à¤°à¤¾à¤¯ जी (ढोलाराय) नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤† । दà¥à¤²à¤¹à¤°à¤¾à¤¯ जी (ढोलाराय) (1006-36) आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे। दà¥à¤²à¤¹à¤°à¤¾à¤¯ जी (ढोलाराय) के 3 पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤¯à¥‡:-
01 – कॉकिलदेव (काà¤à¤–ल जी, कांकल देव) – (1036-38) आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे।
02 – डेलण जी
03 – वीकलदेव जी 15 – कॉकिलदेव (काà¤à¤–ल जी, कांकल देव) – कॉकिलदेव (काà¤à¤–ल जी, कांकल देव) – (1036-38) आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे। कॉकिलदेव (काà¤à¤–ल जी, कांकल देव) के पांच पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤:-
01 – अलघराय जी 02 – गेलन जी
03 – रालण जी
04 – डेलण जी
05 – हà¥à¤¨ देव
16 – हà¥à¤¨ देव – कांकल देव (काà¤à¤–ल देव) के हà¥à¤¨ देव नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤†à¥¤ हà¥à¤¨ देव (1038-53) आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे ।
17 – जानà¥à¤¦à¤¦à¥‡à¤µ – हà¥à¤¨ देव के जानà¥à¤¦à¤¦à¥‡à¤µ नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤†à¥¤ जानà¥à¤¦à¤¦à¥‡à¤µ (1053 – 1070) आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे ।
18 – पंञà¥à¤œà¤¾à¤µà¤¨ – जानà¥à¤¦à¤¦à¥‡à¤µ के पंञà¥à¤œà¤¾à¤µà¤¨ (पà¥à¤œà¤¨à¤¾ देव, पाजून, पजà¥à¤œà¥‚णा) नामक पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤†à¥¤à¤ªà¤‚ञà¥à¤œà¤¾à¤µà¤¨ (पà¥à¤œà¤¨à¤¾ देव,पाजून, पजà¥à¤œà¥‚णा) (1070 – 1084) आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे।
19 – मलैसी देव – राजा मलैसिंह देव पंञà¥à¤œà¤¾à¤µà¤¨ (पà¥à¤‚जदेव, पà¥à¤œà¤¨à¤¾ देव, पाजून, पजà¥à¤œà¥‚णा) का पà¥à¤¤à¥à¤° था, तथा मलैसिंह दौसा का सातवाठराजा था मलैसी देव दौसा के बाद राजा मलैसिंह देव 1084 से 1146 तक आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे। à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ ईतीहास में मलैसी को मलैसी, मलैसीजी, मलैसिंहजी आदी नामों से à¤à¥€ जाना à¤à¤‚व पहचाना जाता है, मगर इन का असली नाम मलैसी देव था। जैसा कि सà¤à¥€ को मालà¥à¤® है सà¥à¤‚नà¥à¤¦à¤°à¤¤à¤¾ के वंश में होकर (मलैसीजी मलैसिंहजी) ने बहà¥à¤¤à¤¸à¥€ शादीयाठकरी थी। जिन में राजपूत खानदान से बाहर अनà¥à¤¯ खानदान à¤à¤‚व अनà¥à¤¯ जातीयों में करी थी इन सब की जानकारी बही à¤à¤¾à¤Ÿà¥‹à¤‚ की बही à¤à¤‚व समाज के बà¥à¤œà¥à¤°à¥à¤—ो की जà¥à¤¬à¤¾à¤¨ तो खà¥à¤²à¤•र बताती है मगर इतिहास के पनà¥à¤¨à¥‡ इस विषय पर मौन हैं। मलैसी देव के बहà¥à¤¤ से पà¥à¤¤à¥à¤° थे मगर हमें इनमें से सात का तो हर जगह बà¥à¤¯à¥‹à¤°à¤¾ मिल जाता है बाकी पर इतीहास अपनी चà¥à¤ªà¥€ नहीं तोड़ता है । मगर हम जागा और जातीगत ईतीहास लिखने वाले बही-à¤à¥€à¤Ÿà¥‹à¤‚ की बही के पà¥à¤°à¤®à¤¾à¤£ à¤à¤‚व समाज के बà¥à¤œà¥à¤°à¥à¤—ो की जà¥à¤¬à¤¾à¤¨ पर जायें तो पता चलता है राजा मलैसी देव कि सनà¥à¤¤à¤¾à¤¨à¥‹à¤ मेठशà¥à¤¦à¥ रजपà¥à¤¤à¥€ खà¥à¤¨ दो पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤ मेठथा राव बयालजी (बालोजी) व जैतलजी में। राव बयालजी (बालोजी) व जैतलजी के अलावा बकी पाà¤à¤š ने कसी कारण वंश दूसरी जाती की लड़की से शादी की जीससे à¤à¤• अलग- अलग जातीयाठनिकली। मलैसी देव ने राजपूत खानदान से बाहर अनà¥à¤¯ खानदान à¤à¤‚व अनà¥à¤¯ जातीयों में शादीयाठकरी थी इन सब अनà¥à¤¯ जातीयों से पà¥à¤¤à¥à¤° -:
01 – तोलाजी – टाक दरà¥à¤œà¥€ छींपा
02 – बाघाजी – रावत बनिया
03 – à¤à¤¾à¤£ जी – डाई गà¥à¤œà¤°
04 – नरसी जी – निठारवाल जाट
05 – रतना जी – सोली सà¥à¤¨à¤¾à¤°,आमेरा नाई
उपरोंकà¥à¤¤ ये सà¤à¥€ पाà¤à¤šà¥‹ पà¥à¤¤à¥à¤° अपने वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¤¾à¤¯ में लग गये जिनकी आज राजपूतों से à¤à¤• अलग जाती बनगयी है
06 – जैतल जी (जीतल जी) – जैतल जी (जीतल जी) (1146 – 1179) आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे ।
07 – राव बयालदेव
20 – राव बयालदेव – राजा मलैसिंह देव के पà¥à¤¤à¥à¤° राव बयालदेव ।
21 – राज देवजी – राव बयालदेव के पà¥à¤¤à¥à¤° राज देवजी। राज देवजी (1179 – 1216) आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे। राजा राव बयालजी (बालोजी) का पà¥à¤¤à¥à¤° राजा देव जी दौसा का नौà¤à¤µà¤¾ राजा बना जिसका कारà¥à¤¯à¤•ाल 1179-1216 तक। राजा देव जी के गà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤¹ पà¥à¤¤à¥à¤° थे -:
01 – बीजलदेव जी
02 – किलहनदेव जी
03 – साà¤à¤µà¤¤à¤¸à¤¿à¤à¤¹ जी
05 – सिहा जी
06 – बिकसी [ बिकासिà¤à¤¹ जी, बिकसिà¤à¤¹ जी विकà¥à¤°à¤®à¤¸à¥€ ]
07 – पाला जी (पिला जी)
08 – à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी
09 – राजघरजी [राढरजी]
10 – दशरथ जी
11 – राजा कà¥à¤¨à¥à¤¤à¤²à¤¦à¥‡à¤µ जी
22 – कà¥à¤¨à¥à¤¤à¤²à¤¦à¥‡à¤µ जी – कà¥à¤¨à¥à¤¤à¤²à¤¦à¥‡à¤µ जी 1276 से 1317 तक आमेर (जयपà¥à¤°) के शासक थे। राजा कà¥à¤¨à¥à¤¤à¤²à¤¦à¥‡à¤µ जी के गà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤¹ पà¥à¤¤à¥à¤° थे -: 01 – बधावा जी
02 – हमीर जी (हमà¥à¤®à¥€à¤° देव जी)
03 – नापा जी
04 – मेहपा जी
05 – सरवन जी
06 – टà¥à¤¯à¥‚नगया जी
07 – सूजा जी
08 – à¤à¤¡à¤¾à¤¸à¥€ जी
09 – जीतमल जी
10 – खींवराज जी
11 – जोणसी
23 – जोणसी – राजा जोणसी कà¥à¤¨à¥à¤¤à¤²à¤¦à¥‡à¤µ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे, इन को को जà¥à¤£à¤¸à¥€ जी, जà¥à¤£à¤¸à¥€, जानसी, जà¥à¤£à¤¸à¥€ देव जी, जसीदेव आदि कई नामों से पà¥à¤•ारा जाता था, आमेर के 13 वें शासक राजा जà¥à¤£à¤¸à¥€ देव के चार पà¥à¤¤à¥à¤° थे -: 01 – जसकरण जी
02 – उदयकरण जी
03 – कà¥à¤®à¥à¤à¤¾ जी
04 – सिंघा जी
24 – उदयकरण जी – उदयकरण जी [उदयकरà¥à¤£] – उदयकरण जी राजा जà¥à¤£à¤¸à¥€ जी के दूसरे पà¥à¤¤à¥à¤° थे। राजा उदयकरणजी आमेर के तीसरे राजा थे जिनका शासनकाल 1366 से 1388 में रहा है। राजा उदयकरणजी की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1388 में हà¥à¤¯à¥€ थी । उदयकरजी की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1388 में हà¥à¤¯à¥€ थी। उदयकरजी के आठपà¥à¤¤à¥à¤° थे :-
01 – राव नारोसिंह [राजा नरसिंह, नाहरसिंह देवजी]
02 – राव बरसिंह
03 – राव बालाजी
04 – राव शिवबà¥à¤°à¤¹à¥à¤®
05 – राव पातालजी
06 – राव पीपाजी
07 – राव पीथलजी
08 – राव नापाजी (राजाउदयकरणजी के आठवें पà¥à¤¤à¥à¤°) 25 – बाला जी – बाला जी आमेर के राजा उदयकरण जी के तिसरे पà¥à¤¤à¥à¤° थे।
26 – राव मोकल जी – राव मोकल जी बाला जी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे।
27 – महाराव शेखा जी – महाराव शेखा जी राव मोकल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° व बाला जी के पौतà¥à¤° थे।
शेखा जी के वंशज शेखावत कहलाते हैà¤à¥¤ शेखा जी को महाराव की उपाधि थी इसलिठमहाराव शेखा जी के नाम से जानें जाते थे, महाराव शेखा जी राव मोकल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° व बाला जी के पौतà¥à¤° थे। महाराव शेखा जी के दादाजी आमेर के राजा उदयकरण जी के तिसरे पà¥à¤¤à¥à¤° थे।
शेखावत वंश की शाखाà¤à¤ -:
शेखावत सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी कछवाह कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ वंश की à¤à¤• शाखा है
शेखावत वंश परिचय-:
समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ कछवाह बिरादरी में सबसे पà¥à¤°à¤®à¥à¤– खांप शेखावत है।
शेखावत सूरà¥à¤¯à¤µà¤‚शी कछवाह कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ वंश की à¤à¤• शाखा है देशी राजà¥à¤¯à¥‹à¤‚ के à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संघ में विलय से पूरà¥à¤µ मनोहरपà¥à¤°, शाहपà¥à¤°à¤¾, खंडेला, सीकर, खेतडी, बिसाऊ, सà¥à¤°à¤œà¤—ढ़, नवलगढ़, मंडावा, मà¥à¤•नà¥à¤¦à¤—ढ़, दांता, खà¥à¤¡, खाचरियाबास, दूंदà¥à¤²à¥‹à¤¦, अलसीसर, मलसिसर, रानोली आदि पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ शाली ठिकाने शेखावतों के अधिकार में थे जो शेखावाटी नाम से पà¥à¤°à¤¶à¤¿à¤¦à¥à¤§ है । शेखावाटी के ठिकाने और जागीर :- Alsisar अलसीसर | Khatu खाटू |
Arooka अरूका | Khayali खà¥à¤¯à¤¾à¤²à¥€ |
Bissau बिसà¥à¤¸à¤¾à¤Š | Khetri खेतड़ी |
Chowkari चोवà¥à¤•री | Khood खूड |
Danta दांता | Mahansar महनसर |
Dujod दà¥à¤œà¥‹à¤¦ | Malsisar मलसीसर |
Dundlod डूंडलोद | Mandawa मंडावा |
Gangiasar गानà¥à¤—à¥à¤¯à¤¾à¤¸à¤° | Mandrella मंडरेला |
Heerwa & Sigra हीरवा सिगरा | Mukangarh मà¥à¤•ंगढ़ |
Jahota जाहोता | Nawalgarh नवलगढ़ |
Kasli कासली | Shahpura शाहपà¥à¤°à¤¾ |
Khachariawas खाचरियावास | Sikar सीकर |
Khandela खंडेला |
|
वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ में शेखावाटी की à¤à¥Œà¤—ोलिक सीमाà¤à¤‚ सीकर और à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ दो जिलों तक ही सीमित है । संयोगिता हरण के समय पà¥à¤°à¤¥à¥à¤µà¤¿à¤°à¤¾à¤œ का पीछा करती कनà¥à¤¨à¥‹à¤œ की विशाल सेना को रोकते हà¥à¤ पजà¥à¤µà¤¨ राय जी ने वीर गति पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ की थी आमेर नरेश पजà¥à¤µà¤¨ राय जी के बाद लगà¤à¤— दो सो वरà¥à¤·à¥‹à¤‚ बाद उनके वंशजों में वि.सं. 1423 में राजा उदयकरण आमेर के राजा बने, राजा उदयकरण के पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ से कछवाहों की उदयकरण जी के तीसरे पà¥à¤¤à¥à¤° बालाजी जिनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ बरवाडा की 12 गावों की जागीर मिली शेखावतों के आदि पà¥à¤°à¥à¤· थे ।
बालाजी के पà¥à¤¤à¥à¤° मोकलजी हà¥à¤ और मोकलजी के पà¥à¤¤à¥à¤° महान योधा शेखावाटी व शेखावत वंश के पà¥à¤°à¤µà¤°à¥à¤¤à¤• महाराव शेखा का जनम वि.सं. 1490 में हà¥à¤µà¤¾ । वि. सं. 1502 में मोकलजी के निधन के बाद राव शेखाजी बरवाडा व नान के 24 गावों के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ बने। महाराव शेखा खà¥à¤¦ 1471 में सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤° घोषित कर दिया और उसके वंश के लिठà¤à¤• अलग रियासत की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ की।
राव शेखाजी ने अपने साहस वीरता व सेनिक संगठन से अपने आस पास के गावों पर धावे मारकर अपने छोटे से राजà¥à¤¯ को 360 गावों के राजà¥à¤¯ में बदल दिया । राव शेखाजी ने नान के पास अमरसर बसा कर उसे अपनी राजधानी बनाया और शिखर गढ़ का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ किया राव शेखाजी के वंशज उनके नाम पर शेखावत कहलाये शेखावत वंश की शाखाà¤à¤, शेखा जी पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ व वंशजो के कई शाखाओं का पà¥à¤°à¤¦à¥à¤°à¥à¤à¤¾à¤µ हà¥à¤† जो निमà¥à¤¨ है :-
महाराव शेखाजी के बेटों से शेखावतों की शाखाà¤à¤-
महाराव शेखा जी के बारह बेटे थे। जिन में से तीन बेटे à¤à¤°à¤¤à¤œà¥€, तिलोकजी [तà¥à¤°à¤¿à¤²à¥‹à¤•जी],पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¤œà¥€ निसंतान थे। बाकि नौ बेटों से पांच शाखाà¤à¤ चली जो इस पà¥à¤°à¤•ार है –:
01 – टकनेत शेखावत – दà¥à¤°à¥à¤—ाजी के वंशज टकनेत शेखावत कहलाते हैं।
दà¥à¤°à¥à¤—ाजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
02 – रतनावत शेखावत –
रतनाजी के वंशज रतनावत शेखावत कहलाते हैं।
रतनाजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी [धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ रहे … यह कछवाहोठकी उप शाखा रतनावत नरà¥à¤•ा, रतनावत शेखावत खांप से बिलकà¥à¤² अलग है।] रतनावत कछवाह व रतनावत शेखावत में à¤à¥‡à¤¦ या अनà¥à¤¤à¤°?
कà¥à¤› लोग रतनावत कछवाह व रतनावत शेखावत को à¤à¤• ही समठलेतें हैं कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ की दोनों में पीढ़ी व वसाजों का नाम संयोग से à¤à¤• जैसा ही है जिसमे à¤à¥‡à¤¦ इस पà¥à¤°à¤•ार है –
उदयकरण जी [उदयकरà¥à¤£] – उदयकरण जी राजा जà¥à¤£à¤¸à¥€ जी के दूसरे पà¥à¤¤à¥à¤° थे। राजा उदयकरणजी आमेर के तीसरे राजा थे जिनका शासनकाल 1366 से 1388 में रहा है। राजा उदयकरणजी की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1388 में हà¥à¤¯à¥€ थी । उदयकरजी की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1388 में हà¥à¤¯à¥€ थी। उदयकरजी के आठपà¥à¤¤à¥à¤° थे :-
01 – राव नारोसिंह [राजा नरसिंह, नाहरसिंह देवजी]
02 – राव बरसिंह –
*मेराज जी (मेहराज)
*नरà¥à¤œà¥€ – दासासिंह (दासा) –
*रतनसिंह (रतनजी)
[रतनसिंह (रतन जी) के वंसज रतनावत कछवाह कहतें हैं, जो नरà¥à¤•ा कछवाह की ही उप शाखा है। ]
03 – राव बालाजी –
*राव मोकलजी
*शेखाजी
*रतनाजी [रतनाजी के वंसज रतनावत शेखावत]
04 – राव शिवबà¥à¤°à¤¹à¥à¤®
05 – राव पातालजी
06 – राव पीपाजी
07 – राव पीथलजी
08 – राव नापाजी (राजाउदयकरणजी के आठवें पà¥à¤¤à¥à¤°)
रतनावत शेखावत [रतनाजी के वंशज रतनावत शेखावत कहलाते हैं।
रतनाजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी ]
रतनावत कछवाह [ रतनसिंह (रतन जी) के वंशज रतनावत कछवाह कहलाते हैं।]
रतनसिंह (रतन जी) – दासासिंह (दासा) – नरॠजी – मेराज जी (मेहराज) – बरसिà¤à¤¹ जी (बरसिà¤à¤— देवजी) – उदयकरण जी ]
03 – मिलकपà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ शेखावत – आà¤à¤¾à¤œà¥€, अचलाजी,पूरणजी, इन तीन बेटों के वंशज मिलकपà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ शेखावत कहलाते हैं। मिलकपà¥à¤° गांव गाà¤à¤µ में रहने से इनका यह नाम पड़ा है।
आà¤à¤¾à¤œà¥€ – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
अचलाजी- शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
पूरणजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
04 – खेजडोलà¥à¤¯à¤¾ [खेजà¥à¤¡à¥‹à¤²à¤¿à¤¯à¤¾] शेखावत –
रिड़ मलजी [रिदमल जी] कà¥à¤®à¥à¤à¤¾ जी व à¤à¤¾à¤°à¤®à¤²à¤œà¥€ इन तीन बेटों के वंशज खेजडोलà¥à¤¯à¤¾ [खेजà¥à¤¡à¥‹à¤²à¤¿à¤¯à¤¾] शेखावत कहलाते हैं। खेजड़ोली गाà¤à¤µ में रहने से इनका यह नाम पड़ा है।
रिड़मलजी [रिदमल जी] – शेखाजी- राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
कà¥à¤®à¥à¤à¤¾ जी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
à¤à¤¾à¤°à¤®à¤²à¤œà¥€ – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
05 – रायमलोत शेखावत [रायमल जी के शेखावत] –
राव रायमल जी – राव रायमल जी के वंशज रायमलोत शेखावत [रायमल जी के शेखावत] कहलाते हैं। रायमलोत शेखावत [रायमल जी शेखावत] महाराव शेखाजी के सब से छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° राव रायमल जी थे।
राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
महाराव शेखाजी के बेटों के बेटों [पोतों] के वंसजों से शेखावतों की शाखाà¤à¤ –:
06 – संतालपोता शेखावत –
संतालजी – कà¥à¤®à¥à¤à¤¾à¤œà¥€ – शेखाजी
कà¥à¤®à¥à¤à¤¾ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° संताल जी के बेटों के वंशज सतालपोता शेखावत कहलाते हैं।
कà¥à¤®à¥à¤à¤¾ जी महाराव शेखाजी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे। संताल जी महाराव शेखाजी के पोते थे।
[कà¥à¤®à¥à¤à¤¾ जी व उनके पà¥à¤¤à¥à¤° संतालजी और संतालजी के बेटे तो खेजडोलà¥à¤¯à¤¾ [खेजà¥à¤¡à¥‹à¤²à¤¿à¤¯à¤¾] शेखावत थे मगर संतालजी के बेटो के बेटे [पोतों]से à¤à¤• अलग शाखा चली जिसे संतालपोता शेखावत कहलाते हैं।]
07 – बाघावत शेखावत –
बाघाजी – à¤à¤¾à¤°à¤®à¤²à¤œà¥€ – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
à¤à¤¾à¤°à¤®à¤²à¤œà¥€ के बड़े पà¥à¤¤à¥à¤° बाघाजी के वंशज बाघावत शेखावत कहलाते हैं।
à¤à¤¾à¤°à¤®à¤²à¤œà¥€ महाराव शेखाजी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे। बाघाजी महाराव शेखाजी के पोते थे।
[à¤à¤¾à¤°à¤®à¤²à¤œà¥€ के वंशज तो खेजडोलà¥à¤¯à¤¾ [खेजà¥à¤¡à¥‹à¤²à¤¿à¤¯à¤¾] शेखावत कहलाते हैं।
थे मगर à¤à¤¾à¤°à¤®à¤²à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° बाघाजी से à¤à¤• अलग शाखा चली जिसे बाघावत शेखावत कहलाते हैं।]
08 – सà¥à¤œà¤¾à¤µà¤¤ शेखावत –
सूजा जी [सूरजमल जी] – राव रायमल जी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
महाराव शेखाजी के सब से छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° राव रायमल जी थे।राव रायमल जी का पà¥à¤¤à¥à¤° था सूजा जी [सूरजमल जी] सूजा जी के वंशज सà¥à¤œà¤¾à¤µà¤¤ शेखावत कहलाते हैं।
महाराव शेखाजी के पड़ पोतों के वंसजों से शेखावतों की शाखाà¤à¤ –
महाराव शेखाजी के सब से छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° राव रायमल जी थे। राव रायमल जी का पà¥à¤¤à¥à¤° था सूजा जी के छह पà¥à¤¤à¥à¤° थे। इन छह पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ से छह शाखाओं का निकास हà¥à¤µà¤¾ जो इस पà¥à¤°à¤•ार है-
लूणकरणजी, रायसलजी, गोपाल, à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€, चांदाजी, रामजी,
09 लà¥à¤£à¤•रण जी का शेखावत –
लà¥à¤£à¤•रणजी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ – राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
लà¥à¤£à¤•रणजी के वंसज लà¥à¤£à¤•रण जी का शेखावत या लà¥à¤¨à¤¾à¤µà¤¤ शेखावत कहलाते हैं। लà¥à¤£à¤•रण जी अमरासर के राव सà¥à¤œà¤¾ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे। लà¥à¤£à¤•रणजी राव रायमलजी के पोते तथा महाराव शेखाजी के पड़ पोते थे।
10 – रायसलोत शेखावत [रायसल जी का शेखावत]
रायसलजी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ – राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसलजी दरबारी के वंशज रायसलोत शेखावत कहलाते हैं। रायसलजी अमरासर के राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° थे।
रायसलजी महाराव शेखाजी के सब से छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° राव रायमल जी के पोते थे। तथा महाराव शेखाजी के पड़ पोते थे।
11 – गोपाल जी का शेखावत –
गोपालजी – – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ – राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
सूजा जी [सूरजमल जी] के पà¥à¤¤à¥à¤° गोपालजी के वंशज गोपाल जी का शेखावत शेखावत कहलाये हैं।
à¤à¥à¤žà¥à¤à¥à¤£à¥ जिले में गोपाल जी का शेखावत गाà¤à¤µ सेंसवास, जांटवली, फूसखानी गाà¤à¤µ सेंसवास,
गोपालजी अमरासर के राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° व राव रायमलजी के पोते थे, तथा महाराव शेखाजी के पड़ पोते थे।
12 – à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ का शेखावत –
à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ के वंशज à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ का शेखावत कहलाते हैं। à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ अमरासर के राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° व राव रायमलजी के पोते थे, तथा महाराव शेखाजी के पड़ पोते थे।
13 – चांदाजी का शेखावत – [चांदावत शेखावत] –
चांदाजी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
चांदाजी के वंशज चांदाजी का शेखावत – [चांदावत शेखावत] कहलाते हैं। चांदाजी अमरासर के राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° व राव रायमलजी के पोते थे, तथा महाराव शेखाजी के पड़ पोते थे।
14 – रामजी का शेखावत –
रामजी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
रामजी के वंशज रामजी का शेखावत कहलाते हैं। रामजी अमरासर के राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° व राव रायमलजी के पोते थे, तथा महाराव शेखाजी के पड़ पोते थे।
रायसलजी अमरसर के शासक राव सूजा जी [सूरजमल जी] के दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ पà¥à¤¤à¥à¤° थे। उनका जनà¥à¤® राठौड़ रानी रतन कà¤à¤µà¤° के गरà¥à¤ से हà¥à¤† था। राजारायसल (दरबारी) खणà¥à¤¡à¥‡à¤²à¤¾ के पà¥à¤°à¤¥à¤® शेखावत राजा थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने ई.सं॰1584से1614 तक शासन किया। राजा रायसलजी की पांच शादियां हà¥à¤¯à¥€ थी –
राजा रायसलजी की पांच शादियां हà¥à¤¯à¥€ थी, जिनसे सात पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का जनà¥à¤® हà¥à¤µà¤¾, इन सात पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ से जो अलग सात शाखाà¤à¤‚ चली वो इस पà¥à¤°à¤•ार है –
राजा रायसल जी की पहली शादी गांव देवती के बड़गà¥à¤œà¤° राजपूत लखधीर सिंह की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ अमरतीकà¤à¤µà¤° के साथ हà¥à¤¯à¥€ थी । राजा रायसल जी की रानी अमरतीकà¤à¤µà¤° के गरà¥à¤ से तीन पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का जनà¥à¤® हà¥à¤µà¤¾ इन तीन पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ से तीन शाखाà¤à¤‚ चली –
लाडाजी-से लाडखानी शेखावत। ताजाजी-से ताजखानी शेखावत।
परसरामजी-से परसरामजी का शेखावत ।
15 – लाडखानी शेखावत –लाडाजी – रायसल जी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° लाडाजी के वंशज लाडखानी शेखावत शेखावत कहलाते हैं।
लाडाजी रायसल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° व राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ के पोते थे, तथा राव रायमलजी के पड़ पोते थे।
लाडाजी को अकबर ने लाडखान कह कर पà¥à¤•ारता था जिससे इन का उप नाम लाडखान टिक गया इसलिठलाडाजी के वंशज लाडखानी शेखावत कहलाये । राजा रायसलजी की पहली शादी गांव देवती के बड़गà¥à¤œà¤° राजपूत लखधीर सिंह की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ अमरतीकà¤à¤µà¤° के साथ हà¥à¤¯à¥€ थी । राजा रायसल जी की पहली शादी, रानी अमरतीकà¤à¤µà¤° के गरà¥à¤ से तीन पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का जनà¥à¤® हà¥à¤µà¤¾ था लाडाजी, ताजाजी, परसरामजी,
इन ही लाडाजी के वंशज लाडखानी शेखावत शेखावत कहलाते हैं।
लाड़ा जी, रायसल जी के जेषà¥à¤Ÿ पà¥à¤¤à¥à¤° थे किनà¥à¤¤à¥ इन को खंडेला की राजगदà¥à¤¦à¥€ नही मिली। इनका नाम लाल सिंह था। समà¥à¤°à¤¾à¤Ÿ अकबर इनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ पà¥à¤¯à¤¾à¤° से लाडखां कहता था। इनके वंशज लाडखानी शेखावत है। खाचरियावास, रामगढ़ , लामियां, बाजà¥à¤¯à¤µà¤¾à¤¸, धीगपà¥à¤°à¤¾, लालासरी, हà¥à¤¡à¤¿à¤² ,तारपà¥à¤°à¤¾ ,खà¥à¤¡à¥€ निराधणà¥, रोरà¥, खाटू ,सांवालोदा, लाडसर लà¥à¤®à¤¾à¤¸ डाबड़ी ,दिणवा,हेमतसर आदि लाडखानियो के गाà¤à¤µ है।
16 – ताजखानी शेखावत –
ताजाजी – रायसल जी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° ताजाजी के वंशज ताजखानी शेखावत शेखावत कहलाते हैं।
राजा रायसलजी की पहली शादी गांव देवती के बड़गà¥à¤œà¤° राजपूत लखधीर सिंह की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ अमरतीकà¤à¤µà¤° के साथ हà¥à¤¯à¥€ थी । राजा रायसल जी की पहली शादी, रानी अमरतीकà¤à¤µà¤° के गरà¥à¤ से तीन पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का जनà¥à¤® हà¥à¤µà¤¾ था लाडाजी, ताजाजी, परसरामजी,
इन ही ताजाजी के वंशज ताजखानी शेखावत कहलाते हैं।
17 – परसरामजी का शेखावत –
परसरामजी – रायसल जी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° परसरामजी के वंशज परसरामजी का शेखावत कहलाते हैं।
राजा रायसलजी की पहली शादी गांव देवती के बड़गà¥à¤œà¤° राजपूत लखधीर सिंह की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ अमरतीकà¤à¤µà¤° के साथ हà¥à¤¯à¥€ थी । राजा रायसल जी की पहली शादी, रानी अमरतीकà¤à¤µà¤° के गरà¥à¤ से तीन पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का जनà¥à¤® हà¥à¤µà¤¾ था लाडाजी, ताजाजी, परसरामजी,
इन ही परसरामजी के वंशज परसरामजी का शेखावत कहलाते हैं।
18 – तà¥à¤°à¤¿à¤®à¤²à¤œà¥€ [तिरमलजी] का शेखावत –
तà¥à¤°à¤¿à¤®à¤²à¤œà¥€ [तिरमलजी] – रायसल जी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसल जी की दूसरी शादी गांव मेड़ता के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ इतिहास पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ वीर जयमल राठौड़ के पà¥à¤¤à¥à¤° बिठà¥à¤ लदास मेड़तिया की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ [रानी “मेड़तणी जी”]के साथ हà¥à¤¯à¥€ थी । राजा रायसल जी की रानी “मेड़तणी जी” के गरà¥à¤ से दो पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का जनà¥à¤® हà¥à¤µà¤¾ तà¥à¤°à¤¿à¤®à¤²à¤œà¥€ [तिरमलजी],गिरधरदासजी इन ही तà¥à¤°à¤¿à¤®à¤²à¤œà¥€ [तिरमलजी], के वंशज राव जी का शेखावत कहलाये कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ की तिरमलजी को रावजी की उपाधि थी। इन हीगिरधरदास के वंशज गिरधरदास जी का शेखावत कहलाये। तिरमल जी इन के वंशज राव जी का शेखावत कहलाते है। इनके सीकर व कासली दो बड़े ठिकाने थे। शिव सिंह जी ने फतेहपà¥à¤° कायमखानी मà¥à¤¸à¤²à¤®à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ से जीत कर सीकर राजà¥à¤¯ में मिला लिया। टाड़ास, फागलवा ,बिजासी ,खाखोली ,पालावास ,तिडोकी ,जà¥à¤²à¤¿à¤¯à¤¾à¤¸à¤° ,à¤à¤²à¤®à¤² ,दà¥à¤œà¥‹à¤¦ ,बाडोलास ,जसà¥à¤ªà¥à¤°à¤¾ ,कà¥à¤®à¤¾à¤¸ ,परडोली ,सिहोट ,गाडोदा , बागड़ोदा,शेखसर सिहोट ,मालà¥à¤¯à¤¾à¤¸à¥€ ,बेवा ,रोरà¥,शà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤—ढ़ ,बठोट ,पाटोदा ,सखडी ,दीपपà¥à¤°à¤¾ आदि राव जी का शेखावतो के गाà¤à¤µ है।
19 – गिरधरदासजी का शेखावत –
गिरधरदासजी – रायसल जी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसल जी की दूसरी शादी गांव मेड़ता के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ इतिहास पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ वीर जयमल राठौड़ के पà¥à¤¤à¥à¤° बिठà¥à¤ लदास मेड़तिया की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ [रानी “मेड़तणी जी”]के साथ हà¥à¤¯à¥€ थी। राजा रायसल जी की रानी “मेड़तणी जी” के गरà¥à¤ से दो पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ का जनà¥à¤® हà¥à¤µà¤¾ तà¥à¤°à¤¿à¤®à¤²à¤œà¥€ [तिरमलजी],गिरधरदासजी इन ही गिरधरदास के वंशज गिरधरदास जी का शेखावत कहलाये। राजा गिरधरजी रायसल जी के छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° थे किनà¥à¤¤à¥ खंडेला की राजगदà¥à¤¦à¥€ इनà¥à¤¹à¥€ को मिली। खंडेला के अलावा दांता व खà¥à¤¡ इनके मà¥à¤–à¥à¤¯ ठिकाने हैं। राणोली ,दादिया ,कलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤ªà¥à¤°à¤¾ ,तपिपलà¥à¤¯à¤¾ कोछोर ,डà¥à¤•िया ,à¤à¤—तपà¥à¤°à¤¾ ,रायपà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ ,तिलोकपà¥à¤°à¤¾ ,सà¥à¤œà¤µà¤¾à¤¸ ,रलावता ,पलसाना बानà¥à¤¡à¤¼à¤¾ ,दà¥à¤¦à¤µà¤¾ ,रà¥à¤ªà¤—ढ़,सांगलà¥à¤¯à¤¾ ,गोडीयावास,जाजोद ठीकरिया ,बावड़ी आदि गिरघर जी के शेखावतो के गाà¤à¤µ हैं।
20 – à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ का शेखावत –
à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ – रायसल जी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ – राजा रायसल के चतà¥à¤°à¥à¤¥ पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ का जनà¥à¤® विकà¥à¤°à¤®à¥€ समà¥à¤µà¤¤ 1624 की à¤à¤¾à¤¦à¥à¤°à¤ªà¤¦ शà¥à¤•à¥à¤²à¤¾ à¤à¤•ादशी के दिन जादव ठकà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€ के गरà¥à¤ से [ मेड़ता के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ वीरमदेव के पà¥à¤¤à¥à¤° जगमालजी की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ हंसकà¤à¤µà¤° [[हंस कà¥à¤‚वरी]के गरà¥à¤ से हà¥à¤µà¤¾ था ] इन ही à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ के वंशज à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ का शेखावत कहलाये।
à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ मेड़ता के शासक राठोड राव विरमदेव के कनिषà¥à¤Ÿ पà¥à¤¤à¥à¤° जगमाल के दोहितà¥à¤° थे। किशोरावसà¥à¤¥à¤¾ में ही à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ को खंडेला में रख कर वहां के शासन पà¥à¤°à¤¬à¤‚ध के कारà¥à¤¯ पर नियà¥à¤•à¥à¤¤ कर दिया गया था। रायसल जी की मृतà¥à¤¯à¥ वि .स . 1672 में हà¥à¤ˆà¥¤
à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के अधिकार में उदयपà¥à¤° परगने के 45 गाà¤à¤µ जो उनकी जागीर में थे उदयपà¥à¤°à¤µà¤¾à¤Ÿà¥€ [पेंतालीसा]
के अलावा खंडेले परगने के 12 गाà¤à¤µ जो उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ à¤à¤¾à¤ˆ बंट में मिले थे उनके सà¥à¤µà¤¾à¤®à¤¿à¤¤à¥à¤µ में थे। इनके वंशज à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी का कहलाते है। à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के पà¥à¤°à¤ªà¥‹à¤¤à¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤² सिंह जी ने कà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤–ानी नवाबों से à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ छीन ली तो à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ वाटी का पूरा पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ इन के कबà¥à¤œà¥‡ में आ गया ये सादावत कहलाते है। à¤à¤¾à¤à¤¡ ,गोठडा ,धमोरा , चिराणा ,गà¥à¤¢à¤¼à¤¾ ,छापोली ,उदयपà¥à¤°à¤µà¤¾à¤Ÿà¥€ ,बाघोली ,चला ,मणकसास ,गà¥à¤¡à¤¼à¤¾ ,पोंख,गà¥à¤¹à¤²à¤¾ ,चंवरा ,नांगल , परसरामपà¥à¤°à¤¾ आदि इन के गाà¤à¤µ है जिसको पतालिसा कहा जाता है। शारà¥à¤¦à¥à¤² सिंघजी के वंशजो के पास खेतड़ी ,बिसाऊ ,सूरजगढ़ ,नवलगढ़ ,मंडावा डà¥à¤¡à¤¼à¤²à¥‹à¤¦ ,मà¥à¤•नà¥à¤¦à¤—ढ़ ,महनसर चोकड़ी ,मलसीसर ,अलसीसर आदि ठिकाने थे।
à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के दो पà¥à¤¤à¥à¤° थे –
01. टोडरमलजी
02. जगरामसिंह
01 – टोडरमलजी – आमेर (जयपà¥à¤°) के कà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯ वंश [कछवाह] से अलग हà¥à¤ˆ à¤à¤• शाखा शेखावत वंश महाराव [शेखाजी के वंसज] जिसमें जनà¥à¤®à¥‡à¤‚ à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के जेषà¥à¤ पà¥à¤¤à¥à¤° टोडरमल थे । टोडरमल के अधिकार में उदयपà¥à¤° का परगना यथावत बना रहा। ठाकà¥à¤° टोडरमल अपने समय के पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ दातार हà¥à¤¯à¥‡ है।
राजा टोडरमल की अनूठी दृढ़ता –
कहा जाता है, की टोडरमल परम धरà¥à¤®à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¾ थे। धीणावता की तांबे की खान से होने वाली आय टोडरमल धारà¥à¤®à¤¿à¤• कारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ पर खरà¥à¤š कर देते थे। इससे चिढ़कर खान की देखà¤à¤¾à¤² करने वाले à¤à¤• अधिकारी ने दिलà¥à¤²à¥€ सलà¥à¤¤à¤¨à¤¤ से उनकी शिकायत कर दी। दिलà¥à¤²à¥€ सलà¥à¤¤à¤¨à¤¤ ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ रोका, तो राजा टोडरमल ने उसके आदेश के आगे à¤à¥à¤•ने से इनकार कर दिया। आखिरकार उदयपà¥à¤° के महाराणा जगत सिंह ने उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपने राजà¥à¤¯ में ससमà¥à¤®à¤¾à¤¨ शरण दी।
उदयपà¥à¤° के महाराणा की आमेर के राजा से तनातनी थी। वह आमेर के राजा को नीचा दिखाने के अवसर ढूंढते रहते थे। à¤à¤• दिन राणा जगत सिंह को अजीब सनक सूà¤à¥€à¥¤ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने आमेर के किले की नकली आकृति बनवाई, ताकि उसे धà¥à¤µà¤¸à¥à¤¤ कर आमेर के राजा को अपमानित कर सके। राजा टोडरमल ने महाराणा को समà¤à¤¾à¤¯à¤¾ कि इस मनोवृतà¥à¤¤à¤¿ से शतà¥à¤°à¥à¤¤à¤¾ पैदा होगी। महाराणा न माने, तो टोडरमल ने संकलà¥à¤ª लिया कि वह अपने पूरà¥à¤µà¤œà¥‹à¤‚ के आमेर का अपमान नहीं होने देंगे। वह तलवार लेकर उस कृतà¥à¤°à¤¿à¤® किले की रकà¥à¤·à¤¾ के लिठजा पहà¥à¤‚चे। महाराणा जब वहां पहà¥à¤‚चे, तो टोडरमल को उसकी रकà¥à¤·à¤¾ करते देख नतमसà¥à¤¤à¤• होकर बोले, मातृà¤à¥‚मि की रकà¥à¤·à¤¾ के लिठआप जैसे वीरों की ही जरूरत है।आगे चलकर राजा टोडरमल ने अपने पराकà¥à¤°à¤® से राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के इतिहास में सà¥à¤µà¤°à¥à¤£à¤¿à¤® अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ जोड़ा।
राजा टोडरमल की अनूठी दातारी- कहा जाता है, à¤à¤• बार टोडरमल कि दातारी की बातें जब उदयपà¥à¤° (राणाजी का) के महाराणा जगतसिंह के पास पहà¥à¤‚ची,तो जगत सिंह को à¤à¤¸à¤¾ लगा कि इस उदयपà¥à¤° की दातारी नीचे खिसक रही है। अतः उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने टोडरमल की दातारी कि परीकà¥à¤·à¤¾ लेने के लिठअपने चारण हरिदास सिंधायच को à¤à¥‡à¤œà¤¾à¥¤ चारण के उदयपà¥à¤° सीमा में पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ करते ही उनको पालकी में बैठाया,और कहारों के साथ टोडरमल सà¥à¤µà¤¯à¤‚ à¤à¥€ पालकी में लग गà¤à¥¤ उदयपà¥à¤° पहà¥à¤à¤šà¤¨à¥‡ पर उनका à¤à¤¾à¤°à¥€ सà¥à¤µà¤¾à¤—त किया गया। बारहठजी ने जब गदà¥à¤¦à¥€ पर टोडरमल के रूप में उसी वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ को बैठे देखा,जिसने उनकी पालकी में कनà¥à¤§à¤¾ दिया था। इससे बारहठजी बड़े पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ हà¥à¤à¥¤ और जाते वकà¥à¤¤ बारहठजी को कà¥à¤¯à¤¾ दिया इसका तो पता नहीं पर चारण हरिदास उनकी दातारी पर बड़ा पà¥à¤°à¤¸à¤¨à¥à¤¨ हà¥à¤†, और निमà¥à¤¨ दोहा कहा।
“दोय उदयपà¥à¤° ऊजला ,दोय दातार अटलà¥à¤²”
दोय उदयपà¥à¤° उजला , दो ही दातार अवà¥à¤µà¤²à¥¤
à¤à¤•ज राणो जगत सिंह , दूजो टोडरमल ।।
टोडरमल जी के छह पà¥à¤¤à¥à¤° थे -:
01 – पà¥à¤°à¤·à¥‹à¤¤à¤® सिंघजी – टोडरमल जी के छह पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ में पà¥à¤°à¤·à¥‹à¤¤à¤® सिंघजी जेषà¥à¤ पà¥à¤¤à¥à¤° थे। इनके वंशज à¤à¤¾à¤à¤¡ में है।
02 – à¤à¥€à¤® सिंघजी – à¤à¥€à¤® सिंघजी के वंशज मंडावरा, धमोर, गोठडा और हरडिया में है।
03 – सà¥à¤¯à¤¾à¤® सिंघजी – सà¥à¤¯à¤¾à¤® सिंघजी के अधिकार में डीडवाना के पास शाहपà¥à¤° 12 गाà¤à¤µà¥‹ से था।
04 – सà¥à¤œà¤¾à¤£ सिंह – (सà¥à¤œà¤¾à¤£ सिंह खंडेला )- टोडरमल जी के वीर पà¥à¤¤à¥à¤° सà¥à¤œà¤¾à¤£ सिंह खंडेला के दवेमंदिर की रकà¥à¤·à¤¾à¤°à¥à¤¥ लड़ते हà¥à¤ वीरगती पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤¯à¥‡à¥¤ ततà¥à¤ªà¤¶à¥à¤šà¤¾à¤¤ राव जगतसिंह कासली ने शाहपà¥à¤°à¤¾ शà¥à¤¯à¤¾à¤® सिंह से छीन लिया। पैतृक गाà¤à¤µ छापोली à¤à¥€ इनके पास नही रहा, इनके वंशज मेही मिठाई में हैं। हिमà¥à¤®à¤¤ सिंघजी के वंशजो के पास उदयपà¥à¤° था किनà¥à¤¤à¥ यह à¤à¥€ à¤à¥à¤‚à¤à¤¾à¤° सिंह के पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ नेछीन लिà¤à¥¤ इनके वंशज आज कल कारी ,इखातà¥à¤¯à¤°à¤ªà¥à¤°à¤¾,पबना आदि गाà¤à¤µà¥‹ में है। à¤à¥à¤‚à¤à¤¾à¤° सिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° जगराम सिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤² सिंह ने 1787 वि . स . में कà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤–ानी नवाब से à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ पर कबà¥à¤œà¤¼à¤¾ कर लिया।
05 – à¤à¥à¤‚à¤à¤¾à¤° सिंह – टोडरमल जी पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ में सबसे पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥€ जà¥à¤¨à¥à¤à¤¾à¤° सिंह थे। जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने पृथक गà¥à¤¢à¤¾ गाà¤à¤µ बसाया। टोडरमल जी कि मृतà¥à¤¯à¥ वि.1723 या उसके बाद मानी जानी चाहिà¤à¥¤ उनकी सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿ में “किरोड़ी गांव” में छतरी बनी हà¥à¤ˆ है। टोडरमल ने अपने रनिवास के लिठउदयपà¥à¤° में à¤à¤• सà¥à¤‚दर महल का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ करवाया। जो आज उनके वंशजो दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ उपयà¥à¤•à¥à¤¤ देखरेख के अà¤à¤¾à¤µ में खà¤à¤¡à¤¹à¤° में तबà¥à¤¦à¥€à¤² हो चूका है। किरोड़ी गांव में टोडरमल जी ने वि.1670 में गिरधारी जी का मंदिर बनवाया था।
06 – जगतसिंह – जगतसिंह कासली।
02 – जगरामसिंह – à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° जगरामसिंह थे, जगरामसिंह के वंसज जगारामोत शेखावत कहलातें हैं। जगरामसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° गोपालसिंह हà¥à¤, गोपालसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° सालेहदीसिंह थे। à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° जगरामसिंह थे, जगरामसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° गोपालसिंह हà¥à¤, गोपालसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° सालेहदीसिंह थे।
गोपालसिंह – जगरामसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° गोपालसिंह ने केध [Kedh] गांव बसाया।
सालेहदीसिंह – गोपालसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° सालेहदीसिंह थे। ठाकà¥à¤° सालेहदीसिंह ने नंगली और मà¥à¤µà¤¾à¤°à¥€ [मोहनवाड़ी] गांव बसाया।
अमरसिंह – सालेहदीसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° अमरसिंह और रामसिंह ने खिरोड़ गांव बसाया।
रामसिंह – सालेहदीसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° अमरसिंह और रामसिंह ने खिरोड़ गांव बसाया।
शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह – जगरामसिंह à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे, जगरामसिंह के वंसज जगारामोत शेखावत कहलातें हैं, जगरामसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह थे -:
शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह – शेखावाटी के à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥‚ मंडल के उतà¥à¤ªà¥à¤¥à¤—ामी मà¥à¤¸à¥à¤²à¤¿à¤® शासकों कायमखानी नवाब] को पराजित कर धीर वीर ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह ने à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥‚ पर संवत. 1787 में अपनी सतà¥à¤¤à¤¾ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ की थी। à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥ में कायमखानी चौहान नबाब के à¤à¤¾à¤ˆ बंधू अनय पथगामी हो गये थे। उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ रणà¤à¥‚मि में पद दलित कर शेखावत वीर शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह ने à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥‚ पर अधिपतà¥à¤¯ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया। इस विजय में उनके कायमखानी योदà¥à¤§à¤¾ à¤à¥€ सहयोगी थे। ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह समनà¥à¤¯à¤µà¤¾à¤¦à¥€ शासक थे।
उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥‚ पर विजय पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर नरहड़ के पीर दरगाह की वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ के लिठà¤à¤• गांव à¤à¥‡à¤‚ट किया और कई सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ पर नवीन मंदिर बनवाये और चारणों को गà¥à¤°à¤¾à¤®à¤¦à¤¿ à¤à¥‡à¤‚ट तथा दान में दिये। ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के तीन रानियों से छह पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥€ पà¥à¤¤à¥à¤° रतà¥à¤¨ हà¥à¤à¥¤ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने जीवन काल में ही राजà¥à¤¯ को पांच à¤à¤¾à¤—ों में विà¤à¤¾à¤œà¤¿à¤¤ कर अपने पांच जीवित पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के सà¥à¤ªà¥à¤°à¥à¤¦ कर दिया और अपने जीवन के चतà¥à¤°à¥à¤¥ काल में परशà¥à¤°à¤¾à¤®à¤ªà¥à¤°à¤¾ गà¥à¤°à¤¾à¤® में चले गये। वहां वे ईशà¥à¤µà¤°à¤¾à¤§à¤¨à¤¾ और à¤à¤¾à¤—वद धरà¥à¤® का चिंतन मनन करने में दतà¥à¤¤à¤šà¤¿à¤¤à¥à¤¤ रहने लगे और वहीं उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने देहतà¥à¤¯à¤¾à¤— किया. परशà¥à¤°à¤¾à¤®à¤ªà¥à¤°à¤¾ में उनकी à¤à¤µà¥à¤¯ व विशाल छतà¥à¤°à¥€ बनी है।
शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के राजà¥à¤¯ के पांच à¤à¤¾à¤—ों में बंट जाने के कारण यह पंचपाना के नाम से जाना जाता है। पंचपाना में उनके जà¥à¤¯à¥‡à¤·à¥à¤ पà¥à¤¤à¥à¤° जोरावरसिंह के वंशधर चौकड़ी, मलसीसर, मंडरेला, चनाना, सà¥à¤²à¤¤à¤¾à¤¨à¤¾, टाई और गांगियासर के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ हà¥à¤¯à¥‡à¥¤ दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ पà¥à¤¤à¥à¤° किशनसिंह के खेतड़ी, अडà¥à¤•ा, बदनगढ़, तृतीय नवलसिंह के नवलगढ़, मंडावा, मà¥à¤•नà¥à¤¦à¤—ढ, महणसर, पचेरी, जखोड़ा, इसà¥à¤®à¤¾à¤‡à¤²à¤ªà¥à¤°, बलोदा और चतà¥à¤°à¥à¤¥ केसरीसिंह के बिसाऊ, सà¥à¤°à¤œà¤—ढ और डूंडलोद आदि ठिकाने थे.। ये ठिकाने अरà¥à¤¦à¥à¤§-सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤° संसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ थे. जयपà¥à¤° राजà¥à¤¯ से इनका नाम मातà¥à¤° का समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§ था। कारण यह à¤à¥‚à¤à¤¾à¤— शारà¥à¤¦à¥‚लसिंह और उसके वंशजों ने सà¥à¤µà¤¬à¤² से अरà¥à¤œà¤¿à¤¤ किया था।
खेतड़ी के ठाकà¥à¤° को कोटपà¥à¤¤à¤²à¥€ का परगना और राजा बहादà¥à¤° का उपटंक पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ होने पर उनकी पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤ ा में और वृदà¥à¤§à¤¿ हà¥à¤ˆà¥¤ यहाठके पांचवें शासक राजा फतहसिंह के बाद राजा अजीतसिंह अलसीसर से दतà¥à¤¤à¤• आकर खेतड़ी की गदà¥à¤¦à¥€ पर आसीन हà¥à¤¯à¥‡à¥¤ वे अपने सम-सामयिक राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€ नरेशों और पà¥à¤°à¤œà¤¾à¤œà¤¨à¥‹à¤‚ में बड़े लोकपà¥à¤°à¤¿à¤¯ शासक थे। वे जैसे पà¥à¤°à¤œà¤¾ हितैषी, नà¥à¤¯à¤¾à¤¯ पà¥à¤°à¤¿à¤¯, कà¥à¤¶à¤² पà¥à¤°à¤¬à¤‚धक, उदारचितà¥à¤¤ थे, वैसे ही विदà¥à¤µà¤¾à¤¨, कवि और à¤à¤•à¥à¤¤ हृदय à¤à¥€ थे। राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के अनेक कवियों ने राजा अजीतसिंह की विवेकशीलता, नà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¤ªà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¤à¤¾ और गà¥à¤£à¤—à¥à¤°à¤¾à¤¹à¤•ता की पà¥à¤°à¤¶à¤‚सा की है। जोधपà¥à¤° के पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ कवि महामहोपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ कविराज मà¥à¤°à¤¾à¤°à¤¿à¤¦à¤¾à¤¨ आशिया ने कहा-
दान छड़ी कीरत दड़ी, हेत पड़ी तो हाथ।
à¤à¤¾à¤¸ चडी अंग ना à¤à¤¿à¤¡à¤¼à¥€, नमो खेतड़ी नाथ।।
ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के छह पà¥à¤¤à¥à¤° थे जिन में से à¤à¤• पà¥à¤¤à¥à¤° की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ यà¥à¤µà¤¾ अवसà¥à¤¥à¤¾ में ही हो गयी थी, ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह ने अपनी जायदाद और राज काज को इन पांच पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में बराबर बाà¤à¤Ÿ दिया था, और उन पांचों ने पांच जगह अलग अलग अपना शासन करना चालू कर दिया, इस पांच जगह पर बने ठिकानों को पंच पाना के नाम से जाना जाता है।
महाराव शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह शेखावत का जनà¥à¤® 1681 में हà¥à¤† था, और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 17 अपà¥à¤°à¥‡à¤²1742 में हà¥à¤¯à¥€ थी। वे à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ं के शासक थे। शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीन शादियांहà¥à¤ˆ थी-:
पहली शादी 1698 में सहजकांवर [बिकीजी] के साथ हà¥à¤¯à¥€ जो मनरूपसिंह राठौर [ बिका ] गांव नाथासर की पà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿ थी।
दूसरी शादी सिरेकंवर [बिकीजी] के साथ हà¥à¤¯à¥€ जो नाथासर गांव के मकलसिंह की पà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿ थी।
तीसरी शादी बखतकंवर के साथ हà¥à¤¯à¥€ जो गांव पूंगलोत (डेगाना) [जिला – नागौर [राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨]] के देवीसिंह राठोड़ [मेड़तिया] की पà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿ थी। à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ के शासक शारà¥à¤¦à¥à¤² सिंह शेखावत की रानी मेड़तनी जी ने सन 1783 ई० मे à¤à¤• बावड़ी का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ करवाया था। जिसे मेड़तनी की बावड़ी के नाम से जाना जाता है। जगरामसिंह, रायसल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° थे, जगरामसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह थे
शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚हके छह पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤ थे -:
01 – जोरावरसिंह – जोरावरसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की पहली पतà¥à¤¨à¥€ सहजकंवर [बिकीजी] की कोख से गांव कांट, जिला – à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ं [राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨] में हà¥à¤µà¤¾ था उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने जोरावरगढ़ फोरà¥à¤Ÿ बनवाया था, जोरावरसिंह की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1745 में हà¥à¤¯à¥€ थी, इनके वंसज चौकड़ी ,टाई, कालीपहाड़ी, मलसीसर, गांगियासर,मंडà¥à¤°à¥‡à¤²à¤¾ आदि में।
02 – किशनसिंह – किशनसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह कीतीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, किशनसिंह का जनà¥à¤® 1709, में हà¥à¤µà¤¾ था। इनके वंसज खेतड़ी, हीरवा, अरूका, सीगर, अलसीसर आदि में। किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह, à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के पà¥à¤¤à¥à¤° पहाड़सिंह व बाघसिंह [खेतड़ी]
03 – बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह – [यà¥à¤µà¤¾ अवसà¥à¤¥à¤¾ में मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥] बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ थ, बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह का जनà¥à¤® 1712, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1732 में ।
04 – अखेसिंह – अखेसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, अखेसिंह का जनà¥à¤® 1713, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1750 में इन के कोई सनà¥à¤¤à¤¾à¤¨ नहीं थी ।
05 – नवलसिंह – नवलसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, नवलसिंह का जनà¥à¤® 1715, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 14 फ़रवरी 1780 में । इन के वंसज नवलगढ़, महनसर, दोरासर, मà¥à¤•à¥à¤‚दगढ़, नरसिंघानी,बलूंदा और मंडावा आदि में ।
06 – केसरीसिंह – शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के सबसे छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° यानि छठें पà¥à¤¤à¥à¤° केशरीसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, नवलसिंह का जनà¥à¤® 1728, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1768 में । इन के वंसज डूंडलोद, सूरजगढ़ , और बिसाऊ आदि में ।
01 – जोरावरसिंह – (ठाकà¥à¤° जोरावरसिंह के वंसज): चौकड़ी
जोरावरसिंह – जोरावरसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की पहली पतà¥à¤¨à¥€ सहजकंवर [बिकीजी] की कोख से गांव कांट, जिला – à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ं [राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨] में हà¥à¤µà¤¾ था उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने जोरावरगढ़ फोरà¥à¤Ÿ बनवाया था, जोरावरसिंह की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1745 में हà¥à¤¯à¥€ थी, इनके वंसज चौकड़ी ,टाई, कालीपहाड़ी, मलसीसर, गांगियासर,मंडà¥à¤°à¥‡à¤²à¤¾ आदि में।
जोरावरसिंह [à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚] के पांच पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤ -:
01. बखतसिंह – बखतसिंह ने 1745 में चौकड़ी गांव बसाया ।
02. महासिंह – जोरावरसिंह à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ के पà¥à¤¤à¥à¤° महासिंह ने 1745 में मलसीसर गांव बसाया।
03. दौलतसिंह – जोरावरसिंह à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ के तीसरे पà¥à¤¤à¥à¤° दौलतसिंह नें 1751/1791 मंडà¥à¤°à¥‡à¤²à¤¾ गांव बसाया।
04. सालिमसिंग – जोरावरसिंह à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ के पà¥à¤¤à¥à¤° सालिमसिंग ने टाइ व सिरोही गांव बसाया।
05. कीरतसिंह – जोरावरसिंह à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ के पà¥à¤¤à¥à¤° कीरतसिंह ने डाबड़ी गांव बसाया ।
रणजीतसिंह – रणजीतसिंह दौलतसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° व जोरावरसिंह के पोते थे, रणजीतसिंह ने चनाना गांव बसाया था।
02 – किशनसिंह – (ठाकà¥à¤° किश नसिंह के वंसज): खेतड़ी
किशनसिंह – किशनसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह कीतीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, किशनसिंह का जनà¥à¤® 1709, में हà¥à¤µà¤¾ था। इनके वंसज खेतड़ी, हीरवा, अरूका, सीगर, अलसीसर आदि में। किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह, à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के पà¥à¤¤à¥à¤° पहाड़सिंह व बाघसिंह [खेतड़ी]
खेतड़ी नगर 1742 में ठाकà¥à¤° किशनसिंह ने बसाया था जो पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ रियासत जयपà¥à¤° का सीकर के बाद खेतड़ी नगर दूसरा सबसे बड़ा ठिकाना था।
01 – à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह – ठाकà¥à¤° किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह ने 1970 में à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤—ढ़ फोरà¥à¤Ÿ, बागोर फोरà¥à¤Ÿ’ और खेतड़ी महल बनवाये थे। किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के दो पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤-:
* – पहाड़सिंह
*- बाघसिंह [खेतड़ी] – और à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के पà¥à¤¤à¥à¤° पहाड़सिंह ने हीरवा के किले [गढ़] का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ 1763 में करवाया था।
02 – छतà¥à¤¤à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह – ठाकà¥à¤° किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° छतà¥à¤¤à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह अलसीसर और उसके किले [गढ़] का पहली बार निरà¥à¤®à¤¾à¤£ 1853.में किया था, उसके बाद अलसीसर की दूसरी बार बसावट ठाकà¥à¤° गणपतसिंह ने 1853.में की थी।
03 – रामनाथसिंह – ठाकà¥à¤° किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° ठाकà¥à¤° रामनाथसिंह ने हीरवा गांव बसाया था।
04 – मेहताबसिंह – सिगरा गांव ठाकà¥à¤° किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° मेहताबसिंह ने बसाया था।
05 – दà¥à¤²à¥à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤‚ह – अरूका गांव ठाकà¥à¤° किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° ठाकà¥à¤° दà¥à¤²à¥à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤‚ह ने 1796.बसाया था।
06 – बदनसिंह – बदनगढ़ ठिकाने की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ ठाकà¥à¤° किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° ठाकà¥à¤° बदनसिंह ने की थी।
03 – बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह – [यà¥à¤µà¤¾ अवसà¥à¤¥à¤¾ में मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥] –
बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह – [यà¥à¤µà¤¾ अवसà¥à¤¥à¤¾ में मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥] बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ थ, बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह का जनà¥à¤® 1712, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1732 में ।
04 – अखेसिंह
अखेसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, अखेसिंह का जनà¥à¤® 1713, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1750 में इन के कोई सनà¥à¤¤à¤¾à¤¨ नहीं थी ।
05 – नवलसिंह- (ठाकà¥à¤° नवलसिंह के वंसज): नवलगढ़
नवलसिंह – नवलसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, नवलसिंह का जनà¥à¤® 1715, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 14 फ़रवरी 1780 में। इन के वंसज नवलगढ़, महनसर, दोरासर, मà¥à¤•à¥à¤‚दगढ़, नरसिंघानी,बलूंदा और मंडावा आदि में ।
नवलगढ़ , की सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¨à¤¾ रोहिली गांव के पास ठाकà¥à¤° नवलसिंह ने 1737 में की थी तथा वंहा पैर दो किले [गढ़] बनवाये पहला बाला किला[गढ़], दूसरा किला[गढ़] काचियागढ़ फोरà¥à¤Ÿ वरà¥à¤¤à¤®à¤¾à¤¨ में काचियागढ़ को रूपनिवास पैलेस के नाम से जाना जाता है।
मंडावा, नवलगढ़ के ठाकà¥à¤° नरसिंहदास के तीसरे और चौथे पà¥à¤¤à¥à¤° ने 1791 में को बसाया और 1755 में किले [गढ़] का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ ठाकà¥à¤° नवलसिंह करवाया था।
नाहरसिंह – नवलगढ़ के ठाकà¥à¤° नवलसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° नाहरसिंह ने महनसर गांव 1768 में बसाया था तथ वंहा à¤à¤• किले [गढ़] का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ करवाया था।
à¤à¤µà¤¾à¤¨à¥€à¤¸à¤¿à¤‚ह – ठाकà¥à¤° नाहरसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤µà¤¾à¤¨à¥€à¤¸à¤¿à¤‚ह ने परसरामपà¥à¤°à¤¾, ठिकाने का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ किया था,और वंहाठपर à¤à¤• छोटा किले [गढ़] का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ à¤à¥€ करवाया था।
मà¥à¤•ंदसिंह – नवलगढ़ के ठाकà¥à¤° नाथूसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° मà¥à¤•ंदसिंह ने 1859 में मà¥à¤•à¥à¤‚दगढ़ ठिकाने का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ किया था।
पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह – दोरासर और पचेरी, ठिकाने का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह ने किया था।
इसà¥à¤®à¤¾à¤‡à¤²à¤ªà¥à¤°
जाकोड़ा
कोलिंडा आदि
06 – केशरीसिंह – (ठाकà¥à¤° केसरीसिंह के वंसज) डूंडलोद
केसरीसिंह – शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के सबसे छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° यानि छठें पà¥à¤¤à¥à¤° केशरीसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, नवलसिंह का जनà¥à¤® 1728, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1768 में । इन के वंसज डूंडलोद, सूरजगढ़, और बिसाऊ आदि में। डूंडलोद, ठिकाने का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ ठाकà¥à¤° केसरीसिंह ने किया था, केसरीसिंह ने डूंडलोद किले [गढ़] का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ 1750.में करवाया था।बिसाऊ , ठिकाने का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ ठाकà¥à¤° केसरीसिंह ने 1746 में किया था, और वंहाठपर à¤à¤• किले [गढ़] का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ à¤à¥€ करवाया था।
सूरजमलजी – सूरजगढ़, ठिकाने का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ 1778 में ठाकà¥à¤° सूरजमल ने किया और और वंहाठपर à¤à¤• किले [गढ़] का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ à¤à¥€ करवाया था।
03 – à¤à¥‚à¤à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह –
à¤à¥à¤‚à¤à¤¾à¤° सिंह – à¤à¥à¤‚à¤à¤¾à¤° सिंह टोडरमल जी पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ में सबसे पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥€ जà¥à¤¨à¥à¤à¤¾à¤° सिंह थे। जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने पृथक गà¥à¤¢à¤¾ गाà¤à¤µ बसाया।
à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ के शेखावतों की दो उप शाखाये हैं –
राजा रायसल के पà¥à¤¤à¥à¤° और उदयपà¥à¤°à¤µà¤¾à¤Ÿà¥€ के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ के वंशज à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी का शेखावत कहलाते हैं, à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के शेखावतों की दो उप शाखाà¤à¤ हैं –:
01.-शारà¥à¤¦à¥à¤² सिंह का शेखावत –
02.-सलेदी सिंह का शेखावत –
1.शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह का शेखावत – शेखावाटी के à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥‚ मंडल के उतà¥à¤ªà¥à¤¥à¤—ामी मà¥à¤¸à¥à¤²à¤¿à¤® शासकों कायमखानी नवाब] को पराजित कर धीर वीर ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह ने à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥‚ पर संवत. 1787 में अपनी सतà¥à¤¤à¤¾ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ की थी। à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥ में कायमखानी चौहान नबाब के à¤à¤¾à¤ˆ बंधू अनय पथगामी हो गये थे। उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ रणà¤à¥‚मि में पद दलित कर शेखावत वीर शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह ने à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥‚ पर अधिपतà¥à¤¯ सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ किया। इस विजय में उनके कायमखानी योदà¥à¤§à¤¾ à¤à¥€ सहयोगी थे। ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह समनà¥à¤¯à¤µà¤¾à¤¦à¥€ शासक थे। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने à¤à¥à¤‚à¤à¤¨à¥‚ पर विजय पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ कर नरहड़ के पीर दरगाह की वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ के लिठà¤à¤• गांव à¤à¥‡à¤‚ट किया और कई सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ पर नवीन मंदिर बनवाये और चारणों को गà¥à¤°à¤¾à¤®à¤¦à¤¿ à¤à¥‡à¤‚ट तथा दान में दिये। ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के तीन रानियों से छह पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥€ पà¥à¤¤à¥à¤° रतà¥à¤¨ हà¥à¤à¥¤ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने अपने जीवन काल में ही राजà¥à¤¯ को पांच à¤à¤¾à¤—ों में विà¤à¤¾à¤œà¤¿à¤¤ कर अपने पांच जीवित पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के सà¥à¤ªà¥à¤°à¥à¤¦ कर दिया और अपने जीवन के चतà¥à¤°à¥à¤¥ काल में परशà¥à¤°à¤¾à¤®à¤ªà¥à¤°à¤¾ गà¥à¤°à¤¾à¤® में चले गये। वहां वे ईशà¥à¤µà¤°à¤¾à¤§à¤¨à¤¾ और à¤à¤¾à¤—वद धरà¥à¤® का चिंतन मनन करने में दतà¥à¤¤à¤šà¤¿à¤¤à¥à¤¤ रहने लगे और वहीं उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने देहतà¥à¤¯à¤¾à¤— किया. परशà¥à¤°à¤¾à¤®à¤ªà¥à¤°à¤¾ में उनकी à¤à¤µà¥à¤¯ व विशाल छतà¥à¤°à¥€ बनी है।
पंचपाना
शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के राजà¥à¤¯ के पांच à¤à¤¾à¤—ों में बंट जाने के कारण यह पंचपाना के नाम से जाना जाता है। पंचपाना में उनके जà¥à¤¯à¥‡à¤·à¥à¤ पà¥à¤¤à¥à¤° जोरावरसिंह के वंशधर चौकड़ी, मलसीसर, मंडरेला, चनाना, सà¥à¤²à¤¤à¤¾à¤¨à¤¾, टाई और गांगियासर के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ हà¥à¤¯à¥‡à¥¤ दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ पà¥à¤¤à¥à¤° किशनसिंह के खेतड़ी, अडà¥à¤•ा, बदनगढ़, तृतीय नवलसिंह के नवलगढ़, मंडावा, मà¥à¤•नà¥à¤¦à¤—ढ, महणसर, पचेरी, जखोड़ा, इसà¥à¤®à¤¾à¤‡à¤²à¤ªà¥à¤°, बलोदा और चतà¥à¤°à¥à¤¥ केसरीसिंह के बिसाऊ, सà¥à¤°à¤œà¤—ढ और डूंडलोद आदि ठिकाने थे.। ये ठिकाने अरà¥à¤¦à¥à¤§-सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤° संसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ थे. जयपà¥à¤° राजà¥à¤¯ से इनका नाम मातà¥à¤° का समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§ था। कारण यह à¤à¥‚à¤à¤¾à¤— शारà¥à¤¦à¥‚लसिंह और उसके वंशजों ने सà¥à¤µà¤¬à¤² से अरà¥à¤œà¤¿à¤¤ किया था।
खेतड़ी के ठाकà¥à¤° को कोटपà¥à¤¤à¤²à¥€ का परगना और राजा बहादà¥à¤° का उपटंक पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ होने पर उनकी पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤·à¥à¤ ा में और वृदà¥à¤§à¤¿ हà¥à¤ˆà¥¤ यहाठके पांचवें शासक राजा फतहसिंह के बाद राजा अजीतसिंह अलसीसर से दतà¥à¤¤à¤• आकर खेतड़ी की गदà¥à¤¦à¥€ पर आसीन हà¥à¤¯à¥‡à¥¤ वे अपने सम-सामयिक राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€ नरेशों और पà¥à¤°à¤œà¤¾à¤œà¤¨à¥‹à¤‚ में बड़े लोकपà¥à¤°à¤¿à¤¯ शासक थे। वे जैसे पà¥à¤°à¤œà¤¾ हितैषी, नà¥à¤¯à¤¾à¤¯ पà¥à¤°à¤¿à¤¯, कà¥à¤¶à¤² पà¥à¤°à¤¬à¤‚धक, उदारचितà¥à¤¤ थे, वैसे ही विदà¥à¤µà¤¾à¤¨, कवि और à¤à¤•à¥à¤¤ हृदय à¤à¥€ थे। राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के अनेक कवियों ने राजा अजीतसिंह की विवेकशीलता, नà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¤ªà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¤à¤¾ और गà¥à¤£à¤—à¥à¤°à¤¾à¤¹à¤•ता की पà¥à¤°à¤¶à¤‚सा की है। जोधपà¥à¤° के पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ कवि महामहोपाधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ कविराज मà¥à¤°à¤¾à¤°à¤¿à¤¦à¤¾à¤¨ आशिया ने कहा-
दान छड़ी कीरत दड़ी, हेत पड़ी तो हाथ।
à¤à¤¾à¤¸ चडी अंग ना à¤à¤¿à¤¡à¤¼à¥€, नमो खेतड़ी नाथ।।
ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के छह पà¥à¤¤à¥à¤° थे जिन में से à¤à¤• पà¥à¤¤à¥à¤° की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ यà¥à¤µà¤¾ अवसà¥à¤¥à¤¾ में ही हो गयी थी, ठाकà¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह ने अपनी जायदाद और राज काज को इन पांच पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में बराबर बाà¤à¤Ÿ दिया था, और उन पांचों ने पांच जगह अलग अलग अपना शासन करना चालू कर दिया, इस पांच जगह पर बने ठिकानों को पंच पाना के नाम से जाना जाता है।
महाराव शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह शेखावत का जनà¥à¤® 1681 में हà¥à¤† था, और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 17 अपà¥à¤°à¥‡à¤²1742 में हà¥à¤¯à¥€ थी। वे à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ं के शासक थे।
शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीन शादियांहà¥à¤ˆ थी-:
01 – पहली शादी 1698 में सहजकांवर [बिकीजी] के साथ हà¥à¤¯à¥€ जो मनरूपसिंह राठौर [ बिका ] गांव नाथासर की पà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿ थी।
02 – दूसरी शादी सिरेकंवर [बिकीजी] के साथ हà¥à¤¯à¥€ जो नाथासर गांव के मकलसिंह की पà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿ थी।
03 – तीसरी शादी बखतकंवर के साथ हà¥à¤¯à¥€ जो गांव पूंगलोत (डेगाना) [जिला – नागौर [राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨]] के देवीसिंह राठोड़ [मेड़तिया] की पà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿ थी। à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ के शासक शारà¥à¤¦à¥à¤² सिंह शेखावत की रानी मेड़तनी जी ने सन 1783 ई० मे à¤à¤• बावड़ी का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ करवाया था। जिसे मेड़तनी की बावड़ी के नाम से जाना जाता है। जगरामसिंह, रायसल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° थे, जगरामसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह थे।
शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के छह पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤ थे -:
01 – जोरावरसिंह – जोरावरसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की पहली पतà¥à¤¨à¥€ सहजकंवर [बिकीजी] की कोख से गांव कांट, जिला – à¤à¥à¤‚à¤à¥à¤¨à¥‚ं [राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨] में हà¥à¤µà¤¾ था उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने जोरावरगढ़ फोरà¥à¤Ÿ बनवाया था, जोरावरसिंह की मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1745 में हà¥à¤¯à¥€ थी, इनके वंसज चौकड़ी ,टाई, कालीपहाड़ी, मलसीसर, गांगियासर,मंडà¥à¤°à¥‡à¤²à¤¾ आदि में।
02 – किशनसिंह – किशनसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह कीतीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, किशनसिंह का जनà¥à¤® 1709, में हà¥à¤µà¤¾ था। इनके वंसज खेतड़ी, हीरवा, अरूका, सीगर, अलसीसर आदि में। किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह, à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के पà¥à¤¤à¥à¤° पहाड़सिंह व बाघसिंह [खेतड़ी]
03 – बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह – [यà¥à¤µà¤¾ अवसà¥à¤¥à¤¾ में मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥] बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ थ, बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह का जनà¥à¤® 1712, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1732 में ।
04 – अखेसिंह – अखेसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, अखेसिंह का जनà¥à¤® 1713, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1750 में इन के कोई सनà¥à¤¤à¤¾à¤¨ नहीं थी ।
05 – नवलसिंह – नवलसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, नवलसिंह का जनà¥à¤® 1715, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 14 फ़रवरी 1780 में। इन के वंसज नवलगढ़, महनसर, दोरासर, मà¥à¤•à¥à¤‚दगढ़, नरसिंघानी,बलूंदा और मंडावा आदि में ।
06 – केसरीसिंह – शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के सबसे छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° यानि छठें पà¥à¤¤à¥à¤° केशरीसिंह का जनà¥à¤® शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह की तीसरी पतà¥à¤¨à¥€ बखतकंवर की कोख से हà¥à¤µà¤¾ था, नवलसिंह का जनà¥à¤® 1728, में हà¥à¤µà¤¾ था और मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥ 1768 में । इन के वंसज डूंडलोद, सूरजगढ़, और बिसाऊ आदि में ।
à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ के पोते जà¥à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚हजी के बेटों से à¤à¥€ दो उपशाखाà¤à¤ निकली हैं –
राजा रायसल के चतà¥à¤°à¥à¤¥ पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ गà¥à¤¢à¤¾ के शासक थे। à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° टोडरमलजी थे, टोडरमलजी के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‚à¤à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह थे।जà¥à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚हजी की सनà¥à¤¤à¤¾à¤¨à¥‹à¤‚ से मातृपकà¥à¤· के आधार पर दो उप शाखाये हैं –:
गौड़ जी के शेखावत, वीदावतजी के शेखावत
21 – गौड़ जी के शेखावत –
जà¥à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚हजी – टोडरमलजी – à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ – रायसलजी – – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसल के चतà¥à¤°à¥à¤¥ पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ गà¥à¤¢à¤¾ के शासक थे। à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° टोडरमलजी थे, टोडरमल जी के छह पà¥à¤¤à¥à¤° थे -:
01 – पà¥à¤°à¤·à¥‹à¤¤à¤®à¤¸à¤¿à¤‚हजी – टोडरमल जी के छह पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ में पà¥à¤°à¤·à¥‹à¤¤à¤® सिंघजी जेषà¥à¤ पà¥à¤¤à¥à¤° थे। इनके वंशज à¤à¤¾à¤à¤¡ में है।
02 – à¤à¥€à¤®à¤¸à¤¿à¤‚हजी – à¤à¥€à¤® सिंघजी के वंशज मंडावरा, धमोरा , गोठडा और हरडिया में है।
03 – सà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤¸à¤¿à¤‚हजी – सà¥à¤¯à¤¾à¤® सिंघजी के अधिकार में डीडवाना के पास शाहपà¥à¤° 12 गाà¤à¤µà¥‹ से था,
04 – सà¥à¤œà¤¾à¤£ सिंह – (सà¥à¤œà¤¾à¤£ सिंह खंडेला)
05 – à¤à¥à¤‚à¤à¤¾à¤° सिंह – टोडरमल जी के पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ में सबसे पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥€ जà¥à¤¨à¥à¤à¤¾à¤° सिंह थे। जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने पृथक गà¥à¤¢à¤¾ गाà¤à¤µ बसाया।
06 – जगतसिंह – जगतसिंह कासली
राजा रायसल के चतà¥à¤°à¥à¤¥ पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ थे। टोडरमल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° जà¥à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚हजी गà¥à¤¡à¤¼à¤¾ के शासक थे।
गà¥à¤¡à¤¼à¤¾ के शासक जà¥à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚हजी ”गौडजी” रानी के पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के वंशज मातृपकà¥à¤· के आधार पर गौड जी के शेखावत कहलाते है।
22 – वीदावत जी के शेखावत –
जà¥à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚हजी – टोडरमलजी – à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ – रायसलजी – – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसल के चतà¥à¤°à¥à¤¥ पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ गà¥à¤¢à¤¾ के शासक थे। à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° टोडरमलजी थे, टोडरमल जी के छह पà¥à¤¤à¥à¤° थे -:
01 – पà¥à¤°à¤·à¥‹à¤¤à¤®à¤¸à¤¿à¤‚हजी – टोडरमल जी के छह पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ में पà¥à¤°à¤·à¥‹à¤¤à¤® सिंघजी जेषà¥à¤ पà¥à¤¤à¥à¤° थे। इनके वंशज à¤à¤¾à¤à¤¡ में है।
02 – à¤à¥€à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह जी – à¤à¥€à¤® सिंघजी के वंशज मंडावरा, धमोरा , गोठडा और हरडिया में है।
03 – सà¥à¤¯à¤¾à¤®à¤¸à¤¿à¤‚हजी – सà¥à¤¯à¤¾à¤® सिंघजी के अधिकार में डीडवाना के पास शाहपà¥à¤° 12 गाà¤à¤µà¥‹ से था,
04 – सà¥à¤œà¤¾à¤£à¤¸à¤¿à¤‚ह – (सà¥à¤œà¤¾à¤£ सिंह खंडेला)
05 – à¤à¥à¤‚à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह – टोडरमल जी पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹ में सबसे पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤ªà¥€ जà¥à¤¨à¥à¤à¤¾à¤° सिंह थे। जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने पृथक गà¥à¤¢à¤¾ गाà¤à¤µ बसाया। टोडरमल जी कि मृतà¥à¤¯à¥ वि.1723 या उसके बाद मानी जानी चाहिà¤à¥¤ उनकी सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿ में “किरोड़ी गांव” में छतरी बनी हà¥à¤ˆ है। टोडरमल ने अपने रनिवास के लिठउदयपà¥à¤° में à¤à¤• सà¥à¤‚दर महल का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ करवाया। जो आज उनके वंशजो दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ उपयà¥à¤•à¥à¤¤ देखरेख के अà¤à¤¾à¤µ में खà¤à¤¡à¤¹à¤° में तबà¥à¤¦à¥€à¤² हो चूका है। किरोड़ी गांव में टोडरमल जी ने वि.1670 में गिरधारी जी का मंदिर बनवाया था।
06 – जगतसिंह – जगतसिंह कासली
राजा रायसल के चतà¥à¤°à¥à¤¥ पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œà¤œà¥€ थे। टोडरमल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° जà¥à¤à¤¾à¤°à¤¸à¤¿à¤‚हजी गà¥à¤¡à¤¼à¤¾ के शासक थे।
गà¥à¤¡à¤¼à¤¾ के शासक जà¥à¤à¤¾à¤° सिंह जी की ”वीदावत” रानी के पà¥à¤¤à¥à¤° मातृपकà¥à¤· के आधार पर वीदावत जी के शेखावत कहलाते है।
23 – वीरà¤à¤¾à¤¨à¤œà¥€ का शेखावत –
वीरà¤à¤¾à¤¨à¤œà¥€ का – रायसल जी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसल जी की चौथी शादी गांव मारोठके सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ कà¥à¤®à¥à¤à¤¾ जी गौड़ की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ लाडकà¤à¤µà¤° [[रानी “गौड़जी] के साथ हà¥à¤¯à¥€ थी । राजा रायसल जी की रानी लाडकà¤à¤µà¤° [[रानी “गौड़जी] के गरà¥à¤ से à¤à¤• पà¥à¤¤à¥à¤° का जनà¥à¤® हà¥à¤µà¤¾- वीरà¤à¤¾à¤¨à¤œà¥€, इन ही वीरà¤à¤¾à¤¨à¤œà¥€ के वंशज वीरà¤à¤¾à¤¨à¤œà¥€ का शेखावत कहलाये।
24 – हरजी का शेखावत [हररामजी का] –
हरजी [हररामजी] – रायसल जी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
राजा रायसल जी की पांचवी शादी चौहान राजपूत राजकà¥à¤®à¤¾à¤°à¥€ किंनवती निरà¥à¤¬à¤¨à¤¸ के साथ हà¥à¤† जो खणà¥à¤¡à¥‡à¤²à¤¾ के राजा की पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ थी। जिससे पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤µà¤¾ हरजी, इनà¥à¤¹à¥€ हरजी के वंसज हरजी का शेखावत [हररामजी का] कहलाये। इन को उप नाम हरिदामजी के नाम से à¤à¥€ पà¥à¤•ारते थे कहीं – कांहीं इनको हरिदामजी के शेखावत à¤à¥€ बोला जाता है।
हरिरामजी के वंशज हरिरामजी का शेखावत कहलाते है। मूंडरà¥, दादिया ,जेठी आदि इनके गाà¤à¤µ है।
25 – à¤à¤°à¥‚ठजी का शेखावत –
à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
सूजा जी [सूरजमल जी] के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ के वंशज à¤à¤°à¥‚ठजी का शेखावत का शेखावत कहलाये हैं।
à¤à¤°à¥‚ठजी – सूजा जी [सूरजमल जी] के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥ˆà¤°à¥à¤œà¥€ के 5 पà¥à¤¤à¥à¤° थे जिनके नाम-
01. नरहरदास जी
02. कà¥à¤‚वरसल जी
03. बारीसाल जी
04. सांगा जी
05. à¤à¤¾à¤°à¤®à¤² जी
à¤à¥ˆà¤°à¥à¤œà¥€ के इन पांचों पà¥à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ के वंशज वंशज “à¤à¥ˆà¤°à¥à¤œà¥€ के शेखावत†कहलाà¤à¥¤
नरहरदास – à¤à¥ˆà¤°à¥à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° नरहरदास के 18 पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤¯à¥‡ जिनमे
01 – कवरसी
02 – कशोदास
03 – राजसी
04 – जगनà¥à¤¨à¤¾à¤¥
05 – जसवंत
06 – जगरूप
07 – जैतसी
08 – रायसी
09 – नाहरखाठ(नाहर सिंह)
10 – गोरधन
11 – बालदास
12 – किशनसिंह
13 – मà¥à¤•à¥à¤¨à¥à¤¦à¤¸à¤¿à¤‚ह
14 – हरीसिंह
15 – रघà¥à¤¨à¤¾à¤¥ सिंह
16 – à¤à¥€à¤®à¤¸à¤¿à¤‚ह
17 – रामसिंह
18 – नारायणसिंह
à¤à¥ˆà¤°à¥à¤œà¥€ के ये 8 पà¥à¤¤à¥à¤° कवरसी, कशोदास, राजसी, जगनà¥à¤¨à¤¾à¤¥, जसवंत, जगरूप, जैतसी, रायसी हिसार के नवाब के साथ वि.1679 में लड़ाई मे वीरगति को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ हà¥à¤¯à¥‡ ।
नाहरखाठ(नाहरसिंह) – नरहरदास के पà¥à¤¤à¥à¤° नाहरखाठ(नाहर सिंह) के चार पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤¯à¥‡ जिनके नाम थे –
01 – मदन सिंह
02 – शकà¥à¤¤à¤¿ सिंह
03 – तेजसिंह
04 – विरà¤à¤¾à¤¨à¤¸à¤¿à¤‚ह
इनमे नाहर सिंह के बाद मदन सिंह गदà¥à¤¦à¥€ पर बैठे। शकà¥à¤¤à¤¿à¤¸à¤¿à¤‚ह को बà¤à¤Ÿà¤µà¤¾à¤°à¥‡ मे गà¥à¤—लवा और बेवड गाà¤à¤µ दिये गठथे ।
26 – चांदाजी का शेखावत [चांदावत शेखावत] –
चांदाजी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
सूजा जी [सूरजमल जी] के पà¥à¤¤à¥à¤° चांदाजी के वंशज à¤à¤°à¥‚ठजी का शेखावत का शेखावत कहलाये हैं।
27 – चांदापोता शेखावत –
चांदाजी के वंसज – चांदाजी – राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ -– राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
सूजा जी [सूरजमल जी] के पà¥à¤¤à¥à¤° चांदाजी के बेटों के वंसज यानि चांदाजी के पोतों और उनके चांदापोता शेखावत कहलाये हैं।
28 – तेजसी के शेखावत –
तेजसी – राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
शेखाजी के सबसे छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° राव रायमल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° तेजसी के वंशज तेजसी के शेखावत कहलाते हैं। अलवर जिले के नारायणपà¥à¤° ,गढ़ी ,मामोड़ और बाणासà¥à¤° के गाà¤à¤µà¥‹ में हैं।
29 – सहसमलजी के शेखावत –
सहसमलजी – राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
शेखाजी के सबसे छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° राव रायमल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° सहसमलजी के वंशज सहसमलजी के शेखावत कहलाते हैं। सहसमल जी को 12 गांवों सहित सांईवाड की जागीर मिली थी, सहसमल जी की à¤à¤• पà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ (मदालसा देवी ) का विवाह आमेट के रावत पतà¥à¤¤à¤¾à¤œà¥€ चà¥à¤£à¥à¤¡à¤¾à¤µà¤¤ से हà¥à¤† था जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने चितोड़ के तीसरे शाके का नेतृतà¥à¤µ किया था।
30 – जगमालजी के शेखावत –
जगमालजी – राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
शेखाजी के सबसे छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° राव रायमलजी के पà¥à¤¤à¥à¤° जगमालजी के वंशज जगमालजी के शेखावत कहलाते हैं। जगमाल को 12 गाà¤à¤µà¥‹ सहित हमीरपà¥à¤° व हाजीपà¥à¤° की जागीर मिली जो अलवर जिले में हैं। जगमाल का पà¥à¤¤à¥à¤° दà¥à¤¦à¤¾ वीर व उदार राजपूत था उसकी पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤§à¥€ के कारण इन के वंशज दà¥à¤¦à¤¾à¤µà¤¤ शेखावत कहलाते है।
31 – दà¥à¤¦à¤¾à¤µà¤¤ शेखावत –
दà¥à¤¦à¤¾à¤œà¥€ – जगमालजी – राव रायमलजी – शेखाजी – राव मोकलजी – राव बाला जी – उदयकरणजी
जगमालजी पà¥à¤¤à¥à¤° दà¥à¤¦à¤¾à¤œà¥€ के वंशज दà¥à¤¦à¤¾à¤µà¤¤ शेखावत कहलाते हैं। दà¥à¤¦à¤¾à¤œà¥€, राव रायमलजी के पोते व शेखाजी के पड़ पोते थे जगमालजी का पà¥à¤¤à¥à¤° दà¥à¤¦à¤¾à¤œà¥€ वीर व उदार राजपूत था उसकी पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤§à¥€ के कारण इन के वंशज दà¥à¤¦à¤¾à¤µà¤¤ शेखावत कहलाते है।
32 – सीहा के शेखावत –
राव रायमल जी के 6 पà¥à¤¤à¥à¤° थे -:
01 – तेजसी
02 – सहसमल जी
03 – जगमाल
04 – सीहा
05 – सà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤£
रायमल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° सीहा के वंसज सीहा के शेखावत कहलाये हैं।
33 – सà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤£ के शेखावत –
राव रायमल जी के 6 पà¥à¤¤à¥à¤° थे
01 – तेजसी
02 – सहसमल जी
03 – जगमाल
04 – सीहा
05 – सà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤£
रायमल जी के पà¥à¤¤à¥à¤° सà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤£ के वंसज सà¥à¤°à¤¤à¤¾à¤£ के शेखावत कहलाये हैं।
34 – नरहरदासोत शेखावत –
राव सà¥à¤œà¤¾à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ के 5 पà¥à¤¤à¥à¤° थे -:
01. नरहरदास जी
02. कà¥à¤‚वरसल जी
03. बारीसाल जी
04. सांगा जी
05. à¤à¤¾à¤°à¤®à¤² जी
à¤à¤°à¥‚à¤à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° नरहरदासजी के वंसज नरहरदासोत शेखावत कहलाये हैं।
35 – उगà¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨ जी का शेखावत –
लूणकरà¥à¤£à¤œà¥€ के पà¥à¤¤à¥à¤° नरसिंहदासजी थे, नरसिंहदासजी के पà¥à¤¤à¥à¤° उगà¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨à¤œà¥€ थे, इनà¥à¤¹à¥€à¤‚ उगà¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨à¤œà¥€ के वंसज उगà¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨ जी का शेखावत कहलाये हैं। उगà¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨ के वंशज- शाहपà¥à¤°à¤¾ और मनोहरपà¥à¤°à¤¾ के राव हैं। लà¥à¤£à¤•रण जी राव सà¥à¤œà¤¾ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे।
36 – अचलà¥à¤¦à¤¾à¤¸à¤œà¥€ का शेखावत [अचलदासोत शेखावत]
राव लूणकरà¥à¤£ के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¤—वानदासजी थे, à¤à¤—वानदासजी के पूतà¥à¤° अचलदास जी के वंशज अचलदास जी के शेखावत कहलाते हैं। लà¥à¤£à¤•रण जी राव सà¥à¤œà¤¾ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे।
अचलदासोत शेखावत – जाहोता सहित बारह गांव ,
à¤à¤—वानदासजी के पà¥à¤¤à¥à¤° ठाकà¥à¤° अचलदासजी मेहरोली केठाकà¥à¤° साहब थे, उन को à¤à¤¾à¤ˆ बंटवारे में रूंडल गांव मिला था, अचलदासजी के वंसज अचलदासोत शेखावत कहलातें है।
à¤à¤—वानदासजी अमरसर ठिकाने के ठिकानेदार राव लà¥à¤¨à¤•रणजी (1548/1584) के छोटे बेटे थे। लà¥à¤£à¤•रण जी राव सà¥à¤œà¤¾ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे।
(अचलदासोत शेखावत ठिकाना जाहोता)
अचलदासजी के चार पà¥à¤¤à¥à¤° थे -:
01 – जगतसिंह [जà¥à¤¨à¤¸à¤¿à¤¯à¤¾]
02 – सगतसिंह (सगतसिंह का वंस आगे चला)
03 – हिमà¥à¤®à¤¤à¤¸à¤¿à¤‚ह [के वंसज राडावास, जयसिंहपà¥à¤°à¤¾ और सामोद में रहतें है]
04 – केसरीसिंह [के वंसज कांकरा जिला सीकर राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨]
37 – सावलदासजी का शेखावत –
राव लूणकरà¥à¤£ के पà¥à¤¤à¥à¤° सांवलदासजी थे, के वंशधर सांवलदासजी के वंशज सांवलदासजी का शेखावत कहलाते हैं। लà¥à¤£à¤•रण जी राव सà¥à¤œà¤¾ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे।
38 – मनोहर दासोत शेखावत –
लूणकरà¥à¤£ के छोटे पà¥à¤¤à¥à¤° मनोहरदास जी अमरसर के शासक हà¥à¤à¥¤ मनोहरदास जी के वंशज मनोहर दासोत शेखावत कहलाते हैं।
उगà¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨ जी के शेखावतों की ही उप शाखा है मनोहर दासोत शेखावत
39 – जगारामोत शेखावत –
जगरामसिंह के वंसज जगारामोत शेखावत कहलातें हैं
जगरामसिंह à¤à¥‹à¤œà¤°à¤¾à¤œ जी के पà¥à¤¤à¥à¤° थे,
जगरामसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह थे, शारà¥à¤¦à¥à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह पांच पà¥à¤¤à¥à¤° हà¥à¤ –
01 – जोरावरसिंह
02 – किशनसिंह – किशनसिंह के पà¥à¤¤à¥à¤° à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह, à¤à¥‹à¤ªà¤¾à¤²à¤¸à¤¿à¤‚ह के पà¥à¤¤à¥à¤° पहाड़सिंह व बाघसिंह [खेतड़ी]
03 – बहादà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤‚ह [यà¥à¤µà¤¾ अवसà¥à¤¥à¤¾ में मà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥]
04 – अखेसिंह
05 – नवलसिंह
06 – केसरीसिंह
।।इति।।